'चक्रवात' को लेकर असमंजस बरकरार, स्काईमेट का दावा अगले 48 से 72 घंटों में तस्वीर होगी साफ

नई दिल्ली। मौसम वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि कोरोना संकट के बीच भारत पर 'चक्रवाती तूफान' का खतरा मंडरा रहा है और ये 1 मई से लेकर 3 मई के बीच में ओडिशा और उसके आस-पास के राज्यों में दस्तक भी देगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं, इसलिए 'चक्रवात' को लेकर वैज्ञानिक काफी असमंजस की स्थिति में है, क्योंकि इसके प्रभावी होने की रफ्तार काफी धीमी है, स्काईमेटवेदर के मुताबिक बंगाल की खाड़ी पर बने सिस्टम के सशक्त होने गति बहुत स्लो है इसलिए ये कितना प्रभावी होगा इसकी तस्वीर 48-72 घंटों में साफ होगी।

क्यों हैं गति धीमी

क्यों हैं गति धीमी

स्काईमेट का कहना है कि मॉडन जूलियन ओषिलेशन के दायरे में कमी होने की वजह से बंगाल की खाड़ी पर बना सिस्टम अभी कमजोर पड़ गया है लेकिन अभी खतरा टला नहीं है, बता दें कि माडन जूलियन ओषिलेशन, एक महत्वपूर्ण मौसमी पहलू है जो कि मौसमी स्थितियों को 'चक्रवात' के पक्ष में बनाने का काम करता है।

'चक्रवात' की स्थिति अभी साफ नहीं है

समुद्र में विकसित हुए किसी भी सिस्टम के लिए 'चक्रवात' बनने से पहले उसे लंबी समुद्री यात्रा तय करने की जरूरत होती है, समुद्र की सतह का तापमान 26 डिग्री सेल्सियस से ऊपर होना भी आवश्यक है। इस समय बंगाल की खाड़ी के साथ-साथ हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान में उतनी बढ़ोत्तरी नहीं हुई है इसलिए 'चक्रवात' के आने का सही अंदाजा लग नहीं पा रहा है, फिलहाल अगले 48 से 72 घंटों तस्वीर साफ होने की संभावना है।

क्या होता 'साइक्लोन'?

क्या होता 'साइक्लोन'?

भारत और दुनिया भर के तटीय इलाके हमेशा 'चक्रवाती तूफानों' से जूझते रहते हैं, 'चक्रवाती तूफानों' को अलग-अलग जगह के हिसाब से अलग-अलग नाम दिया जाता है, साइक्लोन, हरिकेन और टाइफून, ये तीनों ही 'चक्रवाती तूफान' होते हैं।

भारत में आते हैं 'साइक्लोन'

उत्तरी अटलांटिक महासागर और उत्तरी-पूर्वी प्रशांत महासागर में आने वाले 'चक्रवाती तूफान' हरिकेन कहलाते हैं, उत्तरी-पश्चिमी प्रशांत महासागर में आने वाले 'चक्रवाती तूफानों' को 'टायफून' और दक्षिणी प्रशांत और हिन्द महासागर में आने वाले तूफानों को 'साइक्लोन' कहा जाता है, भारत में आने वाले 'चक्रवाती तूफान' दक्षिणी प्रशांत और हिन्द महासागर से ही आते हैं इसलिए इन्हें 'साइक्लोन' कहा जाता है।

क्यों आते हैं 'चक्रवात'?

क्यों आते हैं 'चक्रवात'?

पृथ्वी के वायुमंडल में हवा होती है, समुद्र के ऊपर भी जमीन की तरह ही हवा होती है, हवा हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब वाले क्षेत्र की तरफ बहती है, जब हवा गर्म हो जाती है तो हल्की हो जाती है और ऊपर उठने लगती है, जब समुद्र का पानी गर्म होता है तो इसके ऊपर मौजूद हवा भी गर्म हो जाती है और ऊपर उठने लगती है, इस जगह पर निम्न दाब का क्षेत्र बनने लग जाता है, आस पास मौजूद ठंडी हवा इस निम्न दाब वाले क्षेत्र को भरने के लिए इस तरफ बढ़ने लगती है, इस वजह से यह हवा सीधी दिशा में ना आकर घूमने लगती है और चक्कर लगाती हुई उस जगह की ओर आगे बढ़ती है, इसे 'चक्रवात' कहते हैं।

सम संख्या वाले वर्षों में तूफानों के नाम महिलाओं के नाम

सम संख्या वाले वर्षों में तूफानों के नाम महिलाओं के नाम

दरअसल 1945 के पहले तक किसी भी 'चक्रवात' का कोई नाम नहीं होता था, लिहाजा मौसम वैज्ञानिकों को बहुत दिक्‍कत होती थी। जब वो अपने अध्‍ययन में किसी चक्रवात का ब्‍योरा देते थे, या चर्चा करते थे, तब वर्ष जरूर लिखना होता था और अगर वर्ष में थोड़ी सी भी चूक हो गई, तो सारी गणित बदल जाती थी। इसी दिक्‍कत से निबटने के लिये 1945 से विश्‍व मौसम संगठन ने 'चक्रवातों' को नाम देने का निर्णय लिया और तब से अब तक जितने भी 'चक्रवात' आये उन्‍हें अलग-अलग नाम दिए जाते हैं।

तूफानों के नाम नाविक अपनी प्रेमिकाओं के नाम पर रखते थे

वैसे इससे पहले कहा जाता है कि तूफानों के नाम नाविक अपनी प्रेमिकाओं के नाम पर रखते थे इसलिए शुरुआत में औपचारिक रूप से तूफानों के नाम महिलाओं के नाम से होते थे, 70 के दशक से यह परंपरा बदल गई और तूफानों के नाम महिला और पुरुष दोनों के नाम पर होने लगे, सम संख्या वाले वर्षों में तूफानों के नाम महिलाओं के नाम और विषम संख्या वाले वर्षों में यह पुरुषों के नाम पर होता है।

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