यूपी में भारी पड़ सकता है कांग्रेस का सपा-बसपा के साथ चुनाव लड़ना

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस लगातार विपक्षी दलों को महागठबंधन के साथ जोड़ने की कोशिशों में जुटी है। कांग्रेस के लिए यूपी और बिहार सबसे बड़ा लक्ष्य है जहां पार्टी खुद की स्थिति को मजबूत करने के लिए लगातायर कवायद कर रही है। मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव के दौरान सपा-बसपा ने कांग्रेस से दूरी बनाई थी, लेकिन चुनाव के बाद दोनों ही पार्टियों ने कांग्रेस को समर्थन दिया और सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई। दोनों ही प्रदेश में सपा-बसपा के विधायकों को मंत्रालय में जगह नहीं मिली, जिसकी वजह सपा और बसपा कांग्रेस को यूपी में दरकिनार करने की पटकथा रचने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए यूपी में सपा और बसपा के साथ गठबंधन की राह काफी मुश्किल लग रही है।

गठबंधन में नजरअंदाज

गठबंधन में नजरअंदाज

सपा और बसपा के बीच यूपी में गठबंधन तकरीबन तय है, अब महज सीटों के बंटवारे को लेकर पेंच फंसा है, माना जा रहा है जल्द ही सीटों के मसले को सुलझा लिया जाएगा और गठबंधन का आधिकारिक ऐलान कर दिया जाएगा। लेकिन इस संभावित गठबंधन के बीच जिस तरह की खबरें सामने आ रही हैं उसके अनुसार कांग्रेस को इस गठबंधन में काफी नुकसान होने वाला है। माना जा रहा है कि सपा और बसपा कांग्रेस को सिर्फ उसकी परंपरागत सीट देने के पक्ष में हैं, ऐसे में कांग्रेस का गठबंधन में बने रहना आसान नहीं होगा।

30 साल से सियासी सूखा

30 साल से सियासी सूखा

यूपी में कांग्रेस को अपना अस्तित्व वापस पाने के लिए इस बार काफी मशक्कत करने की जरूरत है। यूपी में पिछले 30 वर्षों से कांग्रेस अपनी सियासी जमीन तलाशने में जुटी है। आखिरी बार यूपी में कांग्रेस की सरकार दिवंगत एनडी तिवारी की थी, 1989 में एनडी तिवारी सरकार के बाद यूपी में सपा, बसपा और भाजपा की ही सरकार रही है। लिहाजा कांग्रेस के लिए आने वाला चुनाव आसान नहीं होने वाला है। हाल में जिस तरह से तीन हिंदीभाषी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है, उसके बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह है, लिहाजा पार्टी के पास यह विकल्प है कि वह इसका फायदा आगामी चुनाव में उठाए।

गठबंधन में होगा नुकसान

गठबंधन में होगा नुकसान

दरअसल यूपी में 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 14 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत दर्ज की थी। गौर करने वाली बात है कि दोनों ही बार पार्टी ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा था। लेकिन 2014 के चुनाव में पार्टी ने सपा के साथ गठबंधन किया था और पार्टी सिर्फ 7 सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी। 2014 में पार्टी के खराब प्रदर्शन की बड़ी वजह यह थी कि पार्ट ने सपा के साथ गठबंधन किया और चुनाव में पार्टी के नेताओं को उस पार्टी का प्रचार करना पड़ा जिसका वह पिछले चार साल तक विरोध करते रहे।

अकेले लड़ना फायदे का सौदा

अकेले लड़ना फायदे का सौदा

पार्टी के नेताओं का मानना है कि जिन सीटों पर पार्टी रनर अप रहती थी, उन सीटों को महागठबंधन में दे दिया गया जिससे पार्टी के वोट में कटौती हुई जिसका पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। ऐसी में अगर सपा और बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करते भी हैं तो माना जा रहा है कि कांग्रेस को 5-10 सीटें ही गठबंधन में मिलेंगी, लिहाजा कांग्रेस के लिए बेहतर विकल्प यह है कि वह अकेले ही चुनावी मैदान में उतरे, जिससे ना सिर्फ पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा बल्कि चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद कांग्रेस बेहतर स्थिति में हो सकती है। यही नहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी अपनी स्थिति को और भी मजबूत कर सकती है।

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