World Students' Day : भारत रत्न डॉ कलाम ने दुनिया को सिखाया- FAIL मतलब नाकामी नहीं, सीखने में पहला प्रयास
World Students Day भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के जन्मदिन यानी 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। डॉ कलाम वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति से इतर एक शिक्षक के रूप में अधिक पहचाने जाते हैं।
World Students Day एक ऐसा मौका होता है जब दुनियाभर के विद्यार्थी भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को याद करते हैं। यूं तो 'मिसाइल मैन' का जीवन प्रतिदिन प्रासंगिक होता है, लेकिन डॉ कलाम को उनके जन्मदिन के मौके पर याद करना खास होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत रत्न डॉ एपीजे अब्दुल कलाम देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति के पद पर पहुंचने के बावजूद, सबसे पहले खुद को एक शिक्षक मानते थे। इसकी मिसाल उस समय मिली थी जब डॉ कलाम राष्ट्रपति भवन में कार्यकाल पूरा करने के अगले ही दिन चेन्नई में छात्रों के बीच जा पहुंचे और जीवन के अंतिम दिन देह त्याग से पहले भी ये महान विभूति देश के कर्णधारों यानी छात्रों के बीच ही थी। जानिए डॉ कलाम की 91वीं जयंती के मौके पर उनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें--
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डॉ कलाम ने रौशन किए लाखों जीवन
डॉ कलाम का व्यक्तित्व ऐसा रहा है जिसने भारत को खुद के पैरों पर खड़ा होना सिखाया। खास बात ये कि शुरुआती जीवन में आर्थिक तंगी और नैराश्य हावी होने के कारण कभी खुद सुसाइड करने जा रहे डॉ कलाम एक ऐसा प्रकाश पुंज बने जिससे लाखों जीवन रौशन हो रहे हैं। डॉ कलाम ने छात्रों को FAIL और NO शब्द के सही मायने समझाए थे। शायद इन्हीं दो शब्दों से छात्रों को सबसे अधिक निराशा भी होती है।

परमाणु और डॉ कलाम
भारत को परमाणु शक्ति से संपन्न करने में भी डॉ अब्दुल कलाम का अहम योगदान रहा। पोखरण परमाणु परीक्षण की वो तस्वीरें आज भी हर भारतवासी के दिलोदिमाग में जीवंत हैं, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के साथ नीली कमीज पहने डॉ कलाम वैश्विक पटल पर भारत के आत्मबल और और वैज्ञानिक प्रतिभा का जयघोष करते प्रतीत होते हैं। डॉ कलाम के करीबी बताते हैं कि उनकी सादगी का अंदाजा इसी बात से होता है कि राष्ट्रपति भवन में जब उनके परिजन और ग्रामीण पहुंचे थे तो तमाम खर्चे का भुगतान उन्होंने अपने वेतन से किया था। राष्ट्रपति भवन के अन्य कर्मचारियों के भोजन के साथ ही डॉ कलाम का खाना भी पकाया जाता था।

FAIL मतलब- First Attempt In Learning
डॉ कलाम ने अंग्रेजी भाषा के FAIL को कमाल के पॉजिटिव एटिट्यूड से देखा। निराशा से घिरने वाले छात्रों को कमाल के डॉ कलाम ने बताया कि FAIL का मतलब नाकाम होना नहीं, इसका सही अर्थ है सीखने की दिशा में पहला प्रयास यानी First Attempt In Learning. कहना गलत नहीं होगा कि ऐसा कमाल का दृष्टिकोण सिर्फ स्कूली पढ़ाई से विकसित नहीं होता। इसके लिए अनुभव के साथ-साथ जमीनी हकीकत से जुड़े रहना भी जरूरी है। शायद यही कारण है कि डॉ कलाम हमेशा सकारात्मक सोच विकसित करने पर जोर देते रहे।

NO इनकार नहीं, Next Opportunity
विद्यार्थी जीवन में जब हमें ना सुनने को मिलता है तो अक्सर ठेस लगती है। किसी का इनकार सुनकर बाल और छात्र मन को निराशा होती है। ऐसे समय में एक बार फिर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्रकाश पुंज बनकर हमारा मार्गदर्शन करते हैं। डॉ कलाम ने छात्रों को सिखाया कि NO का मतलब किसी का इनकार करना नहीं, इसका वास्तविक अर्थ है दूसरा मौका यानी Next Opportunity. ऐसे कमाल के विचारों के कारण ही डॉ कलाम हर भारतीय से आगे बढ़कर मानवता में यकीन रखने वाले इंसानों के बीच बहुत लोकप्रिय हुए।

सुसाइड की सोच से रायसीना हिल्स तक का सफर
अपनी आत्मकथा विंग्स ऑफ फायर में डॉ कलाम ने जीवन के उस स्याह पक्ष का जिक्र किया है कि कैसे उनके पास पैसे नहीं थे और उत्तराखंड में वे जीवन को नाकाम मान बैठे थे। परीक्षा में असफलता के बाद आत्महत्या जैसे विचार आने पर उन्हें एक ऋषि ने समझाया कि तुम्हारा जन्म इससे भी बड़े काम के लिए हुआ है, और ऐसा हुआ भी जब डॉ एपीजे अब्दुल कलाम देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति बने। कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि रायसीना हिल्स पर बने राष्ट्रपति भवन में डॉ कलाम की मौजूदगी से यह पूरा परिसर धन्य हुआ।

