Women's Day पर सिंधुताई सपकाल की प्रेरणादायक कहानी, श्मशान की आग पर बनाई रोटी, हजारों बच्चों को बनाया सफल

Women's Day: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाता है। भारतीय इतिहास में महिलाओं का योगदान प्रमुख रुप से रहा है। प्राचीन ग्रंथों में भी कई विदुषी स्त्रियों का ज़िक्र मिलता है, जिनके ज्ञान के आगे बड़े-बड़े विद्वान भी नतमस्तक हो गए। विदुषी गार्गी, विदुषी मैत्रेयी, द्रौपदी या मंडन मिश्रा की पत्नी भारती प्राचीनकाल की इन विदुषी महिलाओं ने उस समय के कई विद्वानों को अपनी विद्वता से दांत खट्टे कर दिए थे।

आज के दौर में भी कुछ ऐसी महिलायें है जिनसे समाज को बहुत कुछ सीखने की जरुरत है। सिंधुताई सपकाल की कहानी जिसे जानकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। इनके जीवन से आपको ऐसी सीख मिल सकती है जिससे आप जीवन में कुछ कर गुजरने के लिए प्रेणित होंगे। कहा जाता है कि जीवन फूलों का सेज नहीं है। ये वाक्य सिंधुताई सपकाल पर बिल्कुल सटीक बैठती है। बचपन से ही ये पढ़ना चाहती थी लेकिन मां ने कहा पढ़कर क्या करोगी? और मात्र 10 साल की छोटी सी उम्र में उनसे तिगुना के लड़के से शादी कर दी।

Sindhu Tai

सिंधिताई ने मजबूरी में बेटी को स्टेशन पर छोड़ दिया था

शादी के बाद पति ने उन्हें एक अफवाह के वजह से घर से निकाल दिया। उस समय वो 9 माह की गर्भवती थी। बेघर सिंधुताई ने गायों के बीच में अपनी बेटी को जन्म दिया था। उस समय उनकी सहायता करने वाला कोई नहीं था तो उन्होंने खुद से अपनी नाल भी काटी। एक कार्यक्रम में उन्होंने जिक्र किया है कि उन्होंने अपनी गर्भनाल को 16 बार पत्थर मारकर तोडा था। गरीबी से वो इस कदर परेशान थी कि मजबूरी में उन्हें अपनी बेटी को स्टेशन पर छोड़ना पड़ा। इस घटना ने उन्हें इस प्रकार तोड़ दिया था कि उनके मन में आत्महत्या का ख्याल आने लगा।

श्मशान में शरण लेना पड़ा

सिंधुताई स्टेशन पर भीख मांगकर जीवन निर्वाह करती थी। उन्हें श्मशान में शरण लेना पड़ा। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने जलती हुई लाश की अग्नि पर क्रिया कर्म के लिए रखे आटे की रोटियाँ सेंककर अपनी भूख मिटाई थी और अपनी बच्ची को भी वहीं रोटियां खिलाई थी। अपने शुरू के दिनों में वो ट्रेन में भिक्षा मांगकर अपना जीवन निर्वाह करती थी।

अनाथ बच्चों को देखकर मन में जगी ममता

इस दौरान उन्होंने कई अनाथ और बेसहारा बच्चों को देखा जिसे देखकर उनके मन में ममता जग उठी। उन्होंने प्रण किया कि मैं इन अनाथ और गरीब बच्चों का सहारा बनूंगी। सिंधुताई को अपने जीवन में एक मकसद मिल गया। बस क्या था उनके जीवन ने ऐसी करवट ली जिससे समाज के अन्य लोगों को भी लाभ मिला। अनाथ बच्चों की देखभाल करना ही उनके जीवन का उद्देश्य बन गया। वो भीख मांग कर, लोगों से सहायता मांगकर उन बेसहारा बच्चों की देखभाल करने लगी। पहले लोगों ने उन्हें नकारा लेकिन उनके संघर्ष और ईमनदारी को देख वो पिघल गए।

1050 बच्चों को दिया सफलता का मंत्र

सिंधुताई ने अपने जीवन में करीब 1050 अनाथ बच्चों का पालनपोषण किया है। खास बात यह है कि इन सारे बच्चों को पालनपोषण के साथ अच्छी शिक्षा भी दी है। इनमें से कई लोग आज खुद अनाथाश्रम चलातें हैं और अपना कारोबार भी करते हैं। 73 वर्ष का उनका जीवन काफी संघर्ष से भरा था लेकिन समाज के प्रति उनकी इस दरियादिली से समाज को बहुत बड़ी प्रेरणा मिलती है।

समाज के प्रति उदार भाव रखने वाली मराठी फिल्म- मी सिंधुताई सपकाल बनाई गई है। वो हमेशा कहती थी 'स्वार्थ के लिए तो सभी जीते हैं, थोड़ा दूसरों के लिए भी जियो। इस अद्भुत कार्य के लिए उन्हें करीब 900 से अधिक राष्ट्रिय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने हमेशा पुरस्कार राशि अनाथालयों में खर्च की। दया और करुणा की प्रतिमूर्ती सिंधुताई का निधन 4 जनरी 2022 को हो गया। इनके निधन पर देश के प्रधानमंत्री समेत कई जानी-मानी हस्तियों ने शोक संवेदना प्रकट की थी।

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