केरल-कर्नाटक-महाराष्ट्र में बाढ़ की ये है असली वजह
भारत के दक्षिणी राज्य केरल में भारी और असमान्य बारिश के आंकड़े अचरज में डालने वाले हैं. राज्य में अब तक बारिश के चलते 103 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है और इनमें से करीब एक तिहाई मौतें जमीन धंसने से हुई हैं.
इसमें एक और तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है, जिन जगहों पर जमीन धंसने के मामले सामने आए हैं, वहां ग्रेनाइट की खदानें हैं. अब तक तक ग्रेनाइट की खदानों और जमीन धंसने में किसी तरह का संबंध स्थापित नहीं हुआ है, लेकिन पर्यावरणकर्ता जमीन धंसने की एक वजह इन खदानों को भी मान रहे हैं.
लेकिन इस बार बात आरोपों से आगे तक पहुंची है. केरल फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (केएफ़आरआई) के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. टीवी संजीव ने 2017 में एक अकादमिक अध्ययन के लिए ग्रेनाइट की खदानों को मापा था. इस बार उन्होंने जमीन धंसने की जगहों और उसके चलते हुई मौतों का आंकड़ा तैयार किया है.
इस पूरे मामले में एक दिलचस्प पहलू ये है इस बार क़रीब 31 जगहों पर जमीन धंसी है. इनमें से अधिकतर जगहें वो हैं जिनकी पहचान संवेदनशील इलाक़े के तौर पर माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाली वेस्टर्न घाट इकॉलाजी एक्सपर्ट पैनल के अलावा डॉ. के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली हाई लेवल वर्किंग ग्रुप ने भी की थी.
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले ग्रुप का गठन ही इसलिए हुआ था क्योंकि गाडगिल पैनल की रिपोर्ट की आलोचना हो रही थी. गाडगिल पैनल की रिपोर्ट एक तरह के पर्यावरण कार्यकर्ताओं के उस तर्क के पक्ष में थी जिसमें कहा जा रहा था कि विकास के नाम पर वेस्टर्न घाट को लूटा खसोटा जा रहा है.
लेकिन खदानों की मैपिंग और जमीन धंसने के ताजा आंकड़ों से यह ज़ाहिर हुआ है कि जिन सात जगहों में ज़मीन धंसने के कारण अधिक मौतें हुई हं उनमें से चार जगहों को गाडगिल और कस्तूरीरंगन पैनल ने पर्यावरण की नज़र से संवेदनशील इलाक़े (इकालॉजिकल सेंसेटिव जोन यानी ईएसज़ेड) बताया था.
इसका मतलब यह हुआ कि इस इलाके में खनन की इजाजत नहीं मिल सकती थी. 33 मौतों में से 24 मौतें, इन चार जगहों पर हुई हैं. बाकी की मौतें उन इलाकों में हुई हैं जिनको गाडगिल रिपोर्ट ने संवेदनशील बताया था.
लेकिन बात केवल इतनी नहीं है. लापता हुए लोगों की संख्या का फिलहाल सही-सही अनुमान लगाया नहीं गया है. हालांकि अब तक 59 लोगों के लापता होने की पुष्टि हुई है. इनमें से बड़ी संख्या में लोग उन्हीं संवेदनशील इलाक़ों से लापता हुए हैं जिनकी इन दोनों रिपोर्टों में चर्चा है.
डॉ. संजीव ने बीबीसी हिंदी को बताया, "केरल उबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाका है, जब कोई पहाड़ खिसकता है, तो इस कारण इलाके का पूरी हाइड्रोलॉजी इसके प्रभावित होती है. पानी की नहरें ब्लॉक हो जाती हैं और पूरा पानी निकट के इलाकों में जाने लगाता है. ऐसे होने पर लंबे वक्त में पहाड़ सूखे हो जाते हैं और फिर नष्ट होने लगते हैं."
ग्रेनाइट की खदानों से कनेक्शन
यह केवल साधारण पहाड़ों वाले इलाके की बात नहीं है, ग्रेनाइट के इलाके वाले क्षेत्रों में भी एक पहाड़ दूसरे पहाड़ से जुड़े रहते हैं. ऐसे में जब एक पहाड़ पर खुदाई के दौरान ग्रेनेड ब्लास्ट किया जाता है, तो इसकी वहज से होने वाला कंपन पूरे इलाके को प्रभावित करता है.
डॉ. संजीव बताते हैं कि इसके असर से 500 मीटर से लेकर पांच किलोमीटर दूर तक जमीन धंस सकती है.
वो कहते हैं, "सबसे तेज़ गति से यह कंपन हीरे के खदान में फैलता है. दूसरे नंबर पर हैं ग्रेनाइट की खदानें. यह कंपन कई बार हवा से भी तेज़ रफ्तार से फैलती है."
