West Bengal assembly elections:ममता बनर्जी के ऐलान के बाद नंदीग्राम में चल क्या रहा है, ग्राउंड रिपोर्ट

West Bengal assembly elections 2021:पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले सोमवार को जब नंदीग्राम की रैली में इस बार वहां से भी चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो कहा जा रहा है कि यह उनका भारतीय जनता पार्टी और उसके नए-नवेले नेता सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ चुनावी मास्टरस्ट्रोक है। कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि ममता ने अपने चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की बहुत ही सूझबूझ के साथ दी गई सलाह पर यह कदम उठाया है। क्योंकि, जिस इलाके से सुवेंदु अधिकारी जैसे नेता, जो नंदीग्राम आंदोलन के सबसे बड़ा चेहरा माने जाते हैं, अगर वह चुनाव जीतते रहे हैं तो वहां पर मुख्यमंत्री का दांव लगाने का फैसला तो काफी सोच-समझकर ही किया होगा। ऐसे में यह जानना जरूरी हो गया है कि टीएमसी सुप्रीमो की इस चाल से नंदीग्राम के लोगों पर क्या असर पड़ा है। उनकी इस घोषणा के बारे में वहां के वोटर क्या सोचते हैं। हम यहां वहां के कुछ निवासियों की बातचीत के आधार पर ग्राउंड रिपोर्ट पेश कर रहे हैं।

दीदी हों या कोई और सब.......

दीदी हों या कोई और सब.......

जब से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee)ने नंदीग्राम (Nandigram) से चुनाव लड़ने की घोषणा की है, कोलकाता से करीब 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्ब मेदिनीपुर (Purba Medinipur) जिले के लोगों के लिए यह चर्चा आम हो गई है। जहां चार लोग इकट्ठे हुए चुनाव पर बातचीत शुरू हो जाती है। मतलब कि मुख्यमंत्री के चुनाव लड़ने से यह सीट अब हॉट सीट बन गई है। हर चौक-चौराहे और नुक्कड़ पर जहां लोग मिले, वह चुनाव को लेकर अपना नजरिए पेश करने से नहीं चूकते। यहां तक कि नाते-रिश्तेदारों से फोन पर भी बात करते हैं तो भी कम से कम एक टॉपिक तो चुनावी जरूर होता है। शहर के अनेकों मिठाई दुकानों में से एक पर ऐसे ही एक शख्स मिठाई खरीद रहे थे। नजर स्वादिष्ट बंगाली मिठाइयों पर थी और ध्यान कान में लगे मोबाइल फोन पर। किसी से बतिया रहे थे- 'अह! अब आप बहुत तृमणूल कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस कर रहे हैं! अब कोई कुछ भी करे, मुहर कमल पर ही लगेगी.... दीदी हों या कोई और सब साफ हो जाएंगे....'

सिराजुद्दौला के नवाबों जैसा हाल....

सिराजुद्दौला के नवाबों जैसा हाल....

पता नहीं वह लंबी सफेद दाढ़ी वाला वह शख्स मजाक में ऐसे बतिया रहा था या उसका इरादा कुछ और था? क्योंकि थोड़ी ही देर बाद वह कोई 80,000 रुपये के लोन की जरूरत पर बात करने लगा, जो उसे नहीं मिल पा रहा है। वह पूछ रहा था कि क्या उसे केस कर देना चाहिए। वहां पास से ही एक बुजुर्ग मुस्लिम शख्स निकल रहे थे, जो जोर से बोल रहे उस आदमी की बातें सुन रहे थे। वह बीच में ही उसे जोर से बोल पड़ा 'नहीं केस मत करना।' लेकिन, वह व्यक्ति पहले चुनाव की जो बातें कर रहा था उसे उसने पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, जैसे कि उसमें उसे कुछ दिलचस्पी ही ना रही हो। अब पिजुष कर्मकार नाम के एक बातूनी व्यक्ति को लीजिए। वह भी चुनावी गतिविधियों में काफी दिलचस्पी लेते दिखाई पड़े। उनका मानना है कि कभी ममता के लेफ्टिनेंट रहे सुवेंदु अधिकारी का बीजेपी में जाना वैसा ही है, जेसे 'मोहन बागान से ईस्ट बंगाल में शिफ्ट हो जाना।' उनके मुताबिक नंदीग्राम में इसका बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा। उसके मुताबिक 'क्या कोई उम्मीद कर सकता था? दीदी किसी से सत्ता नहीं बांटती। पार्टी में सभी सिराजुद्दौला के नवाबों (1757 की पलाशी की लड़ाई के बाद बिना अधिकारों वाले ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थानीय प्रतिनिधियों)की तरह हैं....'

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होना तय ?

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होना तय ?

लेकिन, नंदीग्राम में ज्यादातर लोगों को इतने पीछे के इतिहास से फिलहाल ज्यादा मतलब नहीं है। वह करीब एक दशक से कुछ पहले के उस किसान आंदोलन पर भी ध्यान नहीं देना चाहते जिसकी कमान सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने संभाली और ममता को बंगाल का ताज मिला। ना ही अभी तक उनमें 23 जनवरी को आने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Netaji Subhas Chandra Bose,) की 125वीं जयंती (125th birth anniversary) को लेकरे गर्मजोशी है, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi ) शनिवार को कोलकाता पहुंच रहे हैं। मसलन, एक छोटा सा किराना दुकान चलाने वाले देबाशीष मैती अभी के चुनावी भविष्य की बात करना चाहते हैं। वो कहते हैं, 'यह 55:45 'कमल' के हक में रहेगा।.....एक महीने पहले जब अधिकारी छोड़कर गए तो लोग नर्वस थे। लेकिन, उनका जो स्थानीय दबदबा है उससे चीजें बदल चुकी हैं।' वो कहते हैं कि 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस विधानसा क्षेत्र में ऐसा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पहले कभी नहीं हुआ।

वह तो खा जाएगी......

वह तो खा जाएगी......

पास के एक स्टेशनरी दुकान से करीब के एक गांव में बेचने के लिए टेक्स्टबुक खरीद रहे नजरुल हजान खान की पुस्तकों के बंडल में 'सहज हिंदी व्याकरण भारती' पर ऊपर से ही नजर पड़ रही थी। वह किताबों के बंडल को अपनी बाइक पर रख रहे थे। लेकिन, उनकी जुबान पर चर्चा आने वाले नंदीग्राम संग्राम की ही थी। वो कह रहे थे, 'दोनों पार्टियां सांप्रदायिक हैं और एक-दूसरे की मदद करती हैं। बनर्जी ने बीजेपी के साथ एक डील की है, ताकि केंद्र सरकार नारदा-सारदा पर ज्यादा जोर ना लगाए....।' बाइक से निकलते-निकलते वह यह कहते जा रहे थे, 'लेकिन, इसबार दीदी ने कुछ ज्यादा ही हाथ दिखा दिया है........वह (बीजेपी) खा (टीएमसी को) जाएगी '

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