पहले 'काशी कोतवाल' की पूजा फिर काम दूजा..., जानें बनारस के लिए क्यों जरूरी हैं काल भैरव कोतवाल
पहले 'काशी कोतवाल' की पूजा फिर काम दूजा..., जानें बनारस के लिए क्यों जरूरी हैं काल भैरव कोतवाल
नई दिल्ली,13 दिसंबर: गंगा के किनारे बसे उत्तर प्रदेश का शहर काशी (वाराणसी) सबसे पुराने शहरों में से एक है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से बनारस में है। काशी में बसे भगवान शिव और माता पार्वती के महत्व के बारे में तो हर कोई जानता है लेकिन काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव का भी महत्व उतना ही खास और अहम है। काशी में एक बहुत ही पुरानी कहावत है कि ''पहले 'काशी कोतवाल' की पूजा फिर काम दूजा...''। जी हां, धार्मिक मान्यता है कि इस शहर में कोई भी शुभ काम करने से पहले 'काशी कोतवाल' यानी बाबा काल भैरव की पूजा की जाती है। इसलिए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 13 दिसंबर 2021 को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के लोकार्पण से पहले काल भैरव की पूजा करने पहुंचे थे। कहा जाता है कि काशी नगरी में काल भैरव की मर्जी चलती है। भगवान शिव की पूजा करने से भी पहले इनको यहां पूजा जाता है। आइए जानें क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी और काशी के लिए इतने क्यों जरूरी हैं काल भैरव कोतवाल।
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बाबा विश्वनाथ हैं काशी के राजा और कोतवाल हैं काल भैरव
भगवान शंकर की नगरी कही जानेवाली काशी को लेकर धार्मिक मान्यता है कि इस शहर के राजा बाबा विश्वनाथ हैं। वहीं काशी का कोतवाल काल भैरव को कहा जाता है। मान्यता है कि इस शहर में भैरव बाबा की मर्जी के बिना कुछ भी नहीं होता है और पूरी नगरी की देखरेख उन्ही के हाथों में है। काशी के रहने वाले लोगों का ये भी कहना है कि बाबा विश्वनाथ के मंदिर के पास एक कोतवाली भी है, जिसकी रक्षा खुद काल भैरव करते हैं। इसका उल्लेख महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।

आइए जानें कैसे बने भैरव बाबा काशी के कोतवाल?
काल भैरव के काशी के कोतवाल यानी काशी में स्थापित होने के पीछे एक पौराणिक कथा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि एक बार भगवान ब्रह्माजी और विष्णुजी के बीच चर्चा छिड़ गई कि उन दोनों में से आखिर कौन बड़ा और शक्तिशाली है। इस विवाद के बीच भगवान शिव की चर्चा हुई। इसी चर्चा के दौरान ब्रह्माजी के पांचवें मुख ने भगवान शिव की आलोचना कर दी। ये सुनकर बाबा भोलेनाथ बहुत अधिक क्रोधित हो गए। कहा जाता है कि भगवान शिव के इसी गुस्से से काल भैरव का जन्म हुआ। यही वजह है कि काल भैरव को शिव का अंश भी माना जाता है। काल भैरव ने शिव के आलोचन करने वाले ब्रह्माजी के पांचवें मुख को अपने नाखुनों से काट दिया था।

ब्रह्म हत्या के दोष ने भैरव बाबा को पहुंचाया काशी
काल भैरव ने गुस्से में ब्रह्माजी के पांचवें मुख को काट तो दिया लेकिन वो मुख काल भैरव के हाथ से अलग ही नहीं हो रहा था। इस वक्त वहां शिव जी प्रक्रट हुए। शिव ने काल भैरव से कहा, तुमने ये क्या किया... तुम्हे तो ब्रह्म हत्या का दोष लग गया है। इस दोष को मिटाने का एक ही तरीका है कि तुम एक आम व्यक्ति की तरह तीनों लोकों का भ्रमण करो। जिस स्थान पर ये ब्रह्मा का ये पांचवां मुख तुम्हारे हाथ से छूट जाएगा, वहीं पर तुम इस पाप से मुक्ती पाओगे।

इतना आसान नहीं था काल भैरव को मुक्ति मिलना...!
भगवान शिव का आदेश मिलके ही बाबा भैरव तीनों लोकों का भ्रमण करने के लिए पैदल यात्रा पर निकल पड़े। लेकिन जैसे ही वह अपनी पैदल यात्रा शुरू कर रहे थे तो शिवजी की प्रेरणा से वहां एक कन्या प्रक्रय हो गई। कहा जाता है कि ये एक बहुत ही तेजस्वी कन्या थी, जो अपनी जीवा से कटोरे में रखे रक्त का पान कर रही थी। यह कन्या कोई आम कन्या नहीं बल्कि ब्रह्म हत्या थी। शिवजी ने इस कन्या को भैरव के पीछे छोड़ा था ताकि भैरव तीनों लोकों का भ्रमण करना ना छोड़े।

जब काशी में पहुंचे भैरव तो छूटा ब्रह्म हत्या का दोष
पौराणिक कथा के मुताबिक तीनों लोकों का भ्रमण करते हुए जब भैरव बाबा काशी पहुंचे तो उनका पीछा कर रही कन्या छूट गई। शिवजी की आज्ञा के मुताबिक काशी में इस कन्या का प्रवेश करना मना था। काशी में जैसे ही भैरव बाबा गंगा के तट पर पहुंचे तो यहां भैरव बाबा के हाथ से ब्रह्माजी का शीश अलग हो गया। इसी के साथ भैरव बाबा को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल गई। काल भैरव को पाप से मुक्ति मिलते ही भगवान शिव वहां प्रक्रट हुए और उन्होंने काल भैरव को वहीं रहकर तप करने का आदेश दिया। उसके बाद से कहा जाता है कि काल भैरव इस नगरी में बस गए।

'तुम कहलाओगे काशी के कोतवाल'
पौराणिक कथा के मुताबिक काशी में काल भैरव को तप करने का आदेश देते हुए बाबा विश्ववनाश ने काल भैरव को आशीर्वाद भी दिया था। भगवान शिव ने काल भैरव को आशीर्वाद दिया कि तुम इस नगर के कोतवाल कहे जाओगे और युगो-युगो तक तुम्हारी इसी रूप में पूजा की जाएगी। कहा जाता है कि शिव का आशीर्वाद पाकर काल भैरव काशी में ही बस गए और वो जिस स्थान पर रहते थे वहीं काल भैरव का मंदिर स्थापित है।

बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले भैरव के करते हैं लोग दर्शन
कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव का दर्शन करना चाहिए, क्योंकि वही इसी काशी नगरी के रक्षक और कर्ता-धर्ता हैं। काल भैरव ही हैं, जो लोगों को आशीर्वाद भी देते हैं और सजा भी। ऐसी मान्यता है कि काशी में काल भैरव की मर्जी के बिना यमराज भी किसी के प्राण नहीं ले जा सकता है। कहा जाता है कि काशी में जिसने काल भैरव के दर्झन नहीं किए , उसको बाबा विश्वनाथ की पूजा का भी फल नहीं मिलता है। बता दें कि काशी विश्वनाथ मंदिर का जिक्र महाभारत और उपनिषद में भी किया गया है।
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