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Aravalli Hills News: अरावली क्यों है अहम? नई नीति से कैसे बिगड़ेगा भारत का पर्यावरण संतुलन, क्यों उठ रहे सवाल

Aravalli Hills News: देश में बढ़ते विकास के बीच जंगल, पहाड़ अक्सर अपनी कुर्बानी देते हैं भारत में इसका सबसे ताजा उदाहरण अरावली है जो विकास बनाम पर्यावरण के बीच खड़ी है। करीब 690 किलोमीटर लंबी अरावली, जो गुजरात से शुरू होकर राजस्थान और हरियाणा होते हुए दिल्ली तक फैली है, भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे पुरानी फोल्ड माउंटेन सिस्टम मानी जाती है।

इसने सदियों से उत्तर-पश्चिमी भारत में जलवायु संतुलन और बायोडायवर्सिटी को बचाए रखा है। लेकिन आज अरावली एक बार फिर विकास, पर्यावरण संरक्षण और कानून के टकराव के बीच में खड़ी है। आइए जानते हैं आरावली को लेकर इतना हंगामा क्यों बरपा है...

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Aravalli Controversy: असली विवाद क्या है?

इस पूरे विवाद की जड़ में एक सबसे अहम सवाल है, जो देखने में सरल लेकिन असर में बेहद खतरनाक है- आखिर अरावली की कानूनी और पर्यावरणीय परिभाषा क्या होनी चाहिए? SC ने जो नई परिभाषा पर मुहर लगाई है क्या वो पर्यावरण मानकों और साइंटफिक स्केल के दायरे में किया गया है?

यह सवाल इसलिए अहम बन जाता है क्योंकि इसी परिभाषा के आधार पर यह तय होता है कि कौन-सा क्षेत्र खनन, रियल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या संरक्षण के दायरे में आएगा। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार की सुझाई गई परिभाषा को स्वीकार किए जाने के बाद यह बहस और तीखी हो गई है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसके तहत अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए एक स्कैल तय की गई। अदालत के अनुसार केवल वे पहाड़ अरावली रेंज का हिस्सा माना जाएगा जो जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंचे हों।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि पूरे अरावली क्षेत्र की वैज्ञानिक मैपिंग की जाए और एक क्लियर मेजरमेंट तैयार की जाए। इस योजना में यह तय किया जाएगा कि खनन कहां संभव होगा, कहां पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा और उसे किस तरह नियंत्रित किया जाएगा।अदालत का तर्क है कि इससे सालों से चली आ रही प्रशासनिक उलझन और बार-बार होने वाले मुकदमों पर रोक लगाई जा सकेगी।

SC का फैसला सवालो के घेरे में क्यों?

एन्वॉयरमेंट एक्टिविस्ट कहते हैं कि , 100 मीटर की सीमा अरावली जैसे जटिल भू-भाग को एक फ्रेम में रखना गलत है। क्योंकि 100 मीटर से नीचे की पहाड़ी भी पारिस्थितिक रूप से बेहद अहम हैं। अरावली रेंज का 90% हिस्सा 80 से 90 मीटर तक ही है। इस नई नीति से खनन करने वालों को मनमाना छूट मिलता है जो इकोलॉजीकल सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर सुखे इलाके में जहां प्राकृतिक रुप से पानी का सोर्स ही बेहद कम है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली का महत्व उसकी ऊंचाई या भौगोलिक आकृति में नहीं, बल्कि उसके Ecological Functions में है।

अरावली जल सुरक्षा की रीढ़ है जो बारिश का पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर एक्विफर को रिचार्ज करता है। यही एक्विफर राजस्थान के कई कस्बों और दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद और अलवर जैसे बड़े शहरों की प्यास बुझाते हैं। इकोलॉजिकल स्टडी कि मानें तो बड़े पैमाने पर खनन इस पूरे सिस्टम को बाधित करता है, जिससे ग्राउंड लेवल वॉटर खतरे में पड़ जाएगा।

वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि यदि इन पहाड़ियों को लगातार नुकसान पहुंचता रहा, तो रेगिस्तान का एरिया तेजी से बढ़ेगा, उत्तर भारत में धूल भरी आंधियां बढ़ेंगी और अधिक गर्मी बढ़ेगी। अरावली कई विलुप्त होती प्रजातियों, तेंदुआ, लकड़बग्घा, नीलगाय और कई पक्षी प्रजातियों का प्राकृतिक घर भी है। माइनिंग इन पारिस्थितिक तंत्रों को स्थायी रूप से तोड़ सकते हैं।

केंद्र सरकार की सफाई

सरकार और कुछ कानून विशेषज्ञों का कहना है कि नई परिभाषा 1980 के दशक से चली आ रही जो इस लड़ाई पर एक सामान्य परिभाषा बनाएगी। कोर्ट ने भी माना कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अरावली क्षेत्र में पत्थर और खनिजों का खनन हजारों लोगों की आजीविका से जुड़ा है और बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी है। बिना ठोस वैज्ञानिक और कानूनी आधार के पूरी तरह से प्रतिबंध के कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

बढ़ते विरोध और अरावली बचाने के मुहिम के बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया है कि यह मान लेना गलत है कि 100 मीटर से नीचे के सभी क्षेत्रों में खनन की अनुमति मिल जाएगी। उन्होंने सरकार की ओर से सफाई देते हुए कहा कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से केवल 0.19% हिस्सा ही खनन के योग्य हो सकता है, जबकि शेष क्षेत्र संरक्षित और सुरक्षित रहेगा।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों ने मांग की है कि तैयार किए गए नक्शे और योजनाएं पब्लिक डोमेन में जारी की जाएं और वैज्ञानिक समीक्षा के लिए खोला जाए।

पर्यावरण बनाम विकास पर सवाल जारी....

अरावली पर जारी बहस भारत की पर्यावरणीय शासन प्रणाली की एक गहरी चुनौती को उजागर करती है जो विकास की जरूरतों और उन प्रकृति के बीच संतुलन पर कई सवाल खड़े करती है जिसे ऐसी किसी परिभाषाओं में आसानी से नहीं बांधतीं। जैसे-जैसे उत्तर-पश्चिम भारत में जल संकट, वायु प्रदुषण, जहरीली हवा और जलवायु दबाव बढ़ रहा है, अरावली का भविष्य महज एक पहाड़ियों तक सीमित नहीं रह जाता।

SC का एक पैसला यह तय करेगा कि 'विकसित भारत' का रास्ता कितना टिकाऊ, संतुलित और पर्यावरण-संवेदनशील होगा। फिलहाल, भारत की सबसे पुरानी माउंटेन रेंज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां उसका भविष्य उन आधुनिक नीतियों और संस्थानों द्वारा तय किया जा रहा है, जो उसके करोड़ों साल पुराने भूगर्भीय इतिहास की तुलना में महज एक क्षण भर हैं।

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