'विधायकों के दलबदल को अब रोकने का समय', एंटी डिफेक्शन लॉ पर बोले उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू
नई दिल्ली, 24 अप्रैल। कई बार इस कानून में संशोधन बात उठती रही है। लेकिन अब तक को प्रभावी संशोधन नहीं हो पाया। वहीं उपष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू (M. Venkaiah Naidu) ने कहा है अब समय आ गया जब विधायकों के दलबदल रोकने के लिए दल बदल विरोधी कानून (Anti Defection law) की कमियों को दूर किया जाए।

चुनावी मौसम राजनीतिक दलों के नेता अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने से दल बदलते देखे जाते हैं। नेताओं के पार्टी बदलने के मकसद से दल बदल विरोधी (Anti Defection law) कानून बनाया गया। साल 1985 में दसवीं अनुसूची के रूप में संविधान में दल बदल विरोधी कानून शामिल है। लेकिन चुनाव आते ही जिस तरह से दल बदल की राजनीति होती है उससे अक्सर मतदाता ठगा हुआ महसूस करता है। ऐसे में उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने दल बदल कानून में संसोधन की आवश्यकता बताई है।
रविवार को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू (M. Venkaiah Naidu) ने दलबदल विरोधी कानून में खामियों पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इसमें संशोधन करने की आवश्यकता है। ये बातें उपराष्ट्रपति ने एक कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान कहीं। उन्होंने कहा 'मुझे लगता है कि दलबदल विरोधी कानून में वास्तव में संशोधन करने का समय आ चुका है। इसमें कुछ कमियां है।' उन्होंने कहा कि कानून स्पष्ट होना चाहिए और दलबदल के लिए अधिकतम छह महीना का समय तय किया जाना चाहिए। उपराष्ट्रपति ने कहा कि जन प्रतिनिधियों को दल बदलने के बजाय इस्तीफा देकर फिर से निर्वाचित होने पर जोर देना चाहिए। उन्होंने दलबदल विरोधी मामलों को सालों तक घसीटने पर भी नाराजगी जाहिर की।
क्या है दल बदल विरोधी कानून?
दल-विरोध कानून को संसद ने इसे साल 1985 में दसवीं अनुसूची के रूप में संविधान में शामिल किया था। इसका उद्देश्य विधायकों के दल बदल को रोकने ओर सरकार में स्थिरता में लाना था। इसके तहत सांसदों और विधायकों के द्वारा एक पार्टी छोड़कर दूसरे पार्टी में शामिल होने पर दंडित करने का प्रावधान है। कानून के तहत तीन प्रकार से सांसद और विधायक दल-बदल कर सकते हैं। पहला वह स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दें। दूसरा तब जब एक सांसद और विधायक निर्दलीय रूप से निर्वाचित हुए है और बाद में किसी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और तीसरा जब विधायक या सांसद ममोनित होता है और वह 6 महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाए। इसके अतिरिक्त किसी भी स्थिति में कानून का उल्लंघन होने पर दलबदल करने वाले विधायक या सांसद को दंडित किया जाता है। कानून तोड़ने का दोषी पाए जाने पर सदन के अध्यक्ष के पास सदस्यों को अयोग्य करार देने की शक्ति होती है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक सांसद या विधायक अपने फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं।
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