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कर्नाटक की स्कूली किताबों में हेडगेवार का भाषण क्यों शामिल कर रही है सरकार

कर्नाटक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के भाषण को स्कूली पाठ्यक्रम करने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. हेडगेवार के इस भाषण को स्कूली बच्चों के लिए निर्धारित कन्नड़ भाषा की एक किताब में शामिल किया जा रहा है.

कुछ शिक्षाविदों का मानना है कर्नाटक सरकार ने भगत सिंह पर एक पाठ को हटाने के फैसले को रद्द कर एक बड़े विवाद को टाल दिया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भगत सिंह के पाठ को सिलेबस से हटाने के फैसले का विरोध किया था. विरोध और हंगामे के बाद सरकार ने भगत सिंह पर लिखे गए अध्याय को हटाने का फैसला टाल दिया.

लेकिन खास बात ये है कि कर्नाटक देश में पहला ऐसा राज्य है, जिसने हेडगेवार पर लिखे पाठ को नहीं उनके भाषण को स्कूली सिलेबस में शामिल किया है. इस शिक्षा सत्र में दसवीं क्लास के छात्र इस भाषण को पढ़ेंगे.

देश में कई ऐसे राज्य हैं, जहां बीजेपी का दशकों तक शासन रहा है. लेकिन अब तक किसी राज्य ने हेडगेवार के भाषण को स्कूली पाठ में शामिल नहीं किया था. हेडगेवार के जिस भाषण को स्कूली सिलेबस में शामिल किया जा रहा है. उसका नाम है - 'आदर्श व्यक्ति कौन है'.

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क्या कह रही है राज्य सरकार?

राज्य के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री नागेश बीसी ने बीबीसी से कहा, '' अभी तक हेडगेवार के किसी भाषण को एक पाठ के तौर पर शामिल नहीं किया गया था. अगर इस कंटेंट की आलोचना होती है तो मैं इसे सुनने के लिए तैयार हूं. जहां तक भगत सिंह के अध्याय को हटाने की बात है तो ऐसा कभी सोचा भी नहीं गया था. किसी भी सूरत में इसे दोबारा छपना ही है. ''

भगत सिंह के भाषण को न हटाने के फैसले से लगता है सरकार का मनोबल बढ़ गया है. यही वजह है कि शांत स्वभाव वाले मंत्री टेलीविजन चैनलों पर जोर-शोर से बोलते देखे गए. उन्होंने कहा, '' होने दीजिये विरोध. लेकिन सरकार स्कूली सिलेबस से हेडगेवार का भाषण नहीं हटाएगी''

हेडगेवार के भाषण का ये पाठ उन बच्चों की किताब में शामिल किया गया है, जो अपनी पहली भाषा के तौर पर कन्नड़ पढ़ते हैं. इसमें कई ऐसे दूसरे मुद्दे से जुड़े पाठ भी शामिल हैं, जिन्हें 'वाम और उदार रुझान' न होने की वजह से 'दरकिनार' किया गया था.

आरएसएस
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टेक्स्ट बुक रिव्यू कमेटी के चेयरमैन रोहित चक्रतीर्थ ने बीबीसी हिंदी से कहा, '' हमने सिलेबस में भगत सिंह के युवा दिनों और उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के बारे में और चीजें जोड़ी हैं. जबकि पहले के पाठ में उन दिनों का जिक्र था, जब वे छोटे थे. ''

लेकिन कर्नाटक सरकार हेडगेवार के जिस भाषण को सिलेबस में शामिल करने पर पड़ी हुई है उसमें आखिर है क्या?

चक्रतीर्थ कहते हैं, '' ये उनके कई भाषणों में से एक है. हालांकि इसके बारे में ज्यादा पता नहीं है. यह संघ आंदोलन के आखिरी पंद्रह साल के दौरान दिया गया उनका भाषण है ( हेडगेवार का 1940 में निधन हो गया था) . इस भाषण को दूसरे लोगों ने नोट कर तैयार किया था. ''

