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आम आदमी पार्टी में बार-बार इस्तीफ़े क्यों होते हैं?

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    आशुतोष, आम आदमी पार्टी, AAP, Aam Aadmi Party, Ashutosh
    PTI
    आशुतोष, आम आदमी पार्टी, AAP, Aam Aadmi Party, Ashutosh

    आम आदमी पार्टी से उसके वरिष्ठ सदस्य आशुतोष का इस्तीफ़ा ऐसी ख़बर नहीं है जिसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हों. इस्तीफे के पीछे व्यक्तिगत कारण नज़र आते हैं और समय पर सामने भी आ जाएंगे.

    अलबत्ता यह इस्तीफ़ा ऐसे मौके पर हुआ है जब इस पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. एक सवाल यह भी है कि इस पार्टी में बार-बार इस्तीफ़े क्यों होते हैं?

    आशुतोष ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा ट्विटर पर जिन शब्दों से की है, उनसे नहीं लगता कि किसी नाराज़गी में यह फ़ैसला किया गया है. दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल ने जिस अंदाज़ में ट्विटर पर उसका जवाब दिया है, उससे लगता है कि वे इस इस्तीफ़े के लिए तैयार नहीं थे.

    https://twitter.com/ArvindKejriwal/status/1029637026390450176

    आशुतोष ने अपने ट्वीट में कहा था, "हर यात्रा का एक अंत होता है.'आप' के साथ मेरा जुड़ाव बहुत अच्छा/क्रांतिकारी था, उसका भी अंत आ गया है. इस ट्वीट के तीन मिनट बाद उन्होंने एक और ट्वीट किया जिसमें मीडिया के दोस्तों से गुज़ारिश की, 'मेरी निजता का सम्मान करें. मैं किसी तरह से कोई बाइट नहीं दूंगा."

    आशुतोष अरविंद केजरीवाल के क़रीबी माने जाते रहे हैं. पिछले चार साल में कई लोगों ने पार्टी छोड़ी, पर आशुतोष ने कहीं क्षोभ व्यक्त नहीं किया. फिर भी तमाम तरह के कयास हैं. कहा जा रहा है कि पार्टी की ओर से राज्यसभा न भेजे जाने की वजह से वे नाराज़ चल रहे थे. शायद वे राजनीति को भी छोड़ेंगे वगैरह-वगैरह.

    आम आदमी पार्टी के ज़्यादातर संस्थापक सदस्यों की पृष्ठभूमि गैर-राजनीतिक है. ज़्यादा से ज़्यादा लोग एक्टिविस्ट हैं, पर आशुतोष की पृष्ठभूमि और भी अलग थी. वे खांटी पत्रकार थे और शायद उनका मन बीते दिनों को याद करता होगा.

    अरविंद केजरीवाल
    Reuters
    अरविंद केजरीवाल

    पत्रकारिता में वापसी होगी?

    उन्होंने ऐसा कभी कुछ नहीं कहा कि मुझे राजनीतिक जीवन रास नहीं आ रहा, पर लगता है कि वे अपने पत्रकारीय जीवन में वापस जाना चाहेंगे. ऐसा लगता है कि राजनीति में उनका करियर ठहर-सा गया था. 'आप' से परे उनके जीवन में राजनीति का मतलब वही है, जो एक पर्यवेक्षक के लिए होता है. इसलिए पत्रकारिता में उनकी वापसी सम्भव है.

    देश की पत्रकार बिरादरी अब राजनीतिक रंगत वाले साथियों को स्वीकार करती है. ख़ासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने एक नई पत्रकार विरादरी को जन्म दिया है. बहरहाल यह एक अलग डिबेट का विषय है, फ़िलहाल सवाल 'आप' के भविष्य को लेकर है.



    'आप' का क्या होगा?

    आशुतोष ने अपने ट्वीट में 'आप' के साथ रिश्तों का ज़िक्र करते हुए उसे सुंदर/क्रांतिकारी लिखा है. लेकिन उसका भी अंत हुआ. प्रकारांतर से यह बात 'आप' के पूरे आंदोलन पर लागू होती है. जिस वक्त यह आंदोलन था और पार्टी नहीं बनी थी, तब बहस का विषय यह था कि अब आगे क्या? और जब पार्टी बन गई और क़रीब पाँच साल में उसे सत्ता की 'ख़ुशबू' मिल गई तो सवाल है कि अब आगे क्या?

