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पीएम मोदी के लोकसभा क्षेत्र बनारस में MLC चुनाव क्यों हारी बीजेपी?

बनारस में नरेंद्र मोदी
Reuters
बनारस में नरेंद्र मोदी

उत्तर प्रदेश में मंगलवार को संपन्न हुए विधान परिषद चुनावों में राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने 36 में से 33 सीटें जीत लीं.

हालांकि बनारस की सीट पर पार्टी के उम्मीदवार सुदामा पटेल को निर्दलीय अन्नपूर्णा सिंह ने बुरी तरह से पछाड़ दिया.

अन्नपूर्णा सिंह को कुल 4,234 मत मिले. वहीं समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी उमेश यादव को 345 वोट मिले, तो भाजपा के डॉ. सुदामा पटेल को महज़ 170 वोट मिल पाए.

इस तरह एमएलसी चुनावों में भाजपा को मिली एकतरफ़ा जीत के बीच बनारस में मिली यह क़रारी हार हर जगह चर्चा में बनी हुई है. साथ ही इससे कई सवाल भी खड़े हो गए हैं.

मालूम हो कि अन्नपूर्णा सिंह पूर्वी उत्तर प्रदेश के 'बाहुबली' बृजेश सिंह की पत्नी हैं.

सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर ऐसा क्या हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भाजपा के एमएलसी प्रत्याशी इतनी बुरी तरह से अपना चुनाव हार गए?

बृजेश सिंह के बारे में क्या कहा भाजपा प्रत्याशी ने?

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 100 सीटों में से 36 सीटों के लिए हुए ताज़ा चुनाव में स्थानीय निकाय यानी पंचायतों और नगर निकायों के चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने मतदान किया. कई ज़िलों की तरह बनारस में भी इन संस्थाओं में भाजपा का काफ़ी दबदबा है.

इसके बावजूद, भाजपा के प्रत्याशी डॉ. सुदामा पटेल ने नौ अप्रैल के मतदान के पहले अन्नपूर्णा सिंह के पति और जेल में बंद बृजेश सिंह पर अपने 'बाहुबल' के इस्तेमाल का आरोप लगाया.

उन्होंने बनारस में पत्रकारों से बात करते हुए अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बारे में कहा, "इतने बड़े बाहुबली जब चुनाव मैदान में होते हैं तो बहुत सारे कार्यकर्ता साइलेंट हो जाते हैं."

सुदामा पटेल आगे कहते हैं, "आप समझ ही रहे हैं कि वाराणसी के सेंट्रल जेल में माननीय बृजेश सिंह जी बंद हैं. यहीं पर रहते हैं. सेंट्रल जेल में उनसे मिलने जुलने वालों का ताँता लगा रहता है. लोगों में डर समाया रहता है कि कहीं सुदामा पटेल का हम बहुत ज़्यादा (प्रचार) करेंगे तो हम चिह्नित हो जाएंगे."

ब्रजेश सिंह के प्रभाव के बारे में सुदामा पटेल ने कहा, "ऐसे लोगों का हम डिटेल क्या बता सकते हैं कि क्या प्रभाव है. आप लोग हमसे ज़्यादा जानते हैं. पैसे तो बाँटे ही जा रहे हैं, उनके पास तो हज़ारों करोड़ों का एम्पायर है. पैसे बाँटने में उनको कोई दिक़्क़त तो है ही नहीं. मेरे जैसे कार्यकर्ता के पास तो इतना पैसा है नहीं."

मतदान से पहले मीडिया से बात करे हुए सुदामा पटेल ने कहा था कि वो इसकी शिक़ायत बनारस के ज़िला अधिकारी से करेंगे और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी बताएँगे कि "दिक़्क़त आ रही है."

लेकिन अंत में सुदामा पटेल ने यह भी कहा था कि चुनाव बाद "यह मैटर क्लोज हो जाएगा."

मंगलवार को मतगणना शुरू होने के पहले बनारस के मीडिया ने एक बार फिर सुदामा पटेल को घेरा और पूछा कि क्या भाजपा ने उन्हें सपोर्ट नहीं किया? इसके जवाब में सुदामा पटेल बोले, "ऐसा नहीं है. पार्टी ने ही टिकट दिया है. पार्टी ने ही चुनाव लड़ाया है. पार्टी की जितनी ताक़त थी, पार्टी ने दिखाई होगी."

उसके बाद बीबीसी से बात करते हुए सुदामा पटेल ने कहा, "हमें लगता है कि इस चुनाव से माफ़िया राज का प्रभाव बढ़ा. लोगों में एक संदेश जाएगा कि हम माफ़िया बनेंगे, दबंग बनेंगे तो हम कुछ भी कर सकते हैं समाज में. पैसे के बल पर कुछ भी कर सकते हैं."

सुदामा आगे कहते हैं, "डॉक्टर सुदामा चुनाव नहीं हारा है. हम तो भाजपा के क्षेत्रीय मंत्री हैं. हम संगठन का काम करते रहे हैं और करते रहेंगे. लेकिन मैसेज ग़लत गया कि ऐसे माफ़िया लोग लड़ जाएँ तो पता चला कि भाजपा ही पीछे हट जाएगी और माफ़िया जीत जाएगा. बाद में प्रत्याशी ने बयान दिया कि हमें मुख्यमंत्री जी का आशीर्वाद हमेशा प्राप्त रहा है."

अन्नपूर्णा सिंह ने किसे दिया जीत का श्रेय

उधर बृजेश सिंह की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह ने भाजपा के सुदामा पटेल की हार और अपनी जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जनता को दिया.

