केजरीवाल सरकार अपने 12 कॉलेजों में लोगों की सैलरी क्यों नहीं दे रही?

अरविंद केजरीवाल
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अरविंद केजरीवाल

दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के 12 कॉलेजों के कर्मचारियों को तनख़्वाह नहीं दिए जाने पर यूनिवर्सिटी प्रशासन को आड़े हाथों लिया है.

शिक्षा मंत्री कार्यालय की ओर से बीबीसी को भेजे गए बयान में कहा गया है कि जब इस साल 56 करोड़ रुपए जारी किए जा चुके हैं, तो अब तक टीचर्स को तनख़्वाह क्यों नहीं दी गई है.

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सिसोदिया ने कहा है कि बीते पाँच सालों में दिल्ली सरकार की ओर से पूरी तरह वित्त पोषित कॉलेजों के बजट आबंटन में 70 फ़ीसदी इज़ाफ़े के बावजूद इन कॉलेजों का अपने कर्मचारियों को तनख़्वाह न दे पाना भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है.

वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष राजीब रे ने बीबीसी से बातचीत में अपना पक्ष रखा है.

आख़िर क्या है मामला

केजरीवाल सरकार अपने 12 कॉलेजों में लोगों की सैलरी क्यों नहीं दे रही?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंतर्गत 12 ऐसे कॉलेज आते हैं, जो सरकारी पैसे से चलते हैं. इसका मतलब ये है कि इन कॉलेजों को अपने लगभग हर ख़र्च का पैसा सरकार से लेना होता है.

लेकिन बीते तीन महीनों से ये कॉलेज अपने शैक्षणिक और ग़ैर शैक्षणिक कर्मचारियों को वेतन नहीं दे पा रहे हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ इस अव्यवस्था के लिए दिल्ली सरकार को ज़िम्मेदार ठहराता है.

संघ का दावा है कि एक साल से ज़्यादा समय से दिल्ली सरकार इन 12 कॉलेजों को फंड जारी करने में अनियमितता बरत चुकी है.

दिल्ली सरकार से 100 फीसदी फंडिंग पाने वाले कॉलेज हैं -

1- आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज

2 - शहीद राजगुरु कॉलेज

3. इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िजिकल एजुकेशन एंड स्पोर्ट्स साइंस

4. शहीद सुखदेव कॉलेज ऑफ़ बिज़नेस स्टडीज़

5. दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज

6. भगिनी निवेदिता कॉलेज

7. केशव महाविद्यालय

8. अदिति महाविद्यालय

9. डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज

10. महाराजा अग्रसेन कॉलेज

11. महर्षि वाल्मीकि कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन

12. भास्कराचार्य कॉलेज ऑफ एप्लाइड साइंस

वेतन नहीं मिलने से गंभीर होती स्थितियाँ

केजरीवाल सरकार अपने 12 कॉलेजों में लोगों की सैलरी क्यों नहीं दे रही?

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष राजीब रे ने बीबीसी को बताया है कि कई शिक्षकों के परिवारों में सरकार के इस रवैए की वजह से स्थिति काफ़ी गंभीर हो गई है.

वे कहते हैं, “12 में से ज़्यादातर कॉलेजों में मई, जून, और जुलाई का वेतन नहीं दिया गया है. शिक्षक और कर्मचारियों को मिलाकर लगभग 2000 लोग हैं. तनख़्वाह नहीं मिलने की वजह से कई परिवारों में काफ़ी गंभीर स्थितियाँ पैदा हो रही हैं. कहीं मेडिकल से जुड़े ख़र्च को वहन करना मुश्किल हो रहा है तो कहीं रोज़मर्रा के ख़र्च को लेकर समस्याएँ पैदा हो रही हैं.”

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“सोचकर देखिए, एक कैंसर मरीज़ के इलाज में कितना ख़र्च होता है, और एक मरीज़ का एक साल से मेडिकल बिल रिएम्बर्स नहीं हुआ है. कॉन्ट्रेक्ट पर काम कर रहे कर्मचारियों की क्या हालत हो रही होगी...”

लेकिन दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने आँकड़े पेश करते हुए बताया है कि वित्त वर्ष 2020 -21 के लिए आबंटित 243 करोड़ रुपए में से 56.52 करोड़ जुलाई महीने के अंत तक जारी किए जा चुके हैं.

सिसोदिया ने कहा है कि कुल आबंटित बजट में से 23 फ़ीसदी जारी होने के बाद भी डीयू के कॉलेज अप्रैल, मई और जून की तनख्वाह देने में समर्थ क्यों नहीं हैं.

