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बैटरी वाली गाड़ी के ज़रिए जीविका तलाशतीं तीन महिलाएं

By Bbc Hindi
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    संतोषी मुंडा
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    संतोषी मुंडा

    संतोषी मुंडा, जानकी कुमारी मुंडा और सुमन देवी रांची की सड़कों पर सरपट बैटरी रिक्शा (ई-रिक्शा) दौड़ाती हैं. यहां अब तक ये काम मर्दों का ही माना जाता था, लेकिन अब ये तीन महिलाएं भी इसमें अपनी किस्मत आज़मा रही हैं.

    इसके पीछे तीनों की ज़रूरतों की अलग-अलग कहानियां हैं. लेकिन इन तीनों के सामने मुश्किलें कुछ एक-सी ही हैं- इन्हें अपने काम के कारण कई बार पुरुषों से भद्दे ताने सुनने पड़ते हैं.

    ये तीनों ही इन तानों का जबाब देना पसंद नहीं करतीं. इनका कहना है कि उनके लिए कमाई करना ज़रूरी है ना कि किसी तरह के विवाद में पड़ना.

    मैंने तीनों से यही सवाल किया ये बैटरी रिक्शा ही क्यों चलाती हैं, ऑटो भी तो चला सकती हैं? इस प्रश्न के उत्तर में उनके जवाब कुछ इस तरह के होते हैं.

    "मैं किसी पर बोझ बनना नहीं चाहती. मेरे बच्चे का भविष्य भी तो मेरी जिम्मेदारी है, तो मुझे जो काम मिला वो करती हूं."

    "इस महगांई में बच्चों की पढ़ाई और शहर में रहना और मकान का किराया देना आसान नहीं है. परिवार चलाना है तो कमाना पड़ेगा ही. जो ज़रिया मिला, उसे अपना लिया. अब कमाने वाला मर्द हो या औरत, क्या फर्क पड़ता है."

    "कौन क्या कहता है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. कमाई होगी तभी तो खाना मिलेगा इसमें शर्म की या बात है."

    सुमन देवी, जानकी कुमारी मुंडा और संतोषी मुंडा रोज़ाना बैटरी रिक्शा चलाकर 800 से 1,000 रुपये तक कमा लेती हैं. वो अपना रिक्शा मर्दों की रिक्शा के साथ ही कतारों लगाती हैं.

    रांची जिला ई-रिक्शा चालक यूनियन के अध्यक्ष दिनेश सोनी कहते हैं, "फ़िलहाल रांची में यही तीन महिलाएं ही ई-रिक्शा चलाती हैं, लेकिन हम उम्मीद कर रहे हैं कि इन्हें देखकर और महिलाएं भी इस काम में आगे आएंगी."

    संतोषी मुंडा
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    संतोषी मुंडा

    कहानी संतोषी मुंडा की

    22 साल की संतोषी मुंडा और 27 साल की जानकी कुमारी मुंडा आदिवासी हैं. वो कहीं और से काम की तलाश में रांची आई थीं.

    संतोषी रांची से चालीस किलोमीटर दूर सिल्ली की रहनेवाली हैं. वो सालों पहले रांची आ गई थीं और किराए पर मकान ले कर रहने लगीं.

    संतोषी जब एक साल की थीं उनकी मां का देहांत हो गया था. इसके बाद उनके पिता घर छोड़ कर चले गए थे. उनके परिवार में अब उनके अलावा दो भाई और दो बहनें थीं जो उनसे बड़े थे. संतोषी के बड़े भाई सबको लेकर रांची आ गये और यहीं पर काम करने लगे.

    वो कहती हैं कि मां के बाद पता नहीं पिताजी कहीं चले गए, उनका पता नहीं चल पाया.

    "मेरी बड़ी दीदी बाई का काम करती थीं. आठ साल में मैं अपनी बड़ी दीदी के काम में हाथ बंटाने लगी और उनका साथ जाने लगी. मैं फुटबॉल खेलना चाहती थी लेकिन मेरे भाईयों ने मुझे दाई का काम सीख कर आगे वही काम करने की सलाह दी."

