West bengal: क्या हिंसा के साये में होगा पश्चिम बंगाल विधानसभा का चुनाव?

2021 West Bengal Legislative Assembly election: पश्चिम बंगाल में अगले साल (मार्च-अप्रैल) विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके पहले भाजपा और तृणमूल कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई चरम पर है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस लड़ाई को केन्द्र बनाम राज्य का रूप दे रही हैं। भाजपा आध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमले के बाद हालात और खराब हुए हैं। जब इस मामले में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी को दिल्ली तलब किया तो उन्होंने आने से मना कर दिया। ममता सरकार ने केन्द्र के इस आदेश को राज्य के मामले में हस्तक्षेप करार दिया। भाजपा और तृणमूल दोनों एक दूसरे पर हिंसा भड़काने का आरोप लगा रहे हैं। जिस तरह से दोनों दलों के बीच टकराव और भिड़ंत बढ़ रही है उससे विधानसभा चुनाव के हिंसक होने का खतरा बढ़ रहा है। भाजपा की उपाध्यक्ष और पूर्व आइपीएस अधिकारी भारती घोष ने आरोप लगाया है कि पूर्व नक्सली नेता छत्रधर महतो के जरिये तृणमूल कांग्रेस आतंक और भय का वातावरण तैयार कर रही है। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा की एक स्थायी प्रवृति बन गयी है। क्या इस बार चुनाव आयोग इस पर अंकुश लगा पाएगा?

नड्डा के काफिले पर हमला
10 दिसम्बर को दक्षिण 24 परगना जिले में भाजपा का एक कार्यक्रम था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्ड, पश्चिम बंगाल भाजपा प्रभारी कैलाश विजयवर्गीज अन्य पार्टी नेताओं के साथ कोलकाता से दक्षिण 24 परगना जा रहे थे। जब इनका काफिला डायमंड हार्बर इलाके के देवीपुर में पहुंचा तो सड़क के किनारे खड़े लोगों ने पत्थर फेंकने शुरू कर दिये। नड्डा की गाड़ी चूंकि बुलेटफ्रूफ थी इसलिए वे बच गये लेकिन कैलाश विजयवर्गीज के बायें हाथ में फ्रैक्चर हो गया। पत्थरों के प्रहार से उनकी कार का शीशा टूट गया था जिससे उनके हाथ में चोट लगी। इस मामले में पश्चिम बंगाल पुलिस ने सात लोगों को गिरफ्तार किया है। मुख्य सचिव का कहना है कि भाजपा अध्यक्ष की सुरक्षा में कोई कमी नहीं थी। चूंकि उनके काफिले में कारों की संख्या अधिक थी इसलिए पुलिस कुछ वाहनों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकी। दूसरी तरफ भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि हमने घटना के वीडियो को देखा है। पत्थर और लाठी-डंडे से हमला किया गया था। लेकिन हम डरने वाले नहीं।

लोकसभा चुनाव के बाद भड़की थी हिंसा
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का रक्तरंजित इतिहास रहा है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के पहले ही तनाव गहराने लगा है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यहां भयंकर हिंसा हुई थी। भारतीय जनता पार्टी ने बंद का आयोजन किया था जिसमें हिंसा भड़क गयी थी। खुद ममता बनर्जी ने माना था कि इस मारकाट में 10 लोग मारे गये थे। भाजपा ने जब यहां लोकसभा की 18 सीटें जीत लीं तो उनकी तृणमूल से अदावत बढ़ गयी। तृणमूल को 12 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था। वोट शेयर में भी भाजपा उससे केवल तीन फीसदी ही कम थी। अब तृणमूल को ये डर सता रहा है कि कहीं भाजपा विधानसभा चुनाव में भी न बाजी मार ले। इसलिए वह पहले से अधिक आक्रामक हो गयी है। भाजपा पश्चिम बंगाल का किला जीतना चाहती है और तृणमूल भाजपा को रोकना चाहती है। इस जोर आजमाइश से स्थिति विस्फोटक हो रही है। 2018 के पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में 12 लोग मारे गये थे। उस समय भी दक्षिण 24 परगना जिला सबसे अशांत रहा था। पिछले महीने ही नादिया जिले में भाजपा कार्यकर्ता विजय शील का शव पेड़ से लटका मिला था। भाजपा ने तब तृणमूल पार्टी का विजय की हत्या का आरोप लगाया था। भाजपा का आरोप है कि पिछले चार साल में अब तक उसके 87 कार्यकर्ताओं की हत्या की गयी है। तृणमूल कांग्रेस इसे भाजपा का दुष्प्रचार बताती है।

चुनावी हिंसा एक स्थायी प्रवृति
ऐसा नहीं है कि चुनावी हिंसा का आरोप केवल तृणमूल कांग्रेस पर है। जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा का शासन था तब तो चुनावी रंजिश ने हत्या का काला इतिहास रच दिया गया था। 1997 में बुद्धदेव भट्टाचार्या वाममोर्चा की सरकार में गृहमंत्री थे। उन्होंने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि 1977-1996 तक कुल 28 हजार लोग राजनीतिक हिंसा में मारे गये थे। राजनीतिक हिंसा का यह आंकड़ा भारत के किसी भी राज्य में सबसे अधिक था। यानी राजनीतिक खून-खराबा पश्चिम बंगाल की जड़ों में समाया हुआ है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के मुताबिक 2016 के दौरान पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की 91 घटनाएं हुईं थी जिसमें 205 लोग मारे गये थे। यानी यहां रक्तरंजित राजनीति का सिलसिला जारी है चाहे जिस पार्टी की भी सरकार हो। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि इस राज्य में सरकार अपनी पार्टी के कैडरों को संरक्षण देने के लिए सीधे प्रशासन में हस्तक्षेप करती है जिससे कानून का शासन संभव नहीं हो पाता। सत्तारुढ़ पार्टी के कार्यकर्ता पंचायत से लेकर राज्य स्तर के ठेकों पर प्रभुत्व जमाने के लिए बल और हिंसा का प्रयोग करते हैं। वे दूसरे दल के लोगों को दबा कर रखते हैं। पहले कम्युनिस्ट सरकार पर ये आरोप लगता था। अब तृणमूल कांग्रेस पर लगा रहा है।












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