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WFI news: क्या यूपी-हरियाणा की राजनीति के चलते हुआ भारतीय कुश्ती संघ का 'खेल'?

Wrestling Federation of India Politics: भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष पद पर जैसे ही इसके पूर्व अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के करीबी संजय सिंह का चुनाव हुआ, महीनों से शांत पड़ा महिला पहलवानों के कथित यौन शोषण का मामला फिर से तूल पकड़ने लगा।

बीजेपी सांसद बृजभूषण पर आरोप लगाने वाली रेसलर साक्षी मलिक ने बहुत ही भावनात्मक अंदाज में कुश्ती से संन्यास लेने की घोषणा कर दी। रेसलर बजरंग पूनिया ने भी अपना पद्मश्री अपने पास से हटा दिया।

wrestling federation of india Politics

भारतीय कुश्ती महासंघ के चुनाव के बाद फिर गरम होने लगी थी राजनीति
ये पहलवान यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने एक बार फिर से बड़े आंदोलन के लिए सक्रियता बढ़ाने के संकेत देने शुरू कर दिए। उन्होंने फौरन ही हरियाणा में जाटों कि राजनीति करने वाले कांग्रेस नेताओं भूपिंदर सिंह हुड्डा और उनके बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा से मुलाकातें शुरू कर दीं।

आनन-फानन में साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया ने अन्य पहलवानों के साथ कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से भी मुलाकात कर ली। यह सब ऐसे समय में हुआ, जब केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ की मिमिक्री वाला वीडियो बनाने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी को घेर रही है और इसे जाटों का अपमान बताया जा रहा है।

जाट राजनीति ने कर दिया कुश्ती संघ का 'खेल'?
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के कुछ महीनों बाद ही हरियाणा विधानसभा के भी चुनाव होने हैं। यहां जाटों की करीब 28% आबादी बताई जाती है, जो चुनावी हवा का रुख बदलने की ताकत रखते हैं।

भारतीय कुश्ती महासंघ में बृजभूषण शरण सिंह की जगह उनके खासमखास की मौजूदगी से हुड्डा परिवार और कांग्रेस को बहुत बड़ा राजनीतिक मौका हाथ लग सकता था।

केंद्र की कार्रवाई का बृजभूषण पर सीधा असर नहीं पड़ा
यहां एक बात बहुत ही स्पष्ट है कि केंद्रीय खेल मंत्रालय ने जिस तरह से प्रक्रियाओं की अनियमितताओं के नाम पर रेसलिंग फेडरेशन को फिलहाल के लिए निलंबित किया है, उससे यूपी के कैसरगंज के भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर सीधा कोई असर नहीं पड़ा है।

जब उनके खिलाफ महिला ओलंपिक पहलवानों का आंदोलन चरम पर था, तब भाजपा-विरोधी सारा विपक्ष और पीएम-मोदी विरोधी पूरा इकोसिस्टम उनके साथ खड़ा हो गया था। फिर भी केंद्र सरकार ने बृजभूषण की अगुवाई वाले कुश्ती महासंघ को छूने तक की कोशिश नहीं की थी। शायद इससे यूपी का राजनीतिक गणित बिगड़ सकता था।

हरियाणा-यूपी की राजनीति के लिए अहम है फैसला!
लेकिन, अभी केंद्र सरकार के लिए कार्रवाई ज्यादा आसान थी। वह शायद लोकसभा चुनावों से पहले कोई जोखिम भी नहीं लेना चाहती थी। क्योंकि, हरियाणा के साथ-साथ पश्चिमी यूपी का जाटलैंड भी बीजेपी की सत्ता के लिए बहुत अहम है और पार्टी की दोनों बार की सत्ता में इस इलाके का बहुत बड़ा रोल रहा है।

यही वजह है कि अभी बीजेपी किसी भी सूरत में जाट समाज में अपने खिलाफ माहौल बनने का जोखिम नहीं ले सकती थी। दूसरी तरफ जहां तक बृजभूषण का सवाल है तो कार्रवाई उनके खिलाफ नहीं हुई है। क्योंकि, 6 बार के सांसद का उत्तर प्रदेश के कैसरगंज ही नहीं आसपास की कई लोकसभा सीटों पर प्रभाव है। पहले उन्हें नाराज करने का मतलब हो सकता था उत्तर प्रदेश में प्रभावी ठाकुर समाज को नाराज कर देना।

कुश्ती और खेल की राजनीति ने संन्यास ले ली- बृजभूषण
जहां तक उनकी अपनी बात है तो वे अब कह रहे हैं कि 'मैं कुश्ती और खेल की राजनीति से पूरी तरह से संन्यास ले चुका हूं।' उनकी नाक की लड़ाई में सुकून ये है कि उनपर गंभीर आरोप लगाने वाली पहलवान साक्षी मलिक खुद भी कुश्ती से संन्यास लेने की घोषणा कर चुकी हैं।

बीजेपी सरकार के लिए फिलहाल यह बाजी इसलिए फिट नजर आ रही है, क्योंकि साक्षी ने भारतीय कुश्ती महासंघ को निलंबित करने के उसके फैसले की सराहना की है। ऐसे में फिलहाल ये तो लग रहा है कि बीजेपी ने कुश्ती संघ के निलंबन के माध्यम से कांग्रेस की जाट रणनीति को समय रहते ही कुंद करने में कामयाबी हासिल कर ली है।

आगे क्या करेंगे बृजभूषण?
लेकिन, सियासी पहलवानी में भी धुरंधर बृजभूषण सिंह आगे क्या करेंगे? यह सवाल बना रहेगा। क्योंकि, अगर उन्होंने सरकार की कार्रवाई को उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपने रुतबे पर आंच से जोड़ा तो भाजपा की चुनौती बढ़ सकती है। इसकी वजह ये है कि समाजवादी पार्टी और इसके सुप्रीमो अखिलेश यादव का इस पूरे प्रकरण में उनके प्रति रवैया अबतक काफी नरम रहा है!

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