क्या है राजस्थान और पंजाब के बहाने पार्टी कैडर को दिया गया कांग्रेस नेतृत्व का कड़ा संदेश? जानिए
नई दिल्ली, 22 नवंबर: कांग्रेस के जी-23 के नेता लाख छटपटा कर रह गए, कांग्रेस आलाकमान ने उनकी एक न सुनी और अपने अंदाज में पार्टी का कामकाज चलाए जा रहा है। पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की छुट्टी हो गई, राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अपने विरोधी सचिन पायलट के वफादारों को कैबिनेट में हिस्सेदारी देनी पड़ गई। केरल यूनिट में तो पहले ही दिग्गजों को किनारे किया जा चुका है। उधर कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को पार्टी में लॉन्च किया गया गया है। इन सारे बड़े फैसलों में पार्टी हाई कमान की सीधी दखल है और संदेश साफ है कि दिल्ली की सुनो या फिर रास्ता नापने को तैयार रहो।

कांग्रेस नेताओं-कार्यकर्ताओं को सीधा संकेत
पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन के बाद राजस्थान में अशोक गहलोत मंत्रिमंडल का विस्तार दूसरा उदाहरण है, जिसका संकेत साफ है- कांग्रेस पार्टी हाई कमान की मर्जी से ही चलेगी। चाहे पार्टी के नेता और कार्यकर्ता इसे समझ पा रहे हों या नहीं, लेकिन कश्मीर से लेकर केरल तक और बिहार-छत्तीसगढ़ से लेकर महाराष्ट्र तक के नेताओं को इशारों में बात बड़ी तसल्ली से समझाने की कोशिश की जा चुकी है। मसलन, गहलोत के लिए संदेश है कि सरकार चलाना अकेले उनका काम नहीं। इसलिए उनके विरोधी सचिन पायलट के वफादारों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। दूसरी तरफ, पायलट को भी पार्टी में उनकी सियासी 'औकात' बताने की कोशिश कई गई है और उनके 5 करीबियों को ही मंत्री बनाया गया है। यानी गहलोत को भी नाराज नहीं किया गया है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व देकर नेतृत्व ने दोनों नेताओं को यह बताने की भी कोशिश की है कि पार्टी को अपना चेहरा भी बचाना है।

गहलोत-पायलट को आलाकमान का संदेश
सच तो यह है कि कांग्रेस हाई कमान ने गहलोत और पायलट के बीच में से ही नया नेतृत्व उभारने की भी पहल शुरू कर दी है। मसलन, उसने रघु शर्मा को संगठन में अहम जिम्मेदारी सौंप दी है, जो कि ब्राह्मण हैं। इनके अलावा दो जाट नेताओं हरीश चौधरी और गोविंद सिंह डोटासरा के अलावा राजपूत नेता भंवर जितेंद्र सिंह को भी आगे बढ़ाया गया है। भंवर सिंह असम में कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। पार्टी के लोगों का कहना है कि गहलोत शुरू में पायलट के वफादारों को जगह देने से हिचकिचा रहे थे। एक नेता के मुताबिक, 'लेकिन, हमें उन्हें दबाव देने की जरूरत नहीं पड़ी। पिछले महीने हाई कमान के नेताओं से दो मुलाकातों के बाद ही उन्हें इशारा मिल गया। वह समझ गए कि हाई कमान के मन में क्या है। गहलोत अमरिंदर सिंह की तरह नहीं हैं। वह नीचे से ऊपर उठे हैं।.... '

कैसे मिला हाई कमान को हौसला ?
पार्टी के एक और नेता के मुताबिक, 'गहलोत न तो अमरिंदर हैं और ना ही सचिन सिद्धू हैं। इनमें अंतर है। गहलोत कैप्टन की तरह तुनकमिजाज नहीं हैं....'पार्टी नेताओं के मुताबिक अमरिंदर के साथ एक भी विधायक ने अभी तक पार्टी नहीं छोड़ी है। एक नेता ने कहा, 'कोई एमपी भी नहीं, जो कि कैप्टन का जोरदार समर्थन कर रहे थे......इसने हाई कमान का हौसला बढ़ा दिया है।' यानी पंजाब के बाद राजस्थान में प्रयोग सफल रहने से पहले हाई कमान ने केरल में भी अपनी ताकत आजमाने की कोशिश की थी। उसने विधानसभा में हार के बाद दिग्गजों को ठिकाने लगाने में देर नहीं की।

हाल में कांग्रेस नेतृत्व ने लिए कई अहम फैसले
इसी तरह कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेताओं को पार्टी में शामिल कराना भी हाई कमान का फैसला है। पार्टी की बिहार इकाई के लोग इससे खुश नहीं थे, लेकिन उनके पास कोई विकल्प भी नहीं था। इससे पहले पार्टी ने तेज तर्रार नेता ए रेवानाथ रेड्डी को तेलंगाना कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। उन्होंने 2017 में कांग्रेस ज्वाइन की थी, फिर भी उन्हें वी हनुमंत राव और पोन्नाला लक्षमैया से लेकर लोकसभा सांसद केवी रेड्डी जैसे अनेकों नेताओं को किनारे करके तरजीह दी गई। फरवरी में पार्टी ने नाना पटोले को महाराष्ट्र कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया, जो भाजपा के सांसद रह चुके हैं। हालांकि, वह पहले भी कांग्रेसी थे और 2018 में दोबारा 'हाथ' पकड़ चुके थे।

पंजाब के परिणाम से तय होगा कांग्रेस का रास्ता ?
कांग्रेस हाई कमान के अगले ऐक्शन का इंतजार छत्तीसगढ़ में हो रहा है, जहां नेतृत्व को लेकर बड़ी लड़ाई चल रही है और कई बार वहां के कांग्रेस नेता दिल्ली दरबार तक में हाजिरी लगा चुके हैं। हालांकि, फिलहाल राहुल गांधी का आशीर्वाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सिर पर बना हुआ है और असम में पार्टी की भद्द पिटवाने के बाद भी उन्हें प्रमोशन देकर उत्तर प्रदेश में पार्टी के प्रचार मुहिम की निगरानी के लिए स्पेशल ऑब्जर्वर नियुक्त किया गया है। वैसे कांग्रेस आला कमान के हालिया फैसलों का चुनावों में क्या असर पड़ता है, इसके लिए सबसे पहले पंजाब विधानसभा चुनाव के परिणाम का इंतजार रहेगा, जहां अगले साल फरवरी-मार्च में ही वोटिंग होने वाली है।












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