अन्नपूर्णा सिंह ने यह भी कहा कि वो "आगे प्रधानमंत्री जी, माननीय मुख्यमंत्री जी, माननीय अमित शाह जी के नेतृत्व में जो आदेश होगा उनका पालन" करेंगी.

सुदामा पटेल के आरोपों को अन्नपूर्णा सिंह ने बेबुनियाद बताते हुए कहा, "ऐसा कुछ भी नहीं है. आरोप लगाने दीजिए. इसमें धनबल का कोई प्रयोग नहीं हुआ है. जनता का प्रेम है. विकास के मुद्दे वही हैं जो होना चाहिए. जो सरकार कर रही है."

कौन हैं बृजेश सिंह और क्या है उनका 'इतिहास'?

लंबे समय से बनारस की राजनीति कवर करते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार असद कमल लारी, ब्रजेश सिंह और उनके परिवार के राजनीतिक पृष्ठभूमि के बारे में बीबीसी हिंदी से बात की.

वो कहते हैं, "बृजेश सिंह इसी निकाय के एमएलसी हैं, जिस पर उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह चुनाव जीत कर आई हैं. उन्हीं का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है, जिसमें उनकी पत्नी आ रही हैं. और बृजेश सिंह के दिवंगत भाई उदयनाथ सिंह भी इसी सीट से एमएलसी रहे हैं. बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह भी सैयद राजा सीट से भाजपा के दूसरी बार के विधायक हैं. बृजेश सिंह का भतीजा बनारस में ज़िला पंचायत का अध्यक्ष रहा है. उनके परिवार के कई लोग सक्रिय राजनीति में रहे हैं."

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में बृजेश सिंह की एक अलग छवि रही है. मालूम हो कि वाराणसी क्षेत्र की एमएलसी सीट पर बृजेश सिंह का परिवार पिछले 24 साल से क़ाबिज़ है.

उनका परिवार इकलौता ऐसा परिवार है, जिसके सदस्य एमएलसी, विधायक, ज़िला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुख रहे हैं. उनके भतीजे सुशील सिंह अब तक चार बार विधायक रह चुके हैं.

बृजेश सिंह इस बार फिर चुनाव लड़ना चाहते थे और उन्होंने नामांकन भी दाख़िल क दिया था. लेकिन बाद में उन्होंने नामांकन वापस लेकर अपनी पत्नी अन्नपूर्णा को चुनाव लड़वाया.

चुनाव आयोग के पास दायर किए गए अपने हलफ़नामे में बताया गया कि बृजेश सिंह के ख़िलाफ़ आठ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या और हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोप भी शामिल हैं.

सवाल उठता है कि बृजेश सिंह के भतीजे अगर भाजपा से नेता हैं तो पार्टी ने उनकी पत्नी को भी इस चुनाव में टिकट देने की बजाय डॉ. सुदामा पटेल को क्यों उतारा?

इस बारे में असद लारी कहते हैं, "बृजेश सिंह तो जेल में बंद हैं, लेकिन अन्नपूर्णा सिंह पर कोई आरोप है नहीं. तमाम ऐसे मामले हैं जिसमें कोई व्यक्ति जेल में हैं तो उसके परिवार के लोगों को पार्टी ने चुनाव लड़ा दिया. या ये हो सकता है कि बृजेश सिंह का भतीजा भाजपा के विधायक हैं तो परिवारवाद से बचने के लिए भाजपा उनकी पत्नी को टिकट नहीं देना चाहती हो."

क्या भाजपा ने दिया अन्नपूर्णा को वॉकओवर?

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार असद कमल लारी कहते हैं कि बनारस में हुई भाजपा की इस हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. उनके मुताबिक़, "निकाय के वोटर चिह्नित होते हैं, उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है. किस दल के कितने वोटर हैं वो भी चिह्नित होते हैं."

लारी आगे कहते हैं, "नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम तक, सब जगह बहुमत भाजपा का है. तो अगर अन्नपूर्णा सिंह भारी मतों से जीती हैं तो शिफ़्ट तो भाजपा के ही वोटर हुए ना? प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में, उनके ज़िले में भाजपा का ही कैंडिडेट हार जाता है और निर्दलीय जीत जाता है."

सुदामा पटेल के बाहुबल और धनबल के इस्तेमाल के बारे में पत्रकार असद लारी कहते हैं, "सत्तारूढ़ दल का प्रत्याशी चुनाव हार जाता है और उनके दल के लोग स्विच कर जाते हैं, तो क्या इतना बाहुबल है कि सत्ता उसके सामने नतमस्तक हो जाती है? यह बड़ा हास्यास्पद भी है."

बनारस में भाजपा के प्रत्याशी की हार के बारे में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 36 सीटों में से 33 सीट जीत कर इतिहास रचा है. जिन तीन सीटों पर पराजित हुई है, पार्टी उनके स्थानीय कारणों की समीक्षा करेगी. लेकिन परिणाम ये बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के पक्ष में जो वातावरण हैं, वो चाहे सामान्य जनता हो, या जन प्रतिनिधि हों, उन सबके बीच में पार्टी का एक आकर्षण है."

त्रिपाठी आगे कहते हैं, "भाजपा के लिए हर सीट महत्वपूर्ण है. हम कोई वीआईपी सीट या कोई ख़राब सीट नहीं मानते. हर सीट की अपनी रणनीति होती है. कहीं भी पराजय हुई है, वहां पर स्थानीय कारण क्या रहे हैं, उनकी समीक्षा होगी."

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