वह कहते हैं, '' ये छोटे बच्चों के लिए काफी अहम है. जो समाज के अलग-अलग हिस्सों से अपने रोल मॉडल चुनते हैं. वे क्रिकेटर या फिल्म अभिनेताओं को रोल मॉडल के तौर पर देखते हैं. इस उम्र में वे काफी भ्रम की स्थिति में होते हैं. इस भाषण से उनका नजरिया साफ होगा. उनके लिए वैसे रोल मॉडल अहम हैं, जिन्होंने मूल्यों पर जीवन जिया है. ''

इस मामले पर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने बीबीसी हिंदी से कहा, '' भारत की आजादी की लड़ाई में हेडगेवार ने कभी भी हिस्सा नहीं लिया. इसलिए एक सांप्रदायिक व्यक्ति के भाषण को छात्रों को पढ़ाने का क्या तुक है? हम कानूनी विशेषज्ञों से मशविरा कर रहे हैं ताकि सरकार के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दी सके. ''

एक और पूर्व मुख्यमंत्री और जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी ने एक ट्वीट सीरीज के जरिये सरकार के इस फैसले पर कड़ा प्रहार किया है. एक ट्वीट में उन्होंने कहा है, '' हिजाब, हलाल और कारोबार के मुद्दों को हवा देने के बाद बीजेपी अब स्कूली किताबों के पीछे पड़ गई है. '' उन्होंने कहा, '' यह उनके गिरने की पराकाष्ठा है''.

लेकिन सरकार के इस फैसले के खिलाफ माकपा से जुड़े स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया और कुछ दूसरे संगठनों को छोड़ कर किसी दूसरे बड़े राजनीतिक दल के छात्र या युवा संगठनों ने एक प्रदर्शन तक नहीं किया है.

हेडेगेवार पेशे से डॉक्टर थे, वह बंक्रिम चंद्र चटर्जी और वी एस सावरकर की हिंदुत्व की व्याख्या से काफी प्रभावित थे. उन्होंने आजादी के आंदोलनों में हिस्सा लेना शुरू किया था लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के बाद वे इससे दूर ही रहे. उन्होंने उस दौरान हिंदू राष्ट्र बनाने के मकसद से हिंदुओं को संगठित करने तक ही खुद को सीमित कर लिया था.

हेडगेवार के इस भाषण में क्या है?

हेडगेवार के इस भाषण का शीर्षक है. '' आदर्श व्यक्ति कैसा हो.''

इसकी प्रस्तावना में कहा गया है कि एक आदर्श व्यक्ति के रूप में ऐसा व्यक्ति खोजना मुश्किल है, जिसमें कोई खामी न हो. इसलिए किसी व्यक्ति को आदर्श या मिसाल के तौर पर देखने के बजाय ऐसे सिद्धांत अपनाए जाएं जिनमें परिवर्तन न हो और आदर्श के तौर पर आपके आंतरिक मूल्य बने रहें. लेकिन इस दर्शन को व्यवहार में लाना भी उतना ही मुश्किल है.

'' यही वजह है कि समाज में मूर्ति पूजा का अस्तित्व सामने आया''

'' मूर्ति पूजा विश्व शक्ति की अमूर्त प्रकृति के बारे में चेतना फैलाने का एक जरिया है. ''

इस भाषण में कहा गया है, '' हम ध्वज को एक गुरु की तरह मानते हैं और गुरुपूर्णिमा के दिन इसकी पूजा करते हैं. जब भी हम अपने झंडे को देखते हैं तो हमारे देश का पूरा इतिहास, संस्कृति और परंपरा हमारी आंखों के सामने आ जाता है. जिस वक्त हम अपने ध्वज को देखते हैं, हमारे हृदय में भावनाएं उमड़ पड़ती हैं. इसलिए हम अपनी ध्वजा को गुरु मानते हैं. ''

'' कृष्ण जैसे संपूर्ण व्यक्तित्व को देवताओं या अवतारों के समूह में धकेल दिया गया है. इसलिए यह भावना बन गई है कि उनके जैसा आचरण करना हमारे बूते में नहीं है. श्रीराम और श्रीकृष्ण की पूजा होती है. रामायण, गीता, महाभारत जैसे महान ग्रंथों का पाठ उनके गुणों को ग्रहण के लिए नहीं होता है. ये सिर्फ पुण्य कमाने के लिए होता है ( अच्छे कर्मों के फल के तौर पर) . कितनी संकीर्ण सोच है ये. ''

वह कहते हैं, ''हमारे पतन के कारणों में इस तरह की संकीर्ण सोच भी शामिल है. यहां तक कि छत्रपति शिवाजी और लोकमान्य तिलक भी अवतारों में शामिल कर लिए गए हैं.''

