अगला राष्ट्रपति चुनाव बीजेपी के लिए मुश्किल क्यों हो गया है ? जानिए

नई दिल्ली, 17 अप्रैल: केंद्र की मोदी सरकार को दबाव में लाने के लिए यूपी में बीजेपी को हराने की रणनीति में विपक्ष पूरी तरह से फेल रहा है। यूपी ही नहीं, उसने चार-चार राज्यों में सत्ता में डटे रहने की रिकॉर्ड बना दिया है। लेकिन, विपक्ष की उम्मीदें अभी भी टूटी नहीं हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष अब कुछ महीने बाद होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए गोटी सेट करने में जुट चुका है। अंक गणित में जाएंगे तो भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली बीजेपी की राह 2017 के राष्ट्रपति चुनाव से कहीं ज्यादा मुश्किल हो चुकी है। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं, क्योंकि इसके पीछे ठोस वजहें हैं।

जुलाई में खत्म हो रहा है राष्ट्रपति कोविंद का कार्यकाल

जुलाई में खत्म हो रहा है राष्ट्रपति कोविंद का कार्यकाल

24 जुलाई से पहले देश के लिए नए राष्ट्रपति का चुनाव हो जाना है। क्योंकि, राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद का कार्यकाल जुलाई में खत्म हो रहा है। देश में राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष मतदान के तहत होता है, जिसमें निर्वाचक मंडल ही अगला राष्ट्रपति तय करता है। राष्ट्रपति चुनाव में निर्वाचक मंडल संसद के दोनों सदनों के सांसदों और राज्य विधानसभाओं के विधायकों से मिलकर बनता है। एक सांसद के वोट का मूल्य एक एमएलए से ज्यादा होता है। प्रत्येक एमपी के वोट का वैल्यू 708 है। जबकि, विधायकों के वोट का मूल्य उस राज्य की आबादी (1971 की जनगणना) के आधार पर तय होता है। यानी इसमें उत्तर प्रदेश के नवनिर्वाचित विधायकों का पलड़ा भारी है।

2017 के मुकाबले राज्यों में कम हुई बीजेपी की ताकत

2017 के मुकाबले राज्यों में कम हुई बीजेपी की ताकत

2017 में जब एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद चुने गए थे तो 21 राज्यों में एनडीए की सरकारें थीं। राष्ट्रपति कोविंद 65.65 फीसदी वोट लाकर राष्ट्रपति भवन पहुंचे थे और विपक्ष की उम्मीदवार और पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार सिर्फ 34.35 फीसदी ही वोट ला पाई थीं। लेकिन, 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में बीजेपी संसद में तो पांच साल पहले के मुकाबले ज्यादा ताकतवर है, लेकिन उसकी सिर्फ 17 राज्यों में ही सरकारें रह गई हैं। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्य उसके हाथ से निकल चुके हैं। शिवसेना, टीडीपी और अकाली दल जैसे दल भी एनडीए से बाहर हो चुके हैं। अलबत्ता जेडीयू जरूर भाजपा के साथ आई है, लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी ने तब आरजेडी के साथ होने पर भी प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल होने के नाते राष्ट्रपति कोविंद का समर्थन किया था।

अंक गणित में विपक्ष का पलड़ा भारी

अंक गणित में विपक्ष का पलड़ा भारी

इस बार राष्ट्रपति चुनाव में कुल वोट का मूल्य लगभग 10.9 लाख होगा। इसमें राज्यसभा के 234 और लोकसभा के 539 सांसदों में से प्रत्येक सांसदों के वोट का मूल्य 773 के हिसाब से देखें तो यह आंकड़ा 5,47,284 होगा। लेकिन, पांच वर्षों में राज्यों में नुकसान की वजह से अगर सांसदों और विधायकों के वोट मूल्य के हिसाब से तुलना करें तो बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए के पास कुल 48.9% निर्वाचक मंडल का ही जुगाड़ बैठता है। अगर सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट हो जाएं तो उनके निर्वाचक मंडल का ग्राफ 51.1% तक पहुंच जाता है। यानी एनडीए का पलड़ा 2.2% अंकों से हल्का हो रहा है। लेकिन, राजनीति में अंक गणित पर केमिस्ट्री भारी पड़ना कोई अजूबा चीज नहीं है; और 2014 से देश इसका गवाह बनता आया है।

तीन श्रणियों में बंटा है विपक्ष

तीन श्रणियों में बंटा है विपक्ष

अब विपक्ष के अंक गणित और केमिस्ट्री पर नजर डालने की आवश्यकता है। सांसदों और विधायकों को मिलाकर कांग्रेस और उसके सहयोगियों, मतलब शिवसेना, मुस्लिम लीग, राजद, डीएमके,एनसीपी और झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास 2,38,868 या 21.9% वोट है। विपक्ष की दूसरी श्रेणी में टीएमसी, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे दल हैं, जिनके पास 19.7% वोट हैं।

बीजेपी के लिए विपक्ष में ही उम्मीद की किरण

बीजेपी के लिए विपक्ष में ही उम्मीद की किरण

विपक्ष की एक और श्रेणी भी है, जो अपने-अपने क्षेत्रीय राजनीति के चलते कांग्रेस से दूर रहता आआ है और भाजपा सरकार का कई बार राज्यसभा में बेड़ा पार करा चुका है। ये पार्टियां हैं-ओडिशा की बीजेडी, आंध्र प्रदेश की वाईएसआरसीपी और तेलंगाना की टीआरएस। इनके पास भी 9.5% वोट है। भाजपा के पास अपना राष्ट्रपति बिठाने के लिए विपक्ष से सिर्फ 2.2% वोट कम है और अगर वह 1.1% से भी थोड़ा ज्यादा वोट का और जुगाड़ कर ले तो उसका काम आसान ही आसान है। इनमें से अकेले वाईएसआरसीपी के पास 4%, बीजेडी के पास 2.9% और टीआरएस के पास 2.2% वोट हैं।

राज्यसभा की 52 सीटों के चुनाव पर भी नजर

राज्यसभा की 52 सीटों के चुनाव पर भी नजर

इन तीनों विपक्षी दलों में से इस वक्त तेलंगाना राष्ट्र समिति के साथ भाजपा का गणित बिगड़ा हुआ है। हालांकि, भाजपा के सूत्रों का कहना है कि इस विपक्षी श्रेणी का सभी वोट उसके हक में आएगा और वह 58% निर्वाचक मंडल का जुगाड़ कर लेगी। मतलब, यह चुनाव मोदी की अगुवाई वाले सत्ताधारी गठबंधन के लिए एकतरफा तो नहीं ही लग रहा है। आने वाले दिनों में ये दल केंद्र से तोलमोल भी बढ़ा सकते हैं। यही नहीं आने वाले दिनों में राज्यसभा की 52 सीटों पर चुनाव भी होने हैं। यूपी में खाली हो रहे 11 सीटों में से भाजपा मौजूदा 5 सीटों की अपनी मौजूदा संख्या में 2-3 का इजाफा भी कर ले, लेकिन राजस्थान, महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़, तमिलनाडु और झारखंड उसके लिए बड़ी चुनौती हैं। इसलिए, अभी की सियासी केमिस्ट्री में बीजेपी के लिए जो लड़ाई थोड़ी चुनौतीपूर्ण लग रही है, आने वाले दिनों में यह बहुत मुश्किल भी हो सकती है।

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