द्रौपदी मुर्मू कौन हैं ? BJP ने बनाया राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार, उनके बारे में सबकुछ जानिए

नई दिल्ली, 21 जून: भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार चुना है। अगर वह देश की अगली राष्ट्रपति चुन ली जाती हैं तो वह भारत की पहली आदिवासी राष्ट्रपति बनेंगी और उन्हें दूसरी महिला राष्ट्रपति बनने का सौभाग्य मिलेगा। अगर वह राष्ट्रपति बनती हैं तो ओडिशा से पहली राष्ट्रपति होंगी। वह एक सामान्य शिक्षक से राजनीति के सर्वोच्च शिखर की ओर बढ़ी हैं। उनका पूरा जीवन समाज सेवा के प्रति समर्पित रहा है। खासकर अुसूचित जनजाति के कल्याण के लिए उन्होंने काफी योगदान दिया है। उनके राजनीतिक और निजी जीवन के बारे में सभी महत्वपूर्ण बातें जानिए।

झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल रही हैं

झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल रही हैं

झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू प्रदेश की पहली आदिवासी राज्यापाल ही नहीं रही हैं, बल्कि वह 2000 में राज्य के निर्माण के बाद प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल भी बनी थीं। वह ओडिशा की पहली महिला और आदिवासी नेता हैं, जो देश के एक राज्य की राज्यपाल बनीं और अपना कार्यकाल पूरा किया। भाजपा ने उन्हें 18 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए पार्टी का प्रत्याशी बनाया है। वैसे, 2017 चुनाव में भी इस पद के लिए उनका नाम संभावितों में आ चुका था। द्रौपदी वैसे तो मूल रूप से छत्तीसगढ़ की रहने वाली हैं, लेकिन वो अब ओडिशा की हैं और राज्य विधानसभा में रायरंगपुर का दो-दो बार प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

1997 से शुरू हुआ राजनीतिक करियर

1997 से शुरू हुआ राजनीतिक करियर

द्रौपदी मुर्मू के राजनीतिक करियर की शुरुआत 1997 में हुई थी, जब वह ओडिशा के रायरंगपुर अधिसूचित क्षेत्र में काउंसलर चुनी गई थीं और फिर उसकी वाइस चेयरपर्सन बनी थीं। बीजेपी ने उसी साल मुर्मू को ओडिशा अनसूचित जनजाति मोर्चा का प्रदेश उपाध्यक्ष भी बनाया था। बाद में वह इसकी अध्यक्ष भी बनीं। 2013 में पार्टी ने उन्हें एसटी मोर्चा का राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य नियुक्त किया था।

ओडिशा में सर्वश्रेष्ठ एमएलए के लिए 'नीलकंठ अवॉर्ड' मिला था

ओडिशा में सर्वश्रेष्ठ एमएलए के लिए 'नीलकंठ अवॉर्ड' मिला था

2007 में ओडिशा सरकार द्रौपदी मुर्मू को सर्वश्रेष्ठ एमएलए के लिए 'नीलकंठ अवॉर्ड' भी दे चुकी है। ओडिशा में राजनीति करने के दौरान उन्होंने आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए काफी सक्रिय योगदान दिया है। जानकारी के मुताबिक 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में भी पीएम मोदी ने उनके नाम पर विचार किया था, लेकिन आखिरकार राम नाथ कोविंद के नाम पर मुहर लगी थी। वैसे झारखंड के राज्यपाल के तौर पर उनके कार्यकाल को भी प्रधानमंत्री काफी सराह चुके हैं।

बिना सैलरी लिए पढ़ाती थीं

बिना सैलरी लिए पढ़ाती थीं

मौजूदा समय में द्रौपदी मुर्मू ओडिशा के मयूरभंज जिले से आती हैं और उनके आदिवासी और महिला होने की वजह से भाजपा ने शायद उनके नाम पर ट्रंप कार्ड चला है। राजनीति में आने से पहले मुर्मू टीचर रही हैं। समाज सेवा के प्रति उनका समर्पण ऐसा रहा है कि रायरंगपुर के श्री अरबिंदो इंटिग्रल एजुकेशन सेंटर में वह बिना सैलरी के पढ़ाती थीं। उनकी राजनीति में पैठ का अंदाजा इसी से लग सकता है कि नवीन पटनायक के उभरने की वजह से बीजेपी ओडिशा में कोई ज्यादा कमाल नहीं कर पाती, बावजूद इसके वह अपनी सीट से जीतने में सफल होती रहीं।

द्रौपदी मुर्मू का प्रशासनिक तौर पर काफी अनुभवी हैं

द्रौपदी मुर्मू का प्रशासनिक तौर पर काफी अनुभवी हैं

ओडिशा में बीजेडी और बीजेपी गठबंधन सरकार के दौरान द्रौपदी मुर्मू 2000 और 2004 के बीच वाणिज्य और ट्रांसपोर्ट और फिर बाद में मत्स्य और पशुपालन संसाधन विभाग में मंत्री का दायित्व भी संभाल चुकी हैं। जब, केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी तो 2015 में उन्हें झारखंड की पहली महिला और आदिवासी गवर्नर के तौर पर ताजपोशी हुई। यानी उनके पास एक लंबा प्रशासनिक अनुभव है। बहुत ही गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली मुर्मू ओडिशा के एक बहुत ही पिछड़े जिले से आती हैं। लेकिन, सभी तरह की कठिनाइयों के बावजूद पढ़ाई के प्रति उनकी ललक ऐसी थी कि उन्होंने अपना शिक्षा पूर्ण किया।

निजी जीवन त्रासदी भरा रहा है

निजी जीवन त्रासदी भरा रहा है

64 साल की द्रौपदी मुर्मू का राजनीतिक करियर और समाज सेवा के प्रति समर्पण भाव जितना ही शानदार रहा है, निजी जीवन उतना ही त्रासदी भरा है। वह अपने पति श्याम चरण मुर्मू और दो बेटों को समय से काफी पहले खो चुकी हैं। अगर वह एनडीए उम्मीदवार के तौर पर देश की अगली राष्ट्रपति चुनी जाती हैं तो वह पूरे देश के आदिवासी समाज का ना केवल देश के सर्वोच्च पद पर रहकर प्रतिनिधित्व करेंगी, बल्कि उनकी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि और भी चमक सकती है।

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