'' ये बड़ी विचित्र बात है कि हमारे महापुरुष देवताओं की श्रेणी में शामिल कर लिए गए हैं. इसलिए कोई भी उनके गुणों के ग्रहण करने की बात नहीं सुनता. कुल मिलाकर हम सबने इस दक्षता और अपनी जिम्मेदारियों को टालने की कला में पारंगत होने की कला सीख ली है. ''

इन लेखकों को सिलेबस से हटाया गया

जिन लेखकों को स्कूली किताबों से हटाया गया है उनमें से पुरस्कृत लेखक पी लंकेश, सारा अबुबकर और ए एन मूर्ति राव शामिल हैं. इनके बदले शिवानंद कलवे, एम गोविंद राव, वैदिक स्कॉलर स्वर्गीय गोविंदाचार्य और सतवदनी आर गणेश को शामिल किया गया है.

इस बदलाव पर चक्रतीर्थ ने कहा, ''छात्रों को लंकेश और मूर्ति राव की कहानियां बोरिंग लग रही थीं. इसलिए हमने नए नाम और ताजगी भरे कंटेंट लाने के बारे में सोचा. आपको लंकेश की किताब में कोई मूल्य नहीं दिखेगा. टेक्स्टबुक में ये कंटेंट संक्षिप्त है. इनका साहित्यिक महत्व नहीं है. इसलिए हमने इसे हटा दिया''

विकासवादी शिक्षाविद और 'नेवरहुड कॉमन स्कूल सिस्टम थ्रू स्टेट फंडेड पब्लिक एजुकेशन' के चीफ़ एडवोकेट प्रोफेसर निरंजनराध्या वी पी चक्रतीर्थ के इस मत से सहमत नहीं हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''इतिहास पढ़ाने का मकसद ये है कि छोटे बच्चों को स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों के बारे में बताया जाए. इसके मूल्यों को बच्चों के दिमाग में बिठाना इसलिए भी जरूरी है कि भारत का स्वतंत्रता संग्राम दुनिया भर में चल रही आजादी की लड़ाइयों में सबसे लंबा थी. लेकिन हेडगेवार स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं थे. ''

'' ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे तर्कवाद पर मूर्ति राव के पाठ को हटा रहे हैं. इसमें वैज्ञानिक मिजाज की बात की गई है. संविधान में इसे बढ़ावा देने की बात की गई है. ''

वह कहते हैं, '' साफ तौर पर सरकार की जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है. क्लासरूम में एक तरह के बच्चे नहीं आते हैं. इसमें अलग-अलग पृष्ठभूमियों के बच्चे आते हैं. सभी वर्ग के बच्चे इसमें पढ़ते हैं. अगर उन्हें इस तरह की चीजें पढ़ने को दी जाएंगीं तो वे भ्रम में पड़ जाएंगे और उनके बीच विभाजन पैदा होगा. ''

वह कहते हैं, '' पिछले दो या इससे थोड़े अधिक समय से सरकार ने अपनी रणनीति बदल दी है. पहले टीपू सुल्तान से जुड़ा पाठ पूरी तरह हटा दिया गया. लेकिन अब टीपू को मैसूर का टाइगर कहे जाने से कोई गुरेज नहीं है. तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने के खिलाफ हुए काफी विरोध के बाद यह रुख बदला है. पहले वो भगवाकरण को लेकर असहज थे. लेकिन अब वे खुलेआम भगवाकरण की बात करते हैं. ''

'' सबसे बड़ा डर तो यह है कि वे पाठ्यपुस्तकों को मेनिफेस्टो में तब्दील कर रहे हैं. उन्होंने चुनावी साल में इसकी शुरुआत कर दी है. वे असली मुद्दों को नजरअंदाज कर रहे हैं. राज्य में एक शिक्षक वाले छह हजार स्कूल हैं. टेक्स्टबुक की सप्लाई नहीं है. ऐसे हालात में इस तरह के मुद्दे ध्यान भटकाने के लिए उठाए जा रहे हैं. ''

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