वह कहते हैं, “दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के अलावा दिल्ली का शिक्षा विभाग कई अन्य विश्वविद्यालयों की फ़ंडिंग करता है लेकिन हमें कभी भी उनकी ओर से कोष ख़त्म होने या तनख्वाहें नहीं दे पाने की बातें सुनने को नहीं मिलती हैं.”

दिल्ली के शिक्षक संघ ने सरकारी आँकड़ों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी है.

राजीब रे कहते हैं, “दिल्ली सरकार ने कुछ आँकड़े पेश किए हैं. मेरे हिसाब से मनीष सिसोदिया जी को शायद पता भी नहीं है. इन कुछ सालों में सातवाँ वेतन आयोग आया, EWS में व्यापकता आई, कुछ कोर्सेज़ के लिए स्वीकृति मिली. ऐसे में जब आप कोर्स चलाने के लिए सहमति देते हैं तो उसके स्टाफ़ के लिए भी सहमति देते हैं. ऐसे में अगर आप स्टाफ़ बढ़ाओगे तो पैसे देने पड़ेंगे.

“EWS का एक्सपेंशन हुआ, कुछ अतिरिक्त कोर्सेज़ शुरू किए गए. ऐसे में इनके लिए भी तो अतिरिक्त पैसे दिए जाएँगे न? हम तो यही कह रहे हैं कि पिछले साल जो दिया था उतना भी इस साल नहीं दिया है. इसका क्या कारण है?

भ्रष्टाचार का आरोप

केजरीवाल सरकार अपने 12 कॉलेजों में लोगों की सैलरी क्यों नहीं दे रही?

मनीष सिसोदिया ने अपने बयान में ये कहा है कि बीते पाँच सालों में दिल्ली सरकार के वित्त पोषित कॉलेजों के बजट में 70 फ़ीसदी इज़ाफे के बावजूद तनख़्वाह न दिया जाना भ्रष्टाचार होने के संकेत देता है.

उन्होंने कहा है कि गवर्निंग बॉडी बनाने से इनकार और भ्रष्टाचार की कई शिकायतें दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाती है, मैंने पिछले महीने इन भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों को लेकर डीयू वाइस चांसलर को पत्र लिखा था और अब तक में उसके जवाब का इंतज़ार कर रहा हूँ.”

दिल्ली सरकार की ओर से जारी किए गए आँकड़ों के मुताबिक़, साल 2014 से लेकर 2020 तक राज्य सरकार की ओर से आवंटित राशि 144 करोड़ से बढ़कर 243 करोड़ हो चुकी है.

राज्य सरकार की ओर से प्रतिवर्ष दी गई राशि (रुपए में)

2012-13 – 121.82 करोड़

2013-14 – Rs 140.65 करोड़

2014-15 – Rs 144.39 करोड़

2015-16 – Rs 181.94 करोड़

2016-17 – Rs 197 करोड़

2017-18 – Rs 214.78 करोड़

2018-19 – Rs 216.13 करोड़

2019-20 – Rs 242.64 करोड़ रुपये

2020-21 - 243 करोड़ (56.25 करोड़ जारी)

स्रोत: दिल्ली सरकार

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मनीष सिसोदिया की ओर से भ्रष्टाचार की बात किए जाने पर शिक्षक संघ ने भी प्रतिक्रिया दी है.

राजीब रे कहते हैं कि अगर सरकार को लगता है कि भ्रष्टाचार हो रहा है, तो सरकार उसे रोकने के लिए प्रयास करे.

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वे कहते हैं, ”सरकार भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रही है. बहुत अच्छी बात है. इसमें कोई दिक़्क़त नहीं है. लेकिन ख़ाली मुद्दा उठाने से तो कुछ नहीं होगा. इसका समाधान भी चाहिए. अगर भ्रष्टाचार हो रहा है तो भ्रष्ट लोगों को पकड़ें. लेकिन जिन्होंने करप्शन नहीं किया है – कर्मचारी और शिक्षकों ने भ्रष्टाचार नहीं किया है. न वो बोल रहे हैं कि इन्होंने किया है. तो उनकी तनख़्वाह क्यों रोकी गई है. ख़ुद ही कह रहे हैं न कि अब तक 23 फ़ीसदी दिया है जबकि अब तक 40 फ़ीसदी तक आ जाना चाहिए था.”

“हम भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ में उनके साथ हैं. लेकिन टीचर और कर्मचारी काम करते हैं, और तीन तीन महीने तक तनख़्वाह न मिले तो इसके लिए वे खुद ज़िम्मेवार हैं.”

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