क्या रद्द होगा वक्फ संशोधन अधिनियम? Supreme Court सोमवार को सुनाएगा बड़ा फैसला
Supreme Court on Waqf Amendment Act: सुप्रीम कोर्ट सोमवार (15 सितंबर 2025) को वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाने जा रहा है। यह फैसला इस बात पर होगा कि क्या इस नए कानून को अंतरिम रूप से निलंबित किया जाए या नहीं।
गौरतलब है कि अदालत ने इस मामले में मई महीने में तीन दिन तक सुनवाई के बाद 22 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया था। कुल 21 याचिकाओं के जरिए इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

क्या है पूरा मामला?
6 जून 2025 को अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी कर सभी वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण यूएमईईडी (Unified Waqf Management, Empowerment, Efficiency, and Development) नामक डिजिटल पोर्टल पर छह महीने के भीतर कराने का आदेश दिया। इसका विरोध करते हुए याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इससे समुदाय पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा।
22 अगस्त को सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं ने इस अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग की, तो चीफ जस्टिस भुषण आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने साफ कहा कि चूंकि फैसला पहले से सुरक्षित है, इसलिए अब अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं के ने क्या दिए तर्क?
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि 1954 से लेकर 2025 तक राज्य सरकारों और केंद्र का दायित्व था कि वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण और पहचान की जाए। लेकिन सरकार की इस असफलता का खामियाजा अब समुदाय को भुगतना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है, जिसमें अल्पसंख्यकों को अपनी संपत्तियों का प्रबंधन करने का अधिकार है। अन्य याचिकाकर्ताओं ने यह भी आपत्ति जताई कि नए कानून में वक्फ की स्थापना केवल ऐसे व्यक्ति द्वारा की जा सकती है जो कम से कम पांच साल से मुसलमान हो। उनका कहना था कि अन्य धर्मों की धार्मिक संपत्तियों के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कानून का बचाव करते हुए कहा कि 2013 के संशोधन में किसी भी व्यक्ति को वक्फ घोषित करने का अधिकार देना एक अवधारणात्मक गलती थी। उन्होंने सवाल किया कि "वक्फ, जो पूरी तरह से इस्लामिक अवधारणा है, उसे गैर-मुस्लिम कैसे घोषित कर सकते हैं?"
इसके अलावा, उन्होंने अनुसूचित जनजातियों की जमीन पर वक्फ बनाने पर प्रतिबंध का बचाव करते हुए कहा कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए है। हालांकि, पीठ ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि धर्म एक है, परंपराएं अलग हो सकती हैं।
अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा था कि वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की परंपरा सौ साल से अधिक पुरानी है। 1923 के मुसलमान वक्फ अधिनियम से लेकर 1954 और उसके बाद के कानूनों तक, संपत्तियों की सूची और पंजीकरण को हमेशा महत्वपूर्ण माना गया है। सोमवार को आने वाला यह फैसला न केवल वक्फ अधिनियम 2025 के भविष्य का निर्धारण करेगा बल्कि देशभर में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और पारदर्शिता के मुद्दे पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगा।
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