राजस्थान की राजनीति में 'मोदी तुमसे बैर नहीं' नारे ने घटा दिया वसुंधरा का कद

बेंगलुरू। राजस्थान में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के सुनामी में तब्दील होने के बावजूद बीजेपी सत्ता से दूर रही। चुनाव परिणामों में बीजेपी को ज्यादा नुकसान का सामना नहीं करना पड़ा था, लेकिन जनमत बीजेपी के खिलाफ था। राजस्थान विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक नारा खूब प्रचलित हुआ, जिसके बोल थे, 'मोदी तुमसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं' चुनाव परिणाम आया तो बीजेपी और कांग्रेस के जीत-हार का फासले ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की राजनीति से कूच की इबारत लिख दी थी और हुआ भी ठीक वहीं।

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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान प्रदेश में पराजित मुख्यमंत्रियों को बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुनकर संगठन के कामों में लगा दिया। इनमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15-15 वर्ष तक मुख्यमंत्री रह चुके डा. रमन सिंह और शिवराज चौहान शामिल हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों की तुलना में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का राजनीतिक कद कई मायनों में भी दोयम है। बीजेपी ने वसुंधरा को राजस्थान से हटातक संगठन में इसलिए भेजा है ताकि राजस्थान में महारानी के विकल्प को तैयार किया जा सके।

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राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राजस्थान में बीजेपी की हार के लिए पूरी तरह से महारानी वसुंधरा राजे जिम्मेदार थी, जिसकी पुष्टि प्रचलित नारे से ही नहीं होती बल्कि इसकी गवाही पिछले राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस को मिले वोट प्रतिशत भी देते हैं। इससे पहले भी वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव में भी वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बीजेपी 161 सीटें जीतकर बीजेपी की सत्ता में वापसी करवाने में सफल रहीं थी। यही नहीं, राजे के नेतृत्व में बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2014 में बीजेपी ने राजस्थान में कीर्तमान रचते हुए सभी 25 लोकसभा सीट जीतने में कामयाब हुई थी।

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आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2018 में हुए राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने वसुंधरा राजे के नेतृत्व में बेहतर प्रदर्शन किया था, लेकिन महारानी वसुंधरा राजे के खिलाफ जनमत ने बीजेपी की सत्ता में पुनर्वापसी पर ग्रहण लगा दिया। कांग्रेस ने 101 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि बीजेपी को 73 सीटों पर जीत दर्ज कर सकी। लेकिन दोनों दलों के बीच वोट प्रतिशत चौकाने वाले थे। कांग्रेस को जहां राजस्थान के वोटरों से 39.3 फीसदी वोट मिले थे। वहीं, बीजेपी के पक्ष में राजस्थान के वोटरों ने 38.8 प्रतिशत मतदान किया था। यानी दोनों दलों के बीच वोट प्रतिशत का अंतर महज 5 फीसदी था।

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माना जाता है बीजेपी की हार के पीछे यही 5 फीसदी वोट था, जो वसुंधरा राजे के खिलाफ पड़े वोट की वजह से बीजेपी के पक्ष में नहीं पड़ा वरना बीजेपी को ऐतिहासिक जीत मिल सकती है और राजस्थान में पिछले 20 वर्ष से चल रहे अदल-बदल की राजनीति का अध्याय भी खत्म हो चुका होता।

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बीजेपी की हार के लिए वसुंधरा राजे के खिलाफ जनमत का गुस्सा ही था। शायद यही कारण है कि बीजेपी हाईकमान ने वसुंधरा राजे को राजस्थान की राजनीति से दूर करके संगठन में भेजने का निर्णय किया है।

राजस्थान की राजनीति से वसुंधरा राजे को निकालकर उन्हें संगठन में बीजेपी ने साफ संकेत दिया है कि उनकी अब प्रदेश की राजनीति में वापसी मुश्किल है। नवनियुक्त राजस्थान बीजेपी सतीश पुनिया इसकी बानगी हैं। गत 8 अक्टूबर को सतीश पुनिया ने राजस्थान प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष पद का भार ग्रहण किया।

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इस दौरान पार्टी के बड़े नेता मौके पर मौजूद थे, लेकिन वसुंधरा राजे कार्यक्रम में नहीं पहुंची। हालांकि औपचारिकता के लिए उन्होंने बधाई संदेश लिखकर जरूर भिजवाया। राजस्थान बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष की सीट गत 24 जून को पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल सैनी के निधन के बाद से खाली हुई थी, लेकिन पार्टी को नया अध्यक्ष चुनने में कुल चार महीने लग गए।

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दरअसल, बीजेपी हाईकमान वसुंधरा राजे की गैर मौजूदगी में किसी ऐसे नेता को प्रदेश की बागडोर सौंपना चाहती है, जिसकी प्रदेश की राजनीति में अच्छी पकड़ और सर्वमान्यता हो और वर्ष 2023 विधानसभा चुनाव में पार्टी की प्रदेश की सत्ता में पुनर्वापसी सुनिश्चित कर सके। बीजेपी हाईकमान ने तीनों राज्यों में पार्टी के हार के बाद ही यह तय कर लिया था कि तीनों राज्यों में एक नया नेतृत्व तैयार किया जाए और सतीश पुनिया की नियुक्ति को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

नवनियुक्त प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सतीश पुनिया के लिए राजस्थान में होने वाले दो विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। 21 अक्टूबर को दो विधानसभा सीटों खिंवसर और नागौर के लिए उप-चुनाव होने हैं। इसके तुरंत बाद राजस्थान में पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव भी होने हैं। उपचुनाव, पंचायत चुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन न केवल सतीश पुनिया का भविष्य तय करेगा और वसुंधरा राजे को राजस्थान की राजनीति में पुनर्वापसी के लिए एक मौका और दे सकता है, जिसकी उम्मीद काफी कम है।

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