क्या दक्षिण भारत में I.N.D.I.A.के लिए आसान होगा 2024 का लोकसभा चुनाव? 131 सीटों पर है दांव
दक्षिण भारत के पांच राज्यों में कहीं भी बीजेपी की सरकार नहीं है। वह किसी भी राज्य में सत्ताधारी गठबंधन में भी शामिल नहीं है। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में से तीन राज्यों में विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक से जुड़ी पार्टियों का शासन है।
केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के अलावा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में जो सरकारें हैं, वह न तो इंडिया ब्लॉक में शामिल हैं और न ही केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी या एनडीए के साथ ही जुड़ी हुई हैं। इन पांचों राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर दक्षिण भारत में लोकसभा की 131 सीटें हैं।

इंडिया ब्लॉक के लिए बहुत आसान नहीं है मामला
जाहिर है कि दक्षिण भारतीय राज्यों में मौजूदा राजनीतिक स्थिति को देखते हुए इंडिया ब्लॉक अपने लिए बेहतर संभावनाएं देख रहा है। लेकिन, अगर जमीनी राजनीति को देखें तो यहां के समीकरण में भी बीजेपी विरोधी विपक्षी गठबंधन के लिए मामला बहुत आसान नहीं लग रहा है।
इंडिया के लिए केरल में अजीब स्थिति
उदाहरण के लिए केरल को लिया जाए। यहां सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF)की सरकार है, जो केंद्रीय स्तर पर इंडिया ब्लॉक में शामिल है। लेकिन, यहां उसके विपक्ष में कांग्रेस की अगुवाई वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट खड़ा है, जो मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार पर भारी भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहा है। दोनों गठबंधनों के जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच तो और भी दुश्मनी वाले हालात हैं। इंडिया ब्लॉक के लिए आपस में तालमेल करना केरल में सबसे बड़ी चुनौती होगी। वैसे विपक्ष दल इस बात से संतोष कर सकते हैं कि जीत जिसकी भी हो, वह इंडिया गठबंधन का ही माना जाएगा। यहां बीजेपी अभी भी खाता खोलने के लिए ही मेहनत कर रही है।
तेलंगाना में भी बहुत कठिन है रास्ता
तेलंगाना में दो कार्यकालों से सीएम केसीआर की भारत राष्ट्र समिति (BRS) की सरकार है। यहां बीआरएस के साथ सीपीएम और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम में तालमेल है। वही सीपीएम इंडिया ब्लॉक में भी शामिल है, जबकि मुख्यमंत्री की पार्टी और कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। कांग्रेस को यहां को लेकर कर्नाटक में मिली जीत के बाद काफी यकीन है। लेकिन, बीआरएस के प्रभाव और बीजेपी की सशक्त मौजूदगी उसकी राह का बहुत बड़ा रोड़ा है।
आंध्र प्रदेश में अभी दिल्ली दूर है
पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में तो कांग्रेस के लिए तेलंगाना से भी कड़ी चुनौती है। एक तो राज्य विभाजन की बात को यहां के लोग अभी तक 'दिल' से नहीं निकाल पाए हैं। दूसरी बात यहां की सत्ताधारी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी और मुख्य विपक्षी तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) दोनों ही कांग्रेस के विरोधी से ही पैदा हुई पार्टियां हैं। ये दोनों ही पार्टियां राज्य की राजनीति में काफी प्रभावी हैं। 2019 में 25 लोकसभा सीटों में से 3 ही सीट जीतने के बावजूद चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी को 40% वोट मिले थे।
वहीं 22 सीटों पर कब्जा करने वाली मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी को 50% वोट प्राप्त हुए थे। इन दोनों दलों के बीच कांटे की लड़ाई में कांग्रेस के माध्यम से इंडिया ब्लॉक कहां जगह बना पाएगा, वह देखने वाली बात होगी। वैसे भी नाडयू की गिरफ्तारी का चुनावों पर क्या असर पड़ेगा, यह अब बहुत बड़ा सवाल बन गया है।
कर्नाटक में बदल रहे हैं हालात
बात कर्नाटक की करें तो कांग्रेस को इस साल विधानसभा चुनावों में जो कामयाबी मिली है, उसने विपक्षी दलों के गठबंधन को भी चुनावी टॉनिक देने का काम किया है। लेकिन, तथ्य ये है कि अगले साल जब लोकसभा चुनावों के लिए वोट डाले जाएंगे तो विधानसभा चुनावों के करीब साल भर गुजर चुके होंगे। ऊपर से यहां की विपक्षी बीजेपी और जेडीएस ने कांग्रेस के खिलाफ आपस में हाथ मिला लिए हैं। इसलिए, लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस को कर्नाटक में विधानसभा चुनावों वाला 'मुरब्बा' मिल ही जाएगा, कहना बहुत कठिन है।
तमिलनाडु पर रखना होगा नजर
रही बात तमिलनाडु की तो यहां इंडिया ब्लॉक की सरकार है और डीएमके इसकी अगुवाई कर रही है। कांग्रेस उसका साथ वर्षों से दे रही है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन समेत पार्टी के अन्य नेताओं की ओर से सनातन धर्म के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी को बीजेपी बहुत बड़ा मुद्दा बनाने को तैयार है। हालांकि, इसपर उसकी सहयोगी एआईएडीएमके ने भी चुप्पी साध रखी है। वैसे इस मुद्दे पर बीजेपी को यहां संजीवनी जरूर मिली है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मूड से संकेत मिल रहा है कि यह आने वाले तमाम चुनावों में पूरी देश में बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है।












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