दुनिया के पास खाने को नहीं, भारत में खाने से बनेगा तेल

Provided by Deutsche Welle

नई दिल्ली, 22 जून। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों का भारत पर असर कम करने के लिए भारत सरकार ने पिछले महीने 'ई-20 बाई 2025' योजना की शुरुआत की है. इसके तहत भारत में पेट्रोल में मिलाए जाने वाले बायोफ्यूल एथेनॉल की मात्रा साल 2025 तक बढ़ाकर 20 फीसदी की जानी है. फिलहाल भारत में पेट्रोल में 10 फीसदी एथेनॉल मिलाया जाता है.

भारत में ज्यादातर पेट्रोल आयात किया जाता है, जिसपर बहुत खर्च होता है. एथेनॉल की मिलावट के जरिए सरकार आयात खर्च में करीब 400 अरब रुपये की बचत करना चाहती है. लेकिन जब रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच दुनिया गंभीर खाद्य संकट का सामना कर रही है, तब खाने की चीजों से बनने वाले बायोफ्यूल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के भारत के कदम ने दुनियाभर में फिर बायोफ्यूल पर बहस शुरू कर दी है.

कारों में रोज जलता है 10,000 टन गेहूं

भारत से उलट यूरोपीय संघ के जर्मनी और बेल्जियम जैसे देश युद्ध से उपजे खाद्य संकट से निपटने के लिए बायोफ्यूल की पेट्रोल में मिलावट को कम करने पर विचार कर रहे हैं. ब्रसेल्स स्थित पर्यावरण कैंपेन समूह ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरमेंट से जुड़े माइक मारारेंस का कहना है, यूरोपीय संघ के देशों में एक दिन में कार में जल जाने वाला बायोफ्यूल करीब 10 हजार टन गेहूं के बराबर होता है. इस तथ्य पर दुनियाभर में काफी बहस हुई.

वॉशिंगटन स्थित थिंकटैंक वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट का भी कहना है कि यूरोप और अमेरिका में बायोफ्यूल के लिए इस्तेमाल होने वाले अनाजों में 50 फीसदी की कमी कर दें तो यूक्रेन से आयात होने वाले कुल गेहूं की भरपाई की जा सकती है. हालांकि कई अर्थशास्त्रियों ने ऐसी तुलनाओं को अतार्किक करार दिया है. फिर भी युद्ध से बायोफ्यूल का उत्पादन कम होना तय है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने इस साल के लिए बायोफ्यूल की अनुमानित विकास दर को 20 फीसदी घटा दिया है.

65 फीसदी उत्पादन गन्ने से

फिर भी दुनियाभर में बायोफ्यूल की मांग इस साल भी पांच फीसदी बढ़ेगी. वजह है अमेरिका और भारत सहित दुनिया के ज्यादातर बड़े वाहन बाजारों में पेट्रोल में बायोफ्यूल मिलावट के नियम. इंडोनेशिया में तो 30 फीसदी बायोडीजल की मिलावट का प्रावधान है. वहीं ब्राजील में यह दर 27 फीसदी है.

मीथेन के लीक को रोकने से बेहतर हो सकती है जलवायु

बायोफ्यूल अधिक स्टार्च वाली फसलों जैसे गन्ना, मक्का, आलू, चावल, अंगूर और गेहूं आदि से बनाया जाता है. भारत में गन्ना, अमेरिका में मक्का और इंडोनेशिया में यह पाम तेल से बनाया जाता है. भारत के कुल एथेनॉल का करीब 65 फीसदी गन्ने से आता है.

एस एंड पी ग्लोबल में बायोफ्यूल के विशेषज्ञ सम्यक पांडेय बताते हैं, "भारत में गन्ने का इस्तेमाल, गुड़-शक्कर, एथेनॉल और शराब तीनों के उत्पादन में होता है. ऐसे में देखना होगा कि एथेनॉल की मांग में बढ़ोतरी के बाद भी तीनों में संतुलन बना रह सकेगा या नहीं. ज्यादा सही रास्ता यही होगा कि भारत गन्ने के बजाए अमेरिका की तरह मक्के के इस्तेमाल से एथेनॉल निर्माण की कोशिश करे. सरकार इसके लिए कोशिशें भी कर रही है."

अभी अनाजों का विकल्प नहीं

फूड बनाम फ्यूल की लड़ाई के बीच जानकार यह भी सुझाते हैं कि बायोफ्यूल बनाने के लिए उन्हीं फसलों का इस्तेमाल किया जाए, जो खाने योग्य न हों. लेकिन सिर्फ खराब हुई फसल से औद्योगिक स्तर पर बायोफ्यूल का उत्पादन कर पाना नामुमकिन है. ऐसे में गैर अनाज विकल्प जैसे बांस, पराली और काई से भी बायोफ्यूल बनाने के प्रयोग चल रहे हैं लेकिन अभी औद्योगिक स्तर पर उनका उत्पादन नहीं हो रहा है.

भारत भी अभी वैश्विक औसत से कम ही एथेनॉल का उत्पादन करता है. भारत दुनिया के 19 फीसदी गन्ने का उत्पादन करता है, जबकि वैश्विक एथेनॉल उत्पादन में उसका हिस्सा 2 फीसदी ही है. भारत को अपने 2025 के लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक हजार करोड़ लीटर से ज्यादा एथेनॉल का प्रति वर्ष उत्पादन करना होगा, जो फिलहाल उपलब्ध उत्पादन क्षमता का करीब डेढ़ गुना होगा. यानी तेजी से और अधिक फसलें इस काम में लाई जाएंगीं.

वाकई पर्यावरण बचाएंगे बायोफ्यूल?

सम्यक कहते हैं, "गन्ना और चावल दोनों की ही खेती में भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है. ऐसे में इनसे एथेनॉल बनाने की जिद भारत में ग्राउंडवाटर की स्थिति को प्रभावित कर सकती है. इसलिए ध्यान देना होगा कि एथेनॉल से होने वाले लाभ के मुकाबले कहीं इसे बनाने की प्रक्रिया पर्यावरण को ज्यादा नुकसान न पहुंचाए."

बहरहाल एथेनॉल युक्त पेट्रोल की कीमत आम पेट्रोल से 8 से 10 रुपये प्रति लीटर कम होती है. लेकिन इसके लिए ऐसे इंजन वाली गाड़ियों की जरूरत भी होगी, जो आसानी से 20 फीसदी एथेनॉल वाले पेट्रोल से चल सकें. एक अनुमान के मुताबिक ऐसे दोपहिया वाहनों के दाम आम दोपहिया गाड़ियों से डेढ़ हजार रुपये से 3 हजार रुपये तक ज्यादा होंगे. लेकिन वाहन निर्माता ऐसी गाड़ियां बनाने पर कितना जोर दे रहे हैं, यह अभी साफ नहीं है.

Source: DW

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