डॉ. संजीव ने 2017 के किए गए इस अध्ययन में 5,924 खदानों को शामिल किया गया था जो 0.02 हेक्टेयर से 64.04 हेक्टेयर में फैले हुए थे. इनमें आधे से ज्यादा 50.6 प्रतिशत 0.02 हेक्टयेर से 0.5 हेक्टेयर में फैले हुए थे. जबकि 35.7 प्रतिशत खदानों का आकार 0.5 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर के बीच था. जबकि 73 खदानों का आकार 10 हेक्टेयर से ज्यादा का था.
इनमें से ज्यादातर खदानें कानूनी तौर पर लाइसेंस लेने के बाद चल रही थीं, जिससे राज्य सरकार को लाइसेंस शुल्क और रॉयल्टी के तौर पर राजस्व की आमदनी भी हो रही थी.
कृष्णा नदी के पानी पर किचकिच
लेकिन असमान्य जलवायु (जिसे मानव निर्मित संकट भी कह सकते हैं) की चपेट में आने वाला केरल कोई इकलौता राज्य नहीं है. दक्षिण पश्चिम मानसून और असमान्य भारी बारिश से सीधे तौर पर कर्नाटक और महाराष्ट्र भी प्रभावित हुए हैं.
इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने कुछ जिलों में बाढ़ आने के लिए एक दूसरे पर तीखी टिप्पणी भी की है, इन जिलों में बाढ़ इसलिए भी आया है क्योंकि महाराष्ट्र से निकलने वाली कृष्णा नदी का पानी ख़तरे के निशान से ऊपर बह रही हैं.
संयोग ऐसा है कि दोनों राज्य के मुख्यमंत्री, एक ही पार्टी भारतीय जनता पार्टी के हैं. लेकिन इसका मौजूदा समस्या से कोई लेना देना नहीं है. पिछले दो दशक के दौरान, कई बार यह भी देखने को मिला है कि दोनों राज्य के कांग्रेसी मुख्यमंत्री एक दूसरे के प्रति तीखे बयान दे रहे थे.
ताजा मामले में महाराष्ट्र ने सांगली, कोल्हापुर और सतारा जिले में पानी भरने के लिए कर्नाटक पर आरोप लगाया है कि उसने अलमाटी नहर से पानी को जाने नहीं दिया है.
वहीं दूसरी ओर कर्नाटक ने बेलगावी, बगालकोट और उत्तर कन्नड़ा जिले में पानी भरने के लिए महाराष्ट्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है कि महाराष्ट्र ने कृष्णा नदी का ज्यादा पानी कर्नाटक के लिए छोड़ दिया है. कर्नाटक और हैदराबाद से सटे जिले गुलबर्गा और यादगीर भी बाढ़ की चपेट में हैं.
किसकी है ज़िम्मेदारी?
एक वरिष्ठ अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर बताया, "देखिए यह अस्तित्व का सवाल है, मेरा घर ऊपर है और आपका घर नीचे. अगर मैं पानी नहीं छोड़ूंगा तो मेरे लोगों को नुकसान होगा. लेकिन अगर मैं पानी छोड़ता हूं तो आपको नुकसान होगा. चूंकि पानी को समुद्र तक जाना है तो लोग दूसरे विकल्प को ही चुनेंगे."
अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया है कि दोनों राज्यों के बीच बातचीत के बाद स्थिति में सुधार हुआ है. हालांकि राज्य सरकारों की ओर से ऐसा बयान इसलिए भी आया है क्योंकि दोनों राज्यों के जलसंसाधन विभाग के प्रमुख सचिव एक ही बैच के आईएएस आफ़िसर हैं.
वैसे एक अहम मुद्दा यह भी है कर्नाकट अपने जलाशयों से पानी छोड़ना भी नहीं चाहता है क्योंकि अगर अचानक से बारिश रुक गई तो उनके पास बाद में किसानों के लिए पानी नहीं होगा. लेकिन यह अभी भी कुल मिलाकर दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों के निजी रिश्ते और तालमेल का मुद्दा बना हुआ है.
यानी आपताकाल में राज्य सरकार से राज्य सरकार के बीच बातचीत का प्रोटोकोल यहां काम नहीं कर रहा है. लेकिन कर्नाटक के सिंचाई विभाग के पूर्व सचिव कैप्टन राजा राव इस मामले को अलग नज़रिए से देखते हैं.
वो कहते हैं, "हर राज्य अपने जलाशयों की तरफ आंख बंद करके देख रहे हैं. ऐसे में मौजूदा स्थिति के लिए दोष केंद्र सरकार को लेना चाहिए."
कैप्टन राव कहते हैं, "कृष्णा ट्राइब्यूनल का फ़ैसला 2013 में आया था. सुप्रीम कोर्ट ने इसे 2016 में बरकरार रखा था. लेकिन अभी तक केंद्र सराकर ने कावेरी नदी प्राधिकरण की तर्ज पर कृष्णा नदी प्राधिकरण की स्थापना नहीं की है."
"ऐसा प्राधिकरण होने से ही जलाशयों से पानी छोड़ने के फ़ैसले में मदद मिलेगी और बाढ़ की स्थिति पैदा नहीं होगी."
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