तीन तलाक़ पर कहाँ थी महिलाओं की आवाज़?
एक बार में तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) लोकसभा में गुरुवार को पारित हो गया.
केन्द्र सरकार बिल को ऐतिहासिक क़रार दे रही है. लेकिन इस इतिहास को बनते न तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देखा और न ही कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी ने. वोटिंग के दौरान दोनों लोकसभा में मौजूद नहीं थे.
बिल पर बहस के दौरान केन्द्रीय क़ानून मंत्री ने कहा कि बिल को किसी महजब से जोड़ कर न देखें, ये बिल औरतों को मर्द के बराबर दर्जा देने के लिए लाया गया है इसे इस लिहाज से देखने की ज़रूरत है.
लेकिन कहां दिखी ये समानता?
लोकसभा के आधिकारिक बेवसाइट के मुताबिक संसद के निचले सदन में कुल 64 महिला सांसद हैं. लेकिन बिल पर बहस के दौरान सिर्फ़ तीन महिला सासंदों ने अपनी राय रखी. यानी लगभग पांच फ़ीसदी महिला सांसदों ने बहस में हिस्सा लिया.
राजनीतिक दलों की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी के कोटे से सबसे ज़्यादा महिला सांसद है. इनकी संख्या 31 है. दूसरे नम्बर पर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस कोटे से महिला सांसद है. इनकी संख्या है 11. तीसरे नंबर पर एआईएडीएमके और कांग्रेस पार्टी है जिसके पास चार चार महिला सांसद हैं.
लेकिन केवल कांग्रेस, बीजेपी और एनसीपी ने महिला सांसद ने बिल पर अपनी बात रखी.
कांग्रेस की तरफ़ से असम के सिल्चर से सांसद सुष्मिता देव ने चर्चा में हिस्सा लिया. उन्होंने महिलाओ सुष्मिता देव ने क़ानून मंत्री से सवाल पूछा, "अगर आप इसे अपराध बनाएंगे और पति को जेल भेजेंगे तो महिला और उसके बच्चे का का भरण-पोषण कौन करेगा? अगर मुस्लिम महिलाओं के उत्थान का विचार है तो मुस्लिम महिलाओं के लिए एक फंड बनाया जाए जो पति के जेल जाने की स्थिति में उसके भरण पोषण के लिए इस्तेमाल किया जाए."
'तलाक़-ए-बिद्दत में समझौता की गुंजाइश कहां'
भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने कहा, "तलाक़-ए-बिद्दत में समझौता की गुंजाइश कहां है? तीन तलाक़ से तीन अत्याचार होता है. पहला राजनीतिक दूसरा आर्थिक और तीसरा सामाजिक."
एनसीपी की सांसद सुप्रीय सुले ने बिल का समर्थन किया. साथ ही कुछ सुझाव भी दिया. एक क़िस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि मुझे मुंबई एयरपोर्ट पर उनसे एक महिला ने पूछा कि कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक़ को गैर कानूनी क़रार दे ही दिया है तो संसद इस पर समय क्यों बर्बाद कर रहें है. मैराइटल रेप पर क़ानून क्यों नहीं बनाते. साथ ही उन्होंने बिल पर सवाल उठाए कि क्या तीन साल की सज़ा से एक बार में तीन तलाक़ रूकेगा?
पूरी बहस के लिए लोकसभा में तीन घंटे का वक्त तय किया गया था. बहस के दौरान कानून मंत्री के आलावा 22 सासंदों ने अपनी बात रखी. हर पार्टी को बोलने का मौका दिया जाता है. हालांकि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा की चर्चा में हिस्सा नहीं लिया. उनकी तरफ से बहस में हिस्सा नहीं लेने के लिए कोई वजह भी नहीं दी गई.
संसद के निचले सदन में दोंनो मुस्लिम महिला सांसद पश्चिम बंगाल से आती है. कांग्रेस की महिला सांसद हैं मौसम नूर जो पश्चिम बंगाल के मालदह उत्तर से सांसद है. हांलाकि उनकी पार्टी से महिला सांसद सुष्मिता देव ने अपनी बात रखी.
दूसरी मुस्लिम महिला सांसद मुमताज संगहमित्रा हैं जो ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस से हैं. उनकी पार्टी ने पूरे बहस में हिस्सा ही नहीं लिया. इसलिए इस पूरे मुद्दे पर न तो पार्टी की राय पता चल पाई और न ही उनकी व्यक्तिगत.
राज्यसभा में महिला सांसद
तीन तलाक़ विधेयक (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक) को कानून बनने के लिए राज्यसभा से भी पारित कराना होगा. राज्य सभा की आधिकारिक बेवसाइट के मुताबिक संसद के उपरी सदन में कुल 238 सांसदों में से केवल 28 ही महिला सांसद हैं.
तीन तलाक़ 'सवाल सियासत का नहीं'
तीन तलाक़ बिल पर क्यों खफ़ा हैं राजनीतिक दल?
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