करणी सेना क्या है और कैसे काम करती है?

करणी सेना क्या है और कैसे काम करती है?

अगर आप गूगल पर सर्च करें तो पाएंगे कि साल 2017 के जनवरी महीने से पहले तक इंटरनेट यूज़र्स को करणी सेना के बारे में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी. लेकिन 'पद्मावत' फ़िल्म का विरोध करने के नाम पर दीपिका पादुकोण की नाक काटने जैसी धमकियां देने के बाद करणी सेना अचानक से चर्चा में आ गई है.

देश के तमाम हिस्सों में रहने वाले लोग जानना चाह रहे हैं कि आख़िर करणी सेना क्या है. ये कैसे काम करती है. इसके उद्देश्य क्या हैं? और ये 'पद्मावत' का विरोध क्यों कर रही है.

जयपुर में करणी सेना के एक आह्वान पर एक मल्टीप्लेक्स के सामने इकठ्ठी हुई छात्रों की भीड़ के साथ बातचीत करके इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश की गई है.

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क्या करणी सेना कोई राजनीतिक संगठन है?

करणी कोई राजनीतिक संगठन नहीं है. लेकिन राजनीतिक दल इसके पीछे हाथ बांधे खड़े नजर आते हैं.

फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले सोशल मीडिया पर करणी सेना का मैसेज़ आने के बाद देखते ही देखते राजपूत युवकों और छात्रों की भीड़ जयपुर में एक मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल पर जमा हो गई.

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जोशीले भाषण और जज्बाती तकरीरों से जब राजपूती आन-बान-शान का बखान किया गया तो भीड़ की आंखों में गुजरे दौर के किलों और महलों का इतिहास उतर आया.

इस भीड़ में कोई कॉलेज से पढ़कर निकला नौजवान था तो कोई किसी शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाला छात्र था.

जयपुर में क़ानून की पढ़ाई कर रहे दलपत सिंह देवड़ा कहते हैं, "करणी सेना न केवल राजपूतों के गौरव की रक्षा कर रही है बल्कि यह संगठन समाज के हितों की भी चिंता करता है. आज राजपूत पढ़ लिखकर बेरोजगार घूम रहे हैं. करणी सेना हिन्दू संस्कृति के संरक्षण का काम कर रही है."

कुछ राजपूत युवक आरक्षण का आधार आर्थिक करने की बात भी कह रहे थे. जैसलमेर के रहने वाले त्रिलोक इसी भीड़ में नारे लगा रहे हैं.

त्रिलोक कहते हैं, "राजपूत आज पढ़ रहा है और बढ़ भी रहा हैं. लेकिन आरक्षण से रास्ता रुक जाता है. इन युवकों का कहना था कि वे आरक्षण खत्म करने को नहीं कह रहे हैं. मगर इसमें सुधार किया जाना चाहिए."

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एक मैसेज़ पर कैसे आ जाते हैं सैकड़ों युवक?

करणी सेना ने राजस्थान के राजपूत बहुल ज़िलों में बहुत जल्दी से अपने पैर फैलाये हैं. और अब इसके आह्वान पर युवक तुरंत इकठ्ठे हो जाते हैं.

करणी सेना के एक पदाधिकारी शेर सिंह कहते हैं, "जयपुर में उनकी उपस्थिति बहुत मज़बूत है. जयपुर में झोटवाड़ा, खातीपुरा, वैशाली और मुरलीपुरा ऐसे राजपूत बहुल रिहायशी क्षेत्र हैं जहां करणी सेना के आह्वान को तुरंत सुना जाता है और युवक दौड़े चले आते हैं. पिछले कुछ समय में करणी सेना ने अपना दायरा बढ़ाया और राज्य के बाहर भी अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया."

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नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर राजपूत समाज के एक जानकार कहते हैं, "विगत कुछ वर्षों में राजपूत समाज के लोगों ने नौकरी या व्यापार के लिए दूसरे राज्यों में अपनी जगह बनाई है. इन प्रवासी राजपूतों को यह बहुत सुहाता है कि जब कोई राजस्थान से जाकर जातीय अस्मिता की बात करे. इसीलिए पद्मावत फिल्म को लेकर जब भी करणी सेना का कोई पदाधिकारी दूसरे राज्यों में गया, उसे समर्थन मिला.

पद्मावत
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वो कहते हैं, "यूं तो राज्य के प्रमुख शहरों में राजपूत सभा काम करती है और क्षत्रिय युवक संघ कई दशकों से संगठित होकर काम कर रहा है. लेकिन करणी सेना ने अलग रास्ता अपनाया और खुद को युवकों पर केंद्रित किया."

