Bhagoria Festival: क्या भगोरिया में भागकर होती है शादी?, जयस अध्यक्ष ने बताया सच
Bhagoria Festival: भोंगर्या हाट रबी फसल की कटाई के बाद आदिवासियों द्वारा आदिवासियों के लिए पारंपरिक रूप फ्री समय अंतराल में किया जाता है, इसे फसलिया हाट भी कहते है। भोंगर्या मेला राजा कसुमर और बालुन के समय अस्तित्व में आया, यह मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल बड़वानी, धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खरगोन आदि कई जिलों के आदिवासी गांव में आयोजित होते है।
आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से आदिवासी संस्कृति की झांकिया दिखाई देती है। आदिवासी परिवार आपस मे कुलदेवी के पूजन हेतु सामग्री खरीदते है, तथा परिवार सहित भोंगर्या हाट देखते है। भोंगर्या हाट के समय बड़वानी, धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खरगोन आदि क्षेत्रों के हाट-बाजार मेले का रूप ले लेते हैं और हर तरफ फागुन के फूल पलास के पेड़ पर दिखाई देते और आदिवासी संस्कृति का बोलबाला रहता है।

जयस यानी जय आदिवासी युवा संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष लोकेश मुजाल्दा बताते हैं की, भोंगर्या हाट पर लिखी कुछ किताबों के अनुसार रबी की फसल कटाई के बाद के समय लगने वाले हाटों को कहा जाता था। इस समय दो भील राजाओं राजा कसुमर और बालून ने अपनी राजधानी भागोर में जिसमे फसल की कटाई के बाद सामग्रियों की खरीद के लिए विशाल मेले औऱ हाट का आयोजन करना शुरू किया। धीरे-धीरे आस-पास के भील आदिवासी राजाओं ने भी इन्हीं का अनुसरण करना शुरू किया जिससे हाट और मेलों को भोंगर्या कहना शुरू हुआ।
वहीं दूसरी ओर आदिवासियों के अलिखित इतिहास होने के कारण लोगों के द्वारा भ्रामक औऱ आधारहीन तथ्यों का प्रचार प्रसार कर कहा जाता है कि इस हाट बाजार में युवक-युवतियाँ अपनी मर्जी से भागकर शादी करते हैं या "आदिवासियों का वेलेंटाइन डे" तक कह दिया गया, जबकि ऐसा वास्तविकता में कुछ भी नही होता हैं यह सरासर गलत जानकारी हैं।
मुजाल्दा की माने तो आदिवासियों का इतिहास लिखित न होकर पारंपरिक, रूड़ी प्रथाओं के रूप में जिंदा है, अलिखित इतिहास होने के कारण इसका दुरुपयोग करते हुए इसका फायदा उठाया गया, टी. आर.पी और खबरों में "मसाला खबर" बनाने के लिए भोंगर्या को लेकर भ्रामक और आधारहीन तथ्य का पाठ्य पुस्तकों और इंटरनेट पर प्रचारित होने लगा। इससे आदिवासी समाज मे भोंगर्या हाट की छवि ख़राब करने की कोशिश की गई है।
मुजाल्दा ने बताया की, आदिवासी संगठनों की लगातार मांग पर मध्यप्रदेश सरकार के आदिम जाति कल्याण विभाग की अनुसंधान और विकास संस्था ने भोंगर्या हाट की स्टडी की है। इस संबंध में मध्यप्रदेश विधानसभा में अशासकीय प्रस्ताव भी पारित किया गया था। उसके बाद संस्था को भोंगर्या हाट के अध्ययन के लिए दायित्व सौंपा गया था। स्टडी में पाया गया कि भोंगर्या हाट में आदिवासी समूचे परिवार के साथ सामग्री खरीदने जाता है, साथ ही आदिवासी संस्कृति की झलकियां दिखाई देती है।
प्राचीन समय में आवागमन के साधन कम होने के कारण एक दिन बैलगाड़ी से पूरे परिवार के सदस्य आते हैं और अपने रिश्तेदारों से मिलने की खुशी में उन्हें पान खिलाया जाता था, भगोरिया भागकर शादी करने का पर्व नही, न ही परिणय पर्व है बल्कि रबी की फसल के उपरांत होने वाला हाट है । आदिवासी समाज में होली का डांडा गाड़ने के बाद कोई भी मांगलिक कार्य या शुभ कार्य नही होता है।
लेकिन जो पाठ्य पुस्तकों औऱ इंटरनेट पर भ्रामक और झूठे तथ्यों का प्रचार किया जो कि गलत है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने मसाले खबर वाली टी. आर.पी. के लिए कुछ भी दिखाया, प्रिंट मीडिया ने भोंगर्या की प्रतिष्ठा को क्षतिग्रस्त किया, इंटरनेट ने भोंगर्या हाट की छवि को बदनाम किया वही पाठ्यक्रम की पुस्तकों में लेखक ने बिना शोध के घर बैठे बैठे वास्तविकता से परे आधारहीन औऱ भ्रामक तथ्य लिखे जिसके परिणाम स्वरूप आदिवासी युवतियों के साथ दुर्व्यवहार होने लगा है, छेड़छाड़ और शोषण की खबरें सामने आती है। स्टडी सामने आने के बाद आदिवासी संगठनों ने लगातार मीडिया और इंटरनेट से प्रचलित झूठे और मिथ्यक ख़बरों को हटाने मांग कर रहा है ताकि छवि में सुधार किया जा सके है, वास्तविकता सामने रखी जाए।
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