END का मतलब अवसर का अंत नहीं
विश्व छात्र दिवस 2022 के मौके पर डॉ कलाम का एक और कथन प्रासंगिक है। ये खासतौर पर युवाओं के लिए है। दरअसल, अक्सर ऐसा होता है कि नाकामी के कारण हम कहते हैं सब खत्म हो गया, यानी End. डॉ कलाम ने सिखाया कि End के मायने किसी चीज या किसी अवसर का अंत नहीं होता। उन्होंने बताया कि E.N.D. का अर्थ ‘प्रयास का कभी न मरना।' होता है यानी Effort Never Dies. कहना गलत नहीं होगा कि डॉ कलाम की जयंती के मौके पर उनके कथनों को जीवन में उतारना ही उन्हें सबसे सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

कब शुरू हुआ World Students’ Day
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती यानी, 15 अक्टूबर को विश्व छात्र दिवस गत 12 साल से मनाया जा रहा है। World Students' Day पहली बार 2010 में मनाया गया। भले ही संयुक्त राष्ट्र ने अभी तक 15 अक्टूबर को विश्व छात्र दिवस के रूप में घोषित नहीं किया है, लेकिन वैश्विक छात्र और शिक्षक समुदाय में इस दिन को लेकर विशेष उत्साह देखा जाता है।

1931 में तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्म
बता दें कि डॉ अबुल पाकीर जैनुल आब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 1931 में तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ। उनके बचपन के बारे में कहा जाता है कि बड़ा और संयुक्त परिवार होने के कारण गरीबी में पैसों के लिए संघर्ष होता था, लेकिन बालक कलाम ने हार नहीं मानी। उनके पिता नाव से मछलियों का व्यापार करने वाले लोगों को किराए पर नाव देते थे। उनके बालमन में रामेश्वरम के शिक्षक ई सोलोमन की एक बात का गहरा असर पड़ा। शिक्षक ने बताया कि जीवन में सफलता और अपने अनुकूल रिजल्ट पाने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था और अपेक्षा को अच्छे से समझना और इन्हें अपने अधीन रखना जरूरी है। ऐसी शिक्षा और बचपन में अखबार बेचने जैसे अथक परिश्रम के कारण कलाम के दिलोदिमाग में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा विकसित होना शुरू हुआ।

कलाम प्राइमरी स्कूल की शिक्षा पर
डॉ कलाम का मानना था कि एक शिक्षक को चरित्र, मानवीय मूल्यों के निर्माण में मदद करनी चाहिए। उन्होंने मूल्यों की शिक्षा के साथ-साथ बच्चों की सीखने की क्षमता को प्रौद्योगिकी के माध्यम से बढ़ाने पर भी जोर दिया। प्राइमरी स्कूल की शिक्षा पर डॉ कलाम कहते थे कि बच्चों में अभिनव और रचनात्मक होने का विश्वास पैदा करना चाहिए। ऐसा करने से बच्चों को भविष्य का सामना करने के लिए प्रतिस्पर्धी बनाने में मदद मिलेगी।

1997 में भारत रत्न डॉ कलाम बने
15 अक्टूबर 1931 को जन्मे डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से अपनी aeronautical engineering की पढ़ाई के बाद रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) में सेवाएं दीं। मिसाइल के मामले में भारतीय वैज्ञानिकों का संबल बनने वाले डॉ कलाम को 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। छात्रों के बीच रहने को लेकर उत्साहित रहने वाले डॉ कलाम पर अल्लामा इकबाल का शेर भी सटीक बैठता है जिसमें उन्होंने कहा,
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

चिरनिद्रा में सो गया मां भारती का सपूत
अल्लामा इकबाल के शेर का एक अर्थ ये है किअपने पुरुषार्थ के आगे व्यक्ति इस स्तर तक पहुंच सकता है कि प्रकृति खुद उससे उसकी मर्जी यानी इच्छा पूछती है, शायद इसी कारण शिक्षण और छात्रों के प्रति समर्पित डॉ कलाम के जीवन के आखिरी लम्हे भी एक शिक्षक के रूप में बीते। भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलांग (IIM Shillong) में लेक्चर के दौरान अचानक डॉ कलाम को हार्ट अटैक आया और मां भारती का ये सपूत हमारे बीच से विदा हो गया। हृदय गति रूकने के कारण मंच पर गिरे डॉ कलाम 27 जुलाई, 2015 को 83 वर्ष की आयु में चिरनिद्रा में सो गए। 83 साल के डॉ कलाम आखिरी लम्हों में भी वैसे ही विनम्र रहे। उन्होंने प्रोटोकॉल में खड़े सुरक्षाकर्मी से माफी मांगी और कहा, उन्हें खेद है कि उनके कारण उसे लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ा। इस घटना से कलाम के कद का अनुमान लगाया जा सकता है।
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