Uttar Pradesh election 2022:अखिलेश यादव की सपा को ओवैसी की AIMIM से क्यों है खतरा ?

Uttar Pradesh assembly election 2022: बिहार की मुस्लिम बहुल पांच सीटों पर जीत के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) का राष्ट्रीय पार्टी का नेता बनने का मंसूबा सातवें आसमान पर पहुंच चुका है। जिन दलों को ओवैसी की वजह से अपना मुस्लिम वोट बैंक खिसकने का डर सताता है, उन्हें उनके चुनाव लड़ने के ऐलान से सांप सूंघना स्वाभाविक है। लेकिन, यह बात भी उतनी ही सही है कि अब भारत के एकमात्र प्रभावशाली मुस्लिम नेता बनने का सपना देख रहे हैदराबाद के सांसद को भी जीत का स्वाद लग चुका है। वह सिर्फ मुस्लिम वोटों के समीकरण को बनाने-बिगाड़ने के लिए चुनाव नहीं लड़ते, अब वह जीतने के लिए भी चुनाव लड़ते हैं। इसमें उन्हें महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक में कामयाबी मिल चुकी है और इस बार वह वही कहानी दोहराने का इरादा लेकर सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले सूबे में भी चुनावी दस्तक दे चुके हैं। अब सवाल है कि उनके आने से सपा (SP) को क्यों डरना चाहिए?

सपा को मुख्य विरोधी मानते हैं ओवैसी

सपा को मुख्य विरोधी मानते हैं ओवैसी

पिछले 13 जनवरी को असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi)जब उत्तर प्रदेश (UP) पहुंचे थे तो उन्होंने साफ कहा था कि उनकी पार्टी समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) को अपना मुख्य विरोधी मानती है। उन्होंने वाराणसी (Varanasi) पहुंचते ही मीडिया वालों से कहा कि अखिलेश यादव (AKhilesh Yadav) की पिछली सरकार के दौरान उन्हें 12 बार यूपी में घुसने से रोक दिया गया और 28 ऐसे मौके आए जब उन्हें राज्य में आने की इजाजत नहीं दी गई। वे बोले कि अब उन्हें इजाजत मिली है, इसलिए यहां आ पाए हैं। यानि जो अनुमति उन्हें अखिलेश सरकार ने नहीं दी थी, वह योगी आदित्यनाथ सरकार ने देने में कोई आनाकानी नहीं की। ओवैसी का विरोध करने वाली कथित सेकुलर पार्टियां उनपर सबसे बड़ा आरोप भी यही लगाती हैं। एक तो एआईएमआईएम (AIMIM)को वोट-कटवा कह दिया जाता और दूसरा बीजेपी का एजेंट या बीजेपी की बी टीम कहा जाता है।

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    क्या बीजेपी के एजेंट हैं ओवैसी ?

    क्या बीजेपी के एजेंट हैं ओवैसी ?

    असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi)ने अपने विरोधियों के इन दोनों आरोपों का एकबार फिर जवाब दिया है। वोट-कटवा कहे जाने पर वो कहते हैं कि उनके विरोधी चाहते हैं कि लोग (मुसलमान) गुलामों की तरह उन्हें वोट देते रहें और दूसरी राजनीतिक पार्टियां उनके यहां चुनाव ना लड़ें। लेकिन, जब एआईएमआईएम(AIMIM) चुनाव लड़ती है तो उसका मकसद जीतना होता है ना कि किसी की हार या जीत में मदद करना। जहां तक उनकी पार्टी पर बीजेपी (BJP) का एजेंट होने जैसे आरोप लगाए जाते हैं तो उसके बारे में हैदराबाद (Hyderabad)के सांसद ने कहा कि उनकी पार्टी के नेताओं को इसपर ध्यान ही नहीं देना चाहिए। वे बोले कि बिहार चुनाव (Bihar Elections) में उनकी पार्टी सेकुलर डेमोक्रेटिक फ्रंट के साथ लड़ी और सबको पता है कि इससे फायदा किसको हुआ। मतलब, उनकी पार्टी ने 5 सीटें जीत लीं। यही नहीं, जानकारी के मुताबिक स्पीकर पद के लिए वोटिंग के दौरान भी पार्टी ने वहां एनडीए (NDA) के उम्मीदवार के खिलाफ और महागठबंधन के समर्थन में वोट डाले थे।

    2017 के चुनाव का मुस्लिम समीकरण

    2017 के चुनाव का मुस्लिम समीकरण

    वैसे ओवैसी की पार्टी ने 2017 में भी यूपी चुनाव (UP Elections) का स्वाद चखा था। तब वह 38 सीटों पर लड़ी थी। उसे सीट तो नहीं ही मिली और वोट भी वह महज 0.24 फीसदी ही जुटा सकी थी। लेकिन, इसबार वो कुछ तय करके आए हैं। अगर बात पूरी यूपी की करें तो मुसलमानों (Muslims) की कुल आबादी करीब 19.3 फीसदी है, जिनमें से ज्यादातर वोट पिछले चुनाव में सपा (SP) को ही गए होने का अनुमान है। 2017 में सपा के 47 विधायक जीते थे, जिनमें करीब एक-तिहाई मुसलमान थे। प्रदेश के 6 जिलों में मुस्लिम आबादी एक बहुत बड़ा वोट बैंक है। बिजनौर, रामपुर, सहारनपुर, मुरादाबाद, शामली और बलरामपुर उन्हीं में शामिल हैं; और एआईएमआईएम के ट्रैक रिकॉर्ड से जाहिर है कि वह वहीं चुनाव लड़ती है, जहां मुस्लिम आबादी चुनाव परिणाम को प्रभावित करने में सक्षम होती है।

    ओवैसी-राजभर समीकरण क्या गुल खिलाएगा?

    ओवैसी-राजभर समीकरण क्या गुल खिलाएगा?

    खासकर जिस तरह से उनकी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP)के सुप्रीमो ओम प्रकाश राजभर (Om Prakash Rajbhar) से मुलाकात हुई है, उससे लगता है कि ये दोनों दल खासकर पूर्वांचल के इलाके में कुछ गुल खिलाने की सोच रहे हैं। मोटे तौर पर मानें तो पूर्वांचल में मुस्लिमों की आबादी करीब 15-16 फीसदी होने का अनुमान है और अगर उसमें 3-4 फीसदी राजभर को जोड़ लें तो समाजवादी पार्टी (SP) को यहां ज्यादा चपत लग सकती है। ओवैसी बिहार चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा और बसपा (BSP)के साथ यह सफल प्रयोग कर चुके हैं। कुशवाहा तो हवा हो गए, लेकिन एआईएमआईएम (AIMIM)के सहयोग से बसपा ने भी एक सीट जीत ली।

    अखिलेश का खेल बिगाड़ेंगे ओवैसी?

    अखिलेश का खेल बिगाड़ेंगे ओवैसी?

    इसलिए कह सकते हैं कि ओवैसी ने यूं ही नहीं 403 में से करीब एक-चौथाई सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। यानि ओवैसी ने अगर करीब 100 सीटों का गणित बिठाया है तो वो अपना टारगेट पहले से ही तय करके आए हैं, जिससे अखिलेश यादव की पार्टी की सियासी जमीन खिसकने की आशंका बढ़ सकती है। क्योंकि, बिहार में राजद(RJD) और यूपी (UP)में सपा का जनाधार वही माय या मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण है, लेकिन इसके एम (M-मुस्लिम) पर अब ओवैसी अपना हक जताना चाहते हैं।

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