यूपी में खत्म हो चुके जनाधार के बाद भी कांग्रेस के उत्साहित दिखने के पीछे क्या है वजह?
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच मध्य प्रदेश में सीटों के तालमेल नहीं होने की वजह से जबर्दस्त 'तू-तू, मैं-मैं' देखने को मिल रही है। सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की ओर से यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय को 'चिरकुट' बताए जाने के बाद से इस जुबानी विवाद को कम करने की कोशिश हो रही हैं, लेकिन अंदर ही अंदर सबकुछ ठीक नजर नहीं आ रहा है।
एक ओर सपा के मुखिया 2024 के लिए पीडीए गठबंधन की वकालत कर रहे हैं तो दूसरी और उत्तर प्रदेश कांग्रेस का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय राय ने 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर कहा है, 'हमारी तो 80 सीटों की तैयारी है...पहले भी कहा था, अभी भी कह रहा हूं......80 पर लड़ेंगे हमलोग...अपनी तैयारी वही है.....।'

केंद्र में सत्ता से लगातार इतनी दूरी कभी नहीं रही कांग्रेस
तथ्य ये है कि कांग्रेस करीब साढ़े नौ वर्षों से केंद्र में सत्ता से बाहर है। आजाद भारत के इतिहास में उसे सत्ता से लगातार इतनी दूर रहने की आदत कभी नहीं रही। यह भी सही है कि बिना उत्तर प्रदेश का समर्थन लिए दिल्ली तक दस्तक दे पाना मुश्किल है। लेकिन, इस बात में भी उतनी ही सच्चाई है कि आज की तारीख में यूपी में कांग्रेस के पास न तो जनाधार है और न ही कोई जनाधार वाला नेता बच गया है।
कांग्रेस के उत्साहित दिखने के पीछे क्या है वजह?
2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को उत्तर प्रदेश में सिर्फ रायबरेली सीट मिली थी, जबकि उसे सपा और बसपा का परोक्ष समर्थन हासिल था। पार्टी अपने जिस नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना लेकर एक दशक से मशक्कत कर रही है, वह खुद भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। 2022 के विधानसभा चुनावों में पार्टी 2 सीटों पर सिमट कर रह गई। जो वोट शेयर बचा गया है वह भी 2 प्रतिशत से थोड़ा ही ऊपर है। फिर सवाल तो बनता है कि राज्य की सभी 80 सीटों पर लड़ने की बात कहने का हौसला भी पार्टी को कहां से मिल रहा है?
दरअसल, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जो हौसला बढ़ा हुआ नजर आ रहा है, उसकी वजह ये है कि पिछले कुछ महीनों में कुछ प्रमुख माने जाने वाले नेताओं की पार्टी में एंट्री हुई है। पार्टी के नेतृत्व को इससे लगने लगा है कि वह विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक में सीटों के तालमेल के दौरान ज्यादा बोली लगाने की स्थिति में आ रही है।
कुछ नेताओं की एंट्री से उत्साहित है कांग्रेस
हाल ही में कांग्रेस के पूर्व एमएलए गयादीन अनुरागी और भाजपा के दिलदार नगर के पूर्व विधायक पशुपतिनाथ राय कांग्रेस में शामिल हुए हैं। अनुरागी पहले हमीरपुर की राठ सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और एक प्रभावी दलित नेता माने जाते हैं। 2021 में वे सपा में चले गए थे। इसी तरह इसी महीने बागपत के आरएलडी नेता अहमद हमीद को भी कांग्रेस पार्टी में शामिल कराने में सफल रही है।
पश्चिम यूपी खासकर सहारनपुर के दिग्गज मुस्लिम चेहरा इमरान मसूद को भी पार्टी वापस ले आई है, जो पीएम मोदी के खिलाफ 'बोटी-बोटी' वाले बयान की वजह से कुख्यात हो चुके हैं। ये पिछले कुछ ही वर्षों में सपा से लेकर बसपा तक का चक्कर लगाकर कांग्रेस में लौट आए हैं। अहमद हमीद की अहमियत ये है कि वे तीन बार राज्य में मंत्री रह चुके नवाब कोकब हमीद के बेटे हैं, जो चौधरी अजित सिंह के नजदीकी माने जाने थे। कांग्रेस को लग रहा है कि इन मुस्लिम चेहरों की वजह से पश्चिम यूपी के मुसलमानों में वह अपनी पकड़ बना सकती है।
इसी तरह से कुछ महीने पहले सपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे सीपी राय जैसे नेता भी कांग्रेस में आ चुके हैं, जिन्हें मुलायम सिंह यादव का नजदीकी माना जाता था। इसके अलावा सीतापुर के पूर्व बीजेपी एमएलए राकेश राठौर को भी कांग्रेस अपने साथ जोड़ने में सफल रही है।
इन सब नेताओं की वापसी पर अजय राय ने ईटी से कहा है, 'भारत जोड़ो यात्रा की कामयाबी के साथ कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत के कारण नेता कांग्रेस की ओर देख रहे हैं। हमारी कोशिश संगठन को मजबूत करने की है, लेकिन लोग अपनी व्यक्तिगत रुचि के कारण पार्टी से जुड़ रहे हैं..... और आने वाले दिनों में भी कई और कद्दावर नेता पार्टी में शामिल होते दिखेंगे.....।'
वैसे नेताओं का जुड़ना और उनकी वजह से कांग्रेस को अपना जनाधार बढ़ा पाने में मदद मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। कांग्रेस की असल अग्निपरीक्षा यही होगी, जिसके लिए उसे न सिर्फ सत्ताधारी भाजपा की शक्ति से भिड़ना होगा, बल्कि सहयोगी समाजवादी पार्टी की ताकत का भी मुकाबला करना होगा।












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