26/11 हमला: फांसी से पहले कसाब के आखिरी अल्फाज थे- 'आप जीत गए, मैं हार गया'
नई दिल्ली। मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले को स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे बड़ी आतंकी घटना माना जाता है। इसी महीने इस घटना के 10 साल होने जा रहे हैं। 10 फिदायीन आतंकवादी समुद्र के रास्ते मुंबई आये और निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। हमलों में 166 लोग मारे गए थे और करीब 300 घायल हुए थे। उनमें से एक अजमल आमिर कसाब को जिंदा पकड़ा गया था। बाद में उसको फांसी दे दी गई। लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी अजमल आमिर कसाब से जिस सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर रमेश महाले ने सबसे पहले पूछताछ की थी, उनसे अपने अंतिम समय में कसाब ने कहा था, ''आप जीत गए, मैं हार गया।'' भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने समेत 80 मामलों में दोषी ठहराए गए कसाब ने अपनी फांसी से एक दिन पहले यह बात रमेश महाले से की थी।

डेथ वारंट मिलने से पहले तक कसाब को लगता था कि वो बच जाएगा
कसाब को विशेष रूप से बने बुलेटप्रूफ, उच्च सुरक्षा कक्ष में स्थानांतरित करने से पहले लगभग 81 दिन हिरासत में रखा गया। 2013 में सेवानिवृत्त हुए महाले ने कहा, " जब तक अदालत की तरफ से डेथ वारंट नहीं मिला था तब तक कसाब को लगता था कि भारतीय कानून से उसे छूट मिल जाएगी। मुंबई पुलिस की अपराध शाखा में लंबे समय से कार्यरत रहे रमेश महाले ने कई बातें इस मामले से जुड़ी हुईं बताईं।

कसाब से सच उगलवाने के लिए दिए दो जोड़ी नए कपड़े
कसाब से सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने नर्मी भी बरती। उन्हें पता था कि 21 वर्षीय कसाब को मुश्किल पूछताछ तरीके से 'तोड़ा' नहीं जा सकता। उन्होंने बताया हमने कसाब को सहज और आरामदायक महसूस कराया, और उसके 'टूटने' का इंतजार किया। महाले ने कसाब पर 'मेहरबानी' भी की , जिसमें उसे दो नए कपड़े भी लाकर दिए।

कसाब ने अफजल गुरू का हवाला देते हुए कहा था कि फांसी पर चढ़ाना मुमकिन नहीं
एक घटना का जिक्र करते हुए महाले ने कहा, ''जब कसाब को पकड़ा गया तो उसके करीब डेढ़ महीने बाद एक दिन जब मैं उससे पूछताछ कर रहा था तो उसने कहा था कि उसको गुनाहों के लिए फांसी दी जा सकती है लेकिन भारतीय न्यायिक व्यवस्था में फांसी की सजा देना मुमकिन नहीं है। कसाब ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरू का हवाला देते हुए कहा था, कोर्ट द्वारा उसको फांसी की सजा देने के आठ साल बाद भी लटकाया नहीं जा सका है।'' महाले उस दिन यह बात सुनकर चुप रह गए थे। उल्लेखनीय है कि बाद में अफजल गुरू को भी फांसी दे दी गई।

फांसी वाले दिन मौत का खौफ कसाब के चेहरे पर साफ दिखा
कसाब को जब फांसी के लिए मुंबई से पुणे ले जाया जा रहा था तो तकरीबन साढ़े तीन घंटे की यात्रा के दौरान वह एक शब्द भी नहीं बोला था। मौत का खौफ उसके चेहरे पर साफ महसूस किया जा सकता था। 21 नवंबर को अजमल कसाब को फांसी दे दी गई। उसको याद करते हुए महाले ने कहा, ''जब मैंने सुना कि उसको फांसी दे दी गई तो वह मेरे जीवन के सबसे बेहतरीन पलों में से एक था...क्योंकि न्याय हुआ और बुराई का खात्मा हुआ।''
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