    संतोषी मुंडा
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    संतोषी मुंडा

    संतोषी मुंडा कहती हैं "मैंने भाई का घर छोड़ दिया और मेरी दीदी जहां काम करती थीं वहां काम करने लगी और उन्होंने मुझे रहने की जगह दी. बाद में कुछ दोस्तों से मदद मैंने पहले स्कूटी चलाई और उसके बाद ड्राइविंग सीखी."

    "इसके बाद मैंने टैक्सी चलानी शुरू की और काफ़ी पैसे जमा किए ताकि मैं अपनी टैक्सी ख़रीद सकूं. जब ई-रिक्शा आया तो मुझे लगा कि मैं ये खरीद सकती हूं, लेकिन पैसे पूरे नहीं पड़े."

    "फिर मैंने सोचा किराए पर ही गाड़ी लेकर चला लूं. सो मैंने 300 रुपये प्रतिदिन किराए पर ई-रक्शा किराए पर ले लिया. मैंने जिससे गाड़ी ली उसने मुझसे समय पर पैसे देने के लिए कहा औऱ गाड़ी दे दी."

    बीते दो साल से संतोषी मुंडा बैटरी रिक्शा चला रही हैं. उनका कहना है कि वो हर महीने करीब 20 से 25 हज़ार रुपये तक इस काम से कमा लेती हैं जिसमें से गाड़ी का किराया और उनका खर्च आसानी से निकल जाता है.

    भीड़भाड़ वाली एक सड़क
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    भीड़भाड़ वाली एक सड़क

    ज़रूरत बड़ी थी सो आगे क़दम बढ़ाया

    जानकी मुंडा का गांव टाटी सिल्वा रांची से क़रीब 20 किलोमीटर दूर है. शादी के बाद वो अपने पति के घर रांची आ गईं.

    उनके पति ऑटोरिक्शा चलाते हैं और यही परिवार की आय का एकमात्र ज़रिया है. लेकिन एक बेटी और एक बेटा होने के बाद उनके लिए घर चलाना मुश्किल हो रहा था. बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाना और घर का किराया देना संभव नहीं था.

    अपनी जमा पूंजी जोड़ कर और दोस्तों से उधार लेकर उन्होंने एक बैटरी रिक्शा खरीदा और सोचा कि इसे किराए पर लगा देंगे.

    लेकिन बैटरी रिक्शा किराए पर लेने के लिए कोई सामने नहीं आया और वो ऐसे ही पड़ी रही. इसके बाद जानकी ने फ़ैसला किया कि वो इसे ख़ुद चलाएंगी.

    जानकी कहती हैं, "मेरा बेटा प्राइवेट बोर्डिंग स्कूल में पढ़ता है और बेटी भी प्राइवेट स्कू्ल में है. उनकी फ़ीस, घर का किराया और राशन सभी इसी की कमाई से पूरा हो पाता है."

    सुमन देवी
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    सुमन देवी

    'पति की मौत के बाद काम करना शुरु किया था'

    35 साल की सुमन देवी अपने पति के निधन के बाद वापिस अपने मायके लौट आईं जो रांची के हीनू में है. उनके साथ उनका बेटा था और वो नहीं चाहती थीं कि वो अपने परिवार के लिए बोझ बनें.

    सुमन कहती हैं, "मेरा बेटा छह महीने का था जब मेरे पति इस दुनिया से चले गए. जब मेरा बच्चा जब पांच साल का हुआ तो मैं उसका एडमिशन प्राइवेट स्कूल में कराना चाहती थी. लेकिन इसके लिए मुझे काफी परेशान होना पड़ा. तभी मैंने सोच लिया था कि मुझे काम करना शुरू करना पड़ेगा.

    "मैंने रांची में एक लेडीज़ गारमेंट्स की दुकान में आठ साल काम किया और पैसा जमा किया. मुझे कम से कम रहने के लिए एक छत मिली थी तो मैं पैसा समा कर सकती थी."