    पार्टी के विचारकों और सूत्रधारों को ऐसे सवालों का जवाब देना है. पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में ज़मीन तैयार की है. 'आप' को जो भी सफलता मिली है, वह परम्परागत राजनीति के ख़िलाफ़ जनता के मन में बैठे असंतोष के कारण है.

    दिल्ली
    BBC
    दिल्ली

    आंदोलन है या पार्टी?

    दुर्भाग्य से इस पार्टी का आचरण उसी राजनीति जैसा है जिसके विरोध में यह खड़ी हुई है. 'प्रचार-कामना' इसकी दुश्मन है. इसमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं, जो बीजेपी, कांग्रेस या ऐसे ही दलों में जगह नहीं बना पाए.

    इस पार्टी ने अपने आंतरिक फ़ैसलों के लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को विकसित नहीं होने दिया. यहाँ भी हाई कमान है. यह हाई कमान शैली वहीं काम करती है, जहाँ सत्ता की यथेष्ट शक्ति केंद्र के पास हो. दिल्ली में यह कुछ समय के लिए ताक़त ज़रूर बनी, पर भविष्य नज़र नहीं आ रहा.



    अटपटे कारणों से ख़बरों में

    अब यह पार्टी किसी न किसी ग़ैर-ज़रूरी या अटपटी बात के कारण चर्चा में रहती है. पन्द्रह-बीस दिन में इससे जुड़ी कोई न कोई अनोखी बात होती रहती है. इसकी एक वजह यह है कि शुरू से ही इसकी दिशा अस्पष्ट रही है.

    पार्टी ने शुरुआत में ख़ुद को बीजेपी और कांग्रेस से अलग दिखाने की कोशिश की, पर 2014 के चुनाव में अनायास इसके नेतृत्व ने मोदी के समांतर खड़े होने की कोशिश की. संयोग से दिल्ली में उसे सफलता मिली.

    आम आदमी पार्टी
    Getty Images
    आम आदमी पार्टी

    दिल्ली की सफलता

    दिल्ली की सफलता में काफ़ी बड़ी भूमिका कांग्रेस विरोधी वोटरों की भी थी. अब कांग्रेस ने दिल्ली में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है. यह मज़बूती 'आप' की परेशानी का कारण है. पिछले कुछ समय से पार्टी कथित तौर पर कांग्रेस के साथ गठबंधन की मनुहार कर रही थी. कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं है.

    केजरीवाल को विरोधी दलों की जमात में तो जगह मिल गई, पर कांग्रेस का साथ नहीं मिला. पिछले दिनों जब दिल्ली के एलजी के घर पर केजरीवाल सरकार धरने पर बैठी थी, तब चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनका समर्थन किया था. पर वह समर्थन दिल्ली में किसी काम का नहीं था.

    आम आदमी पार्टी
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    कांग्रेस की झिड़की

    कांग्रेस की झिड़की 'आप' पर भारी पड़ रही है. यहाँ तक कि राज्यसभा के उप-सभापति चुनाव में कांग्रेस ने बीके हरिप्रसाद के पक्ष में उससे वोट भी नहीं माँगा. इस बात से उत्तेजित होकर 'आप' ने चुनाव का बहिष्कार किया और फिर अरविंद केजरीवाल ने घोषणा की कि 'हम अगले आम चुनाव में विपक्ष के प्रस्तावित गठबंधन में शामिल नहीं होंगे.'

    उन्होंने यह भी कहा, 'गठबंधन की राजनीति से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरे लिए राजनीति का मतलब जनता और उसका विकास है.' सच यह है कि वे अकेले पड़ गए हैं, और आगे की उनकी डगर काफ़ी कठिन है. हो सकता है कि आशुतोष के इस्तीफ़े का इन बातों से कोई वास्ता न हो. शायद वे अब अपने बारे में सोचने लगे हों, पर अब पार्टी को भी अपने बारे में सोचना चाहिए.



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    BBC Hindi
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    English summary
    Why are the Aam Aadmi Party repeatedly resigns

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