वीर कुंवर बहादुर के जन्मोत्सव को इस धूमधाम से क्यों मना रही है बीजेपी?

भारतीय जनता पार्टी ने शनिवार को 1857 विद्रोह के क्रांतिकारी वीर कुंवर सिंह के विजयोत्सव पर तिरंगा फहराने का विश्व कीर्तिमान बनाने की तैयारी की है.

सम्राट अशोक की जयंती मनाने के ठीक दो सप्ताह बाद प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति को वीर कुंवर सिंह के नाम के सहारे जन- जन के मन में पिरोने का प्रयोग बिहार के भोजपुर जिला के दुलौर में किया जा रहा है.

Why is BJP celebrating the birth anniversary of Veer Kunwar Bahadur with this pomp?

शनिवार को आयोजित होने वाले विजयोत्सव की अगुवाई केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह करेंगे.

नवंबर, 1777 को बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गाँव में जन्मे वीर कुंवर सिंह का प्रभाव क्षेत्र बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर समेत बिहार के शाहाबाद, मगध प्रमंडल, दानापुर और समूचा चंपारण था. इन इलाकों के विभिन्न दलित जातियों और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के लोगों के भी वीर कुंवर सिंह ही महानायक थे.

ब्रिटिश इतिहासकार होम्स ने उनके बारे में लिखा है कि " यह गनीमत थी कि युद्ध के समय कुंवर सिंह की उम्र लगभग 80 साल की थी. अगर वह जवान होते तो शायद अंग्रेजों को 1857 में ही भारत छोड़ना पड़ता ".

वहीँ लेफ्टिनेंट जेनेरल एसके सिन्हा की किताब " वीर कुंवर सिंह- दी ग्रेट वारियर ऑफ 1857 " में इस बात का विस्तार से उल्लेख किया गया है कि " वीर कुंवर सिंह जगदीशपुर रियासत के ऐसे रियासतदार थे जिनकी आर्थिक ताकत कमजोर थी, लेकिन सामाजिक ताकत इतनी गहरी और व्यापक थी कि दानापुर विद्रोह के बाद इंग्लैंड में कंपनी सरकार की चूलें हिल गयी थीं. तब दानापुर छावनी में जो दलित जाति के सैनिक थे उसमें से एक भी सैनिक कंपनी सरकार का वफादार नहीं रहा था. दानापुर से लेकर मसौढ़ी तक सैनिक और गरीब- खेतिहर मजदूर ' बाबू साहेब ' के कमांडर थे ".

जाहिर है विजयोत्सव के बहाने भारतीय जनता पार्टी की नजर इसी सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टि (विजन) पर है. उनकी स्वीकार्यता को अपनी स्वीकार्यता में तब्दील करना भारतीय जनता पार्टी का पहला उद्देश्य जान पड़ता है.

भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष और सांसद संजय जायसवाल विजयोत्सव के उद्देश्य के बारे में कहते हैं कि " प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का आह्वाहन था कि हम अपने सभी स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करेंगे. इसी के तहत बिहार में पहले स्वतंत्रता संग्राम के वीर कुंवर सिंह का विजयोत्सव मना रहे हैं. कुंवर सिंह पहले राजा थे जिन्होने अंग्रेजों को हराकर गद्दी हासिल की. देश भर में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण भारत में नहीं मिलेगा जहाँ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जीतने के बाद किसी राजा की मृत्यु हुई हो और वह भी अपने राज्य को वापस लेकर. उनकी याद को अविस्मर्णीय बनाने के लिए ही यह आयोजन किया जा रहा है ".

राजनीतिक विश्लेषक नरेंद्र पाठक के अनुसार " कुंवर सिंह स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक थे जिनके साथ वंचित समाज के अछूत कही जाने वाली जातियों, मुसलमान और उच्च जाति के गरीब लोगों का गहरा जुड़ाव था. लोकतांत्रिक तरीके से उन्होंने अपने संगठन के विस्तार और वंचित जातियों में अपना कैडर तैयार करने के उद्देश्य से बाबू कुंवर सिंह जैसे महानायक से बेहतर और कौन हो सकता है. शनिवार को कुंवर सिंह की जयंती समारोह को व्यापक तरीके से मनाने की भाजपा की योजना को मैं इसी परिपेक्ष्य में देखता हूँ ".

उधर राज्य के मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी का कहना है कि भाजपा को ऐसे आयोजन करने का कोई मौलिक अधिकार ही नहीं है. उनके अनुसार " 1857 के विद्रोह में निःसंदेह उनका अभूतपूर्व योगदान रहा है. वह दौर धर्मनिरपेक्ष था. उनके साथ दलित समाज के राजवंशी, मुसलमान सभी थे. कुंवर सिंह ने तो मस्जिद का भी निर्माण करवाया था. कुंवर सिंह बिलकुल धर्मनिरपेक्ष छवि के नेता थे. भाजपा किस अधिकार से उनके नाम पर यह कार्यक्रम कर रही है.

डुमराव महाराज परिवार के लोग किस पार्टी में हैं. वो तो 1857 में कुंवर सिंह के विरोध में अंग्रेजों से मिल चुके थे.

वे कहते हैं कि " बिहार विधान सभा चुनाव और बोचहा विधानसभा उपचुनाव में मिली हार के बाद से ये लोग कभी सम्राट अशोक तो कभी कुंवर सिंह के नाम पर जातीय गोलबंदी का प्रयास कर रहे हैं. सब वर्ष 2024 में होने वाले संसदीय चुनाव को ध्यान में रखकर किया जा रहा है ".

हालाँकि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल विपक्ष के आरोपों का खंडन करते हैं और कहते हैं कि " सेनानियों को जातीय बंधन में नहीं देखा जा सकता. जो भी ऐसा कह रहा है उसे शर्म आनी चाहिए. कुंवर सिंह के बॉडीगार्ड माली और दुसाध जाति के थे. वे सबको साथ लेकर चलते थे. ऐसे व्यक्तित्व को जातीय बंधन में बांधना घृणित है ".

वहीँ भाजपा के वरिष्ठ नेता नंद किशोर यादव का कहना है कि यह कार्यक्रम चुनाव के पहले से ही तय था. इसलिए चुनाव के संदर्भ में इस आयोजन को देखना कोरी बकवास बात है ".

पक्ष- विपक्ष के दावों के बीच इतिहासविद प्रो. पंकज झा का मानना है कि सम्राट अशोक और कुंवर सिंह दोनों भले बिहार के थे, लेकिन दोनों ही राष्ट्रीय स्वाभिमान के प्रतीक हैं. उनके अनुसार " इन दोनों नायकों की जाति के अलावा इनकी वर्तमान छवि भी अलग- अलग है. सम्राट अशोक का यश उनके साम्य और समावेशी होने में है तो कुंवर सिंह के राष्ट्रवाद में आक्रामक मर्दानगी है. ये इतिहास की बारीकियां हैं जिससे आम लोग बहुत वाकिफ नहीं होते हैं.

देखना है कि सत्तारूढ़ दल इन किरदारों में कौन से रंग भरती है. वैसे इनके पास सोशल मीडिया और पारंपरिक मीडिया को अपने तरीके से जोत देने की सहूलियत और संसाधन भी हैं ".

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