नहीं रहा शाकाहारी मगरमच्छ बाबिया, मंदिर का प्रसाद खाकर करता था 'रहस्यमयी गुफा' की रखवाली
Vegetarian Crocodile Babiya Story: दुनिया में ज्यादातर जगहों पर मगरमच्छ पाए जाते हैं, जो अपने मजबूत शिकारी जबड़ों के लिए फेमस हैं। अगर कोई गलती से उनके पास आए, तो उसका अंत निश्चित है। वो अपने शक्तिशाली दांतों से किसी भी शिकार को फाड़ने की ताकत रखते हैं, लेकिन अब सोशल मीडिया पर बाबिया नाम के एक मगरमच्छ की खूब चर्चा हो रही, जिसका 9 अक्टूबर की रात निधन हो गया। आइए जानते हैं उससे जुड़ी दिलचस्प बात।
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खाने में खाता था प्रसाद
केरल के कासरगोड में श्री आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर स्थित है। इस मंदिर में एक तालाब है, जहां पर बाबिया रहता था। वो उस तालाब में कहां से आया ये किसी को नहीं पता। स्थानीय लोग मानते हैं कि वो खुद वहां पर प्रकट हुआ था। आमतौर पर मगरमच्छ जलीय जीवों का शिकार करते हैं, लेकिन बाबिया ने कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया। वो खाने में मंदिर में चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को खाता था। गलती से अगर कोई जानवर उसके पास चला जाए, तो भी वो उसे नुकसान नहीं पहुंचाता था।

श्रीकृष्ण से जुड़ी है कथा
मंदिर के पुजारियों के मुताबिक मगरमच्छ ने करीब 75 साल तक इस मंदिर की रक्षा की। जब भी कोई भक्त भगवान के दर्शन को आता, तो वो बाबिया को भी देखने की कोशिश करता। हालांकि वो ज्यादातर वक्त एक गुफा में गुजारता था, जिसका संबंध भगवान कृष्ण से बताया जाता है। स्थानीय लोक कथाओं के मुताबिक मंदिर के पास एक ऋषि तपस्या करते थे। एक दिन भगवान कृष्ण बाल्य स्वरूप में वहां पहुंचे और ऋषि को परेशान करने लगे।

बच्चे को दिया धक्का
कहते हैं कि ऋषि ने परेशान होकर भगवान के बाल्य स्वरूप को धक्का दे दिया, जिससे वो पानी में गिर गए। कुछ देर बाद उनको अपनी गलती का एहसास हुआ और वो बालक को निकालने पानी में उतरे। वहां पर कोई नहीं था। पास की गुफा में बस एक दरार थी, कहा जाता है कि भगवान वहीं से चले गए। उसी गुफा से एक मगरमच्छ आया, जो उस रास्ते की रखवाली करता था। बाद में लोगों ने उसका नाम बाबिया रख दिया।

अंग्रेजों ने मारी थी मगरमच्छ को गोली
बाबिया को लेकर एक दूसरी कहानी भी काफी प्रचालित है। स्थानीय लोगों को मुताबिक 1945 में अंग्रेजों ने मंदिर में एक मगरमच्छ को गोली मार दी थी। उसके कुछ दिन बाद बाबिया मंदिर में प्रकट हुआ। उसको मछलियों की जगह प्रसाद खाता देख सब हैरान रह गए। वो रोजाना गुड़ और चावल वाला प्रसाद ही खाता है। वहां जाने वाले श्रद्धालुओं के मुताबिक बाबिया प्रसाद में चढ़ा फल भी खा लेता था, इसके बाद वो गुफा की रखवाली करने बैठ जाता।












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