आखिर क्यों शांतिनिकेतन यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल? 5 पाइंट्स में जानें खासियत
पश्चिम बंगाल राज्य की राजधानी कोलकाता में जन्में विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता रबींद्रनाथ टैगोर का नाम एक बार फिर जगत में गूंजा है। उनके द्वारा 1901 में स्थापित शांतिनिकेतन को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया है।
यह वही, शांतिनिकेतन है, जिसने कई नोबेल पुरस्कार विजेता से लेकर सर्वोच्च सम्मान पाने वाले कई लेखक, गायक-गायिकाएं, चित्रकार, कलाकार देश को दिए हैं। रबींद्रनाथ टैगोर अपना अधिकांश जीवन इसी शांतिनिकेतन में बिताते थे। आइए पलटते हैं इतिहास के उन पन्नों को जिसपर लिखी हैं शांतिनिकेतन की यादें...

- कोलकाता से 180 किलोमीटर दूर उत्तर की ओर पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित शांति निकेतन ने शिक्षा के क्षेत्र में कई योगदान दिए हैं। 'शांतिनिकेतन' पहले आश्रम हुआ करता था। जिसकी स्थापना रबींद्रनाथ टैगोर के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी साधना के लिए किया था।
- 22 दिसंबर 1901, से औपचारिक रूप से आश्रम ने काम करना शुरू किया। यहां बच्चों की शिक्षा के लिए एक प्रयोगात्मक विद्यालय स्थापित किया। जिसमें पांच से ज्यादा छात्र नहीं थे। बाद में शांति-निकेतन, विश्व भारती विश्वविद्यालय के नाम से प्रख्यात हुआ।
- रबींद्रनाथ टैगोर का मानना था कि बच्चों को प्रकृति के सानिध्य में शिक्षा हासिल करनी चाहिए। इसलिए बच्चों को किसी पेड़ के नीचे जमीन पर बैठाकर शिक्षा दी जाती है।
- रबींद्रनाथ टैगोर को प्रकृति से काफी लगाव था। इसलिए शांति निकेतन के आसपास लाल मिट्टी पर खड़े पेड़-पौधे, बदलते मौसम के रंग, जानवरों एवं चिड़ियों से भरे प्राकृतिक परिवेश देखने को मिलता है।
- शांतिनिकेतन के विश्व-भारती विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति और परम्परा के अनुसार दुनियाभर की किताबें पढ़ाई जाती हैं। यह संस्थान कला प्रेमियों की पहली पसंद माना जाता है। इसलिए इसे म्यूजिक, डांस, ड्रामा जैसी सांस्कृतिक कलाओं का हब भी कहा जाता है।












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