    "फिर मैंने देखा कि बैटरी रिक्शा चला कर अपना खुद का काम कर सकती हूं. इसके बाद मैंने रिक्शा चलाना सीखा और रिक्शा खरीद कर खुद उसे चलाने लगी. पिछले छह महीने से बैटरी रिक्शा चला रही हूं."

    सुमन कहती हैं कि वो इस काम से रोज़ाना लगभग 800 रुपये कमा लेती हैं. सुमन अपने बेटे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती हैं और उसे इंजीनियर बनाना चाहती हैं.

    सुमन देवी
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    सुमन देवी

    रोज़ाना लड़ना होता है मुश्किलों से

    जानकी कहती हैं कि रांची की सड़कों पर बीते दो साल में बैटरी रिक्शा की संख्या काफ़ी बढ़ गई है जिस कारण हाल के दिनों में चालकों की कमाई में कमी आई है.

    वो कहती हैं कि "हमारे साथ रिक्शा चलाने वाले जो पुरुष रिक्शा चालक हैं उन्हें लगता है कि हमारे रिक्शा चलाने की वजह से ही उनकी कमाई पहले जैसी नहीं हो पा रही है."

    सुमन देवी बताती हैं कि उनके काम को बुरा बोलने वाले सवारियां नहीं होती बल्कि बैटरी रिक्शा चलाने वाले पुरुष चालक होते हैं.

    वो कहती हैं, "सड़कों पर जितने भी रिक्शा आ जाए, किसकी कितनी कमाई होगी सब किस्मत की बात है."

    संतोषी मुंडा का भी यही कहना है कि पुरुष चालक महिलाओं को अपना साथी नहीं बल्कि अपने प्रतिद्वंदी मानते हैं.

    वो कहती हैं, "ऐसा लगता है कि हम महिलाएं रिक्शा चलाकर उनके हिस्से का पैसा ले रही हैं. जबकि मुझे लगता है कि जिसकी किस्मत में जितना होगा, उसे मिलेगा ही."

    वो कहती हैं कि ऐसी अभद्र टिप्पाणियों का जवाब देकर वो उलझना नहीं चाहती हैं इसीलिए खमोश रहना ही पसंद करती हैं.

    अल्बर्ट एक्का चौक
    मो. असगर ख़ान/बीबीसी
    अल्बर्ट एक्का चौक

    रांची पिंक ऑटो महिला सर्विस संस्थापक संजय साहू का मानना है कि इस काम में महिलाओं की संख्या जितनी बढ़ेगी, लोगों की संकीर्ण मानसिकता उतनी ही तेज़ी से बदलेगी.

    वो मानते हैं कि कई बार महिला चालकों को पुरुषों के भद्दे ताने (कमेंट) सुनने पड़ते हैं. वह कहते हैं, "कई बार महिला चालकों पर इतनी अभद्र टिप्पणियां की जाती है कि उसे बयां तक नहीं किया जा सकता. इस तरह की शिकायतें आम होती जा रही हैं. मैंने कई बार इसकी शिकायत पुलिस से भी की है."

    संजय साहू ने 2013 में रांची में महिलाओं के लिए अलग से ऑटो चलाने की शुरुआत की थी. इन ऑटो की ड्राइवर और पैसेंजर दोनों ही महिलाएं होती हैं.

    रांची जिला ई-रिक्शा चालक यूनियन के अध्यक्ष दिनेश सोनी कहते हैं कि "ये पुरुष चालक उन्हें अपना दोस्त नहीं मानता और उनके ख़िलाफ़ खड़े हो जाते हैं. ऐसे लोगों से सख्ती से निपटना ज़रूरी है."

    "केवल तीन ही तो महिलाएं हैं जो ई-रिक्शा चलाती हैं, अगर उन्हें भी इसमें दिक्कतें आई तो आप समझ सकते हैं कि और महिलाएं आगे नहीं आएंगी, एसा नहीं होना चाहिए."

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    English summary
    Three women looking for livelihood through a battery car

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