मुंबई में मुसलमान लड़की को घर न मिलने का सच

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) मुंबई में एक मुसलमान लड़की को घर न मिलना इतना बड़ा मुद्दा बन गया है, इस तरह की उम्मीद नहीं थी। हालांकि उसके साथ हिन्दू लड़की को भी घर से निकाला, ये खबर बड़ी नहीं।

मुंबई में गुजरात की एक प्रोफेशनल लड़की मिस्बाह कादरी ने आरोप लगाया कि मुसलमान होने के कारण उसे फ्लैट नहीं दिया गया। दूसरे, उस लड़की का यह भी कहना है उसे पहले भी मजहब के कारण कई घर बदलने पड़े।

सभ्य समाज की निशानी नहीं

वरिष्ठ चिंतक अवधेश कुमार मानतेहै कि किसी को मजहब के कारण फ्लैट से निकाला दिया जाना या फ्लैट किराये पर न देना सभ्य समाज की निशानी नही है। इससे हमारे समाज की छवि खराब होती है और देश के मनोवैज्ञानिक एकता की संभावना क्षीण होती है। लेकिन यह किसी एक मजहब का प्रश्न नही है। जिस तरह से इसे रंगभेद और नस्लवाद की तरह बहुत बड़ा अपराध बना दिया गया है वह अतिवाद है।

बीच का विवाद

जिस सोसायटी में वह लड़की रहने जा रही थी उस सांघवी सोसाइटी के सुपरवाइजर राजेश ने कहा कि फ्लैट न दिए जाने का कारण ब्रोकर और टेनेंट के बीच का विवाद है। उसने साफ किया है कि इस सोसायटी में मुसलमानों को रहने दिया जाता है। अगर यह सच है तो फिर उस लड़की के साथ ऐसा क्यों हुआ? लड़की के आरोप में सच्चाई है तो यह सबसे पहले दो लोगों के बीच का मामला हो सकता है।

ब्रोकर के साथ भी कुछ मामला हो सकता है। इसलिए जब तक सच न आ जाए हमें निष्कर्ष निकालने या इस पर वीर रस के कवियों की तरह सांप्रदायिकता के नाम पर गला फाड़ने से बचना चाहिए। लेकिन हमारे देश में इतने धैर्य और संतुलन का समय किसके पास है। बस, मच गया है हंगामा। मीडिया के लिए बहस का बड़ा मुद्दा है।

पिछले सप्ताह गुजरात के ही एक एमबीए ग्रैजुएट ने हीरा कंपनी पर मुसलमान होने के चलते नौकरी नहीं देने का आरोप लगाया था। अल्पसंख्यक आयोग इस आरोप की जांच कर रहा है। हीरा व्यापारी को खलनायक बना दिया। हो सकता है व्यापारी को वह नवजवान अपने काम के अनुरुप नहीं लगा हो।

अवधेश कुमार ने सही कहा कि मुसलमानों को हिन्दू घर देने से हिचकते हैं और हिन्दू को मुसलमान को। लेकिन इस मामले को इतना बड़ा बनाने का कोई कारण नहीं है। मिसबाह के साथ हिन्दू लड़कियां जो उसके साथ थी उन्हें भी पहले फ्लैट से निकाला गया।

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