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'स्वतंत्रता मिली लेकिन आजादी से जीने...', कौन हैं ऑक्सफोर्ड ग्रेजुएट जूही, जिनकी बातों ने लोगों को किया भावुक

'स्वतंत्रता मिली लेकिन आजादी से जीने', कौन हैं ऑक्सफोर्ड ग्रेजुएट जूही कौर, जिनकी बातों ने लोगों को किया भावुक

नई दिल्ली, 08 सितंबर: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से हाल ही में ग्रेजुएट हुईं भारतीय मूल की लड़की जूही कोरे इन दिनों सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर जूही कोरे ने अपनी सफलता की कहनी लोगों के साथ शेयर की है। जूही कोरे हाल ही में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट हुई हैं। उन्होंने अपनी सफलता में उनके दादा जी का कितना श्रेय था, इसके बारे में बात की है। दादा और उनकी पोती की कहानी इंटरनेट पर तब से वायरल हो रही है, लोगों ने पोस्ट पर भावुक प्रतिक्रिया भी दी है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जूही ने तुलनात्मक सामाजिक राजनीति में मास्टर डिग्री की है। जूही कोरे भारतीय मूल की हैं और महाराष्ट्र की रहने वाली हैं।

वायरल हो गया दिल को छू लेने वाला नोट

वायरल हो गया दिल को छू लेने वाला नोट

जूही कोरे का दिल को छू लेने वाला नोट वायरल हो गया है, जिसमें उन्होंने अपने दादा के शिक्षा प्राप्त करने से लेकर उनके सपने को सच होने तक के संघर्षों के बारे में बताया है। जूही कोरे ने लिंक्डइन पर अपना पोस्ट शेयर करते हुए लिखा, ''1947 में, जिस वर्ष भारत को एक स्वतंत्रता मिली और स्वतंत्र देश घोषित किया गया था लेकिन हर नागरिक को आजादी से जीने की अनुमति नहीं थी। उन व्यक्तियों में से एक युवा स्कूली उम्र का लड़का था, जो महाराष्ट्र के एक ग्रामीण गांव में सबसे निचली जाति के परिवार का था।''

'स्कूल में बैठने की इजाजत नहीं थी...'

'स्कूल में बैठने की इजाजत नहीं थी...'

जूही कोरे आगे लिखती हैं, ''वो लड़का स्कूल जाने लायक था, लेकिन फिर भी उसको 'स्कूल में बैठकर पढ़ने की इजाजत नहीं थी। उसका परिवार नहीं चाहता था कि वह दो प्राथमिक कारणों से स्कूल जाए, पहला कारण, 4 साल के सबसे बड़े के रूप में, उसे एक खेत पर काम करने की जरूरत थी, ताकि उसका परिवार कमा सके और दो वक्त की रोटी मिल सके। दूसरा उसके माता-पिता इस बात से डरते थे कि छात्रों और शिक्षकों द्वारा उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा।''

'वह सुबह 3 बजे खेत पर काम करने जाते थे...'

'वह सुबह 3 बजे खेत पर काम करने जाते थे...'

जूही कोरे आगे लिखती हैं, ''लेकिन वो कहते हैं जब दृढ़ संकल्प कड़ी मेहनत साथ हो तो सबकुथ मिलता है। जिस लड़के के बारे में बात कर रही हूं, वो मेरे दादा जी थी। दादाजी ने अपने माता-पिता के साथ सुबह 3 बजे से खेत पर काम करने का वादा किया और खेत में काम करने के बाद वह स्कूल जाते थे। दुर्भाग्य से उसके माता-पिता का दूसरा डर सच हो गया, स्कूल जाने के लिए 1.5 घंटे की पैदल दूरी के बाद, बिना किसी अच्छे जूते के, उसे कक्षा के अंदर बैठने की भी अनुमति नहीं थी।''

'अपने उच्च जाति के शिक्षकों से भेदभाव...'

'अपने उच्च जाति के शिक्षकों से भेदभाव...'

जूही ने आगे कहा, "फिर भी, वह दृढ़ रहे। चूंकि उनके खेत के काम करने से जो पैसे मिलते थे, उससे सिर्फ भोजन का भुगतान हो पाता था। इसलिए वह पुराने समान "आउटकास्ट" (अनुसूचित जाति) के छात्रों से पुरानी किताबें उधार लेते थे और देर रात गांव के एकमात्र लैंप पोस्ट के नीचे पढ़ा करते थे। अपने उच्च जाति के साथियों के धमकाने के बावजूद, अपने उच्च जाति के शिक्षकों से भेदभाव और कक्षा के अंदर बैठने की इजाजत नहीं होने के बावजूद, उनकी मेहनत में कोई कमी नहीं आई और उन्होंने ना केवल परीक्षा पास की बल्कि अपने सभी सहपाठियों को पछाड़ दिया!''

'हर हीरो की यात्रा में एक बुद्धिमान गुरु होता है...'

'हर हीरो की यात्रा में एक बुद्धिमान गुरु होता है...'

जूही कोरे आगे कहा, ''हर हीरो की यात्रा में एक बुद्धिमान गुरु या चैंपियन होता है, उस लड़के की जिंदगी में एक स्कूल का प्रिंसिपल आया और उन्होंने लड़के की की क्षमता को पहचाना और कुछ वर्षों के बाद उसे अपने शिक्षाविदों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के बाद, उसकी स्कूली शिक्षा और जीवनयापन के लिए भुगतान किया और बम्बई (मुंबई) भेज दिया।''

 'मुझे अपने दादा पर गर्व है...'

'मुझे अपने दादा पर गर्व है...'

जूही ने लिखा, ''मुंबई जाकर दादा ने अंग्रेजी सीखी, कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। और वहीं एक सरकारी भवन में क्लीनर के रूप में पूर्णकालिक काम करने लगे। कई साल बाद, एक उच्च-स्तरीय सरकारी अधिकारी के तौर पर उस पद से 60 साल की उम्र में मेरे दादा जी रिटायर हुएं। मुझे उस लड़के, मेरे दादा पर, मुझमें शिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए बहुत गर्व है।''

एक साल पहले जूही के दादा जी की हुई मौत

एक साल पहले जूही के दादा जी की हुई मौत

दुर्भाग्य से जूही ने एक साल पहले अपने दादा जी को खो दिया था। अपने पोस्ट के आखिर में जूही ने लिखा, "में अपने ऑक्सफोर्ड स्नातक समारोह में भाग लेने के लिए दादा जी को बुलाने में, अपने साझा सपने को साकार करने में सक्षम नहीं थे। लेकिन मुझे पता है कि वो जहां कहीं भी होंगे मुझे प्यार से देख रहे होंगे। सिर्फ दो पीढ़ियों में उन्होंने अपने न होने की वास्तविकता को बदल दिया। मुझे उन पर बहुत गर्व है और मुझे आशा है कि उन्हें भी अपनी विरासत पर गर्व है।" जैसे ही पोस्ट अपलोड किया गया नेटिजन्स ने पोस्ट पर खूब भावुक टिप्पणियां कीं।

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