असली करणी सेना कौन सी है?

राजपूत समाज के एक सदस्य ने नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर कहा कि करणी सेना पहला संगठन है जो जातीय गौरव के भावनात्मक मुद्दों को लेकर गली सड़कों पर सक्रिय हुआ. यह एक युवक को अच्छा लगता है कि उसे इतिहास से जोड़ा जा रहा है.

वो कहते हैं कि बेरोजगारी भी एक बड़ा मुद्दा है. शहरों में जब पहली पीढ़ी आई तो उसे रोजगार मिल गया. अब दूसरी पीढ़ी है और वो रोजगार से दूर है. फिर हिंदुत्व के पैरोकारों को भी करणी सेना के नारे और मुद्दे अनुकूल लगे.

अपने इस विकास और विस्तार ने करणी सेना को तीन हिस्सों में बांट दिया. अब ये तीनों धड़े खुद को असली बता रहे है. यह विवाद इतना बढ़ चुका है कि इस पर कोर्ट कचहरी हो चुकी है.

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इनमें एक श्री राजपूत करणी सेना है जिसके संरक्षक लोकेन्द्र सिंह काल्वी है.

दूसरी श्री राजपूत करणी सेवा समिति अजीत सिंह मामडोली की है. तीसरी सुखदेव सिंह गोगामेड़ी की श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना है.

करणी सेना के महिपाल सिंह मकराना कहते है कि श्री कालवी ने इस संगठन को खड़ा किया है वो ही असली संगठन है.

वो कहते है, "ये युवा केंद्रित संगठन है. बाकि संगठनों में प्रौढ़ या उम्रदराज लोग होते है. यह पूरी तरह युवा वर्ग का संगठन है. इन तीनों के अपने अपने दफ्तर हैं. साधन और पैसा कहां से आता हैं?"

"न तो कोई कोष है न कोई कोषाध्यक्ष है, हम चंदा नहीं करते. लोग परस्पर सहयोग से संगठन चलाते है."

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करणी सेनाओं का उद्देश्य क्या है?

श्री करणी सेना सेवा समिति के मामडोली कहते है, "उनका संगठन ही मूल संस्था है. वे इसके लिए कोर्ट तक गए हैं. उनके संगठन ने स्थापना के 11 साल पूरे कर लिए हैं. राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के गोगामेड़ी जातीय अस्मिता के साथ हिंदुत्व के भी नारे बुलन्द करते हैं."

"वे हाल में विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया से भी मिले है. गोगामेड़ी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को भी निशाने पर लेते हैं. इन संगठनों के ज़्यादातर नेता कारोबार करते हैं. कोई रियल एस्टेट में है तो कोई माइनिंग में सक्रिय है. कुछ के विरुद्ध आपराधिक मामले भी दर्ज हैं."

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गोगामेडी कहते हैं, "हां, उनके ख़िलाफ़ कुछ मामले थे जो इसी तरह संघर्ष करते हुए दर्ज हुए हैं और इनमे वे दोष मुक्त हो गए हैं. जब आप किसी पीड़ित के लिए आवाज उठाते हो तो मुकदमे दर्ज हो जाते हैं. इन संगठनों ने पहले आरक्षण का मुद्दा उठाया और मुहिम चलाई. फिर ये संगठन हर उस मौके और मुद्दे तक पहुंचने लगे जहां जातीय अस्मिता का पहलु मौजूद हो."

मामडोली कहते हैं, "जब फिल्मों में राजपूतों का गलत चित्रण किये जाने के मामले सामने आये तो संगठन सक्रिय हुआ. इसी कड़ी में जोधा अकबर का विरोध किया गया. पिछले साल आनंदपाल की पुलिस एनकाउंटर में मौत ने करणी सेना को हरकत में ला दिया और लगे हाथ संजय लीला भंसाली की फिल्म ने भी उसे मंच मुहैया करवा दिया."

राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना के गोगामेड़ी कहते है, "जब हमारे समाज के किसी व्यक्ति या अधिकारी के साथ नाइंसाफ़ी हो और राजनैतिक दल चुप रहे तो करणी सेना का आवाज़ उठाना लाजिमी हो जाता है. लेकिन राजपूत समाज में ऐसे कई लोग हैं जो इस बदलते हालात को लेकर चिंता व्यक्त करते है."

"कुछ प्रेक्षक कहते है राजनैतिक दलों ने खुद को चुनाव लड़ने और जीतने पर सरकार चलाने तक महदूद कर लिया है. यही वजह है कि जातिगत संगठन तेजी से उभर रहे हैं."

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