इस मामले में महाराष्ट्र के आठवें सीएम हैं उद्धव ठाकरे, बाकी सब कांग्रेसी

इस मामले में महाराष्ट्र के आठवें सीएम हैं उद्धव ठाकरे, बाकी सब कांग्रेसी

उद्धव ठाकरे

नई दिल्ली। शिवाजी पार्क में हुए एक भव्य समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के रूप में शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी गठबंधन के 'बहुजन महा विकास अघाड़ी' मोर्चा तले शपथ ले ली है। इसी के साथ उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के ऐसे 8वें मुख्यमंत्री बन गए जो विधायक नहीं रहते हुए भी राज्य के मुख्यमंत्री बने हैं। इस शपथ के साथ ही करीब महीने भर चले सियासी नूरा-कुश्ती में फिलहाल एक विराम लगा है।

ये हैं वो नेता जो पहले किसी सदन के सदस्य नहीं थे

ये हैं वो नेता जो पहले किसी सदन के सदस्य नहीं थे

यह भी एक दिलचस्प संयोग है कि अब तक ऐसे नेता सिर्फ कांग्रेस के रहे हैं। ए आर अंतुले, वसंतदादा पाटिल, शिवाजीराव निलांगेकर पाटिल, शंकरराव चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे,शरद पवार, और पृथ्वीराज चव्हाण उन नेताओं में शामिल हैं जो मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते वक्त ना तो राज्य विधानसभा के सदस्य थे और ना ही राज्य के विधान परिषद के सदस्य। शरद पवार जब इस तरह से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे तब उनकी अपनी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानि की एनसीपी नहीं थी। पवार नेशनल कांग्रेस पार्टी में थे। इसी तरह मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार में पृथ्वीराज चव्हाण तो मंत्री थे लेकिन नवंबर 2010 में वो अशोक चव्हाण की जगह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे। इन नेताओं में से अंतुले, निलांगेकर पाटिल और शिंदे ने मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा उपचुनाव लड़ा था और विजयी होकर सदन के सदस्य बने थे। अन्य चार नेताओं ने विधान परिषद सदस्य बनकर संवैधानिक प्रावधान पूरा किया था।

कब-कब हुआ ऐसा

कब-कब हुआ ऐसा

इस तरह से राज्य की बागडोर सँभालने वाले पहले नेता ए आर अंतुले थे। वे 1980 में मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद वसंतदादा पाटिल एक सांसद के तौर पर इस्तीफा देने के बाद फरवरी 1983 में मुख्यमंत्री बनाए गए थे। शिवाजीराव निलांगेकर पाटिल जून 1985 में मुख्यमंत्री बने थे तो वहीं शंकरराव चव्हाण जो उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे, मार्च 1986 में राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। आगे के दिनों में जब नरसिंह राव सरकार में शरद पवार रक्षा मंत्री थे तब मुंबई में हुए दंगे के बाद तब के वर्तमान मुख्यमंत्री सुधाकरराव नाइक को अपने पद से हटना पड़ा था जिसके बाद मार्च 1993 में पवार का नाम मुख्यमंत्री के रूप में सामने आया था और वे फिर तात्कालिक रूप में बगैर किसी सदन की सदस्यता के मुख्यमंत्री बने थे।

ऐसे में पद पर बने रहने का यह है एकमात्र तरीका

ऐसे में पद पर बने रहने का यह है एकमात्र तरीका

संविधान के प्रावधानों के अनुसार कोई नेता यदि विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है फिर भी वह मुख्यमंत्री पद की शपथ लेता है तो उसे पद की शपथ लेने के 6 महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य बनना होता है, तभी वह आगे अपने पद पर बना रहेगा, अन्यथा उसे पद से हटना होगा।

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