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गाइड ने बना दिया था गोल्डी आनंद को चोटी का निर्देशक

वर्ष 1965 में आर के नारायण के उपन्यास पर देवानंद ने अंग्रेज़ी और हिंदी में एक फिल्म बनाई थी गाइड. बाद में इस फिल्म को क्लासिक फिल्म का दर्जा मिला. पिक्चर अभी बाकी है की छठवीं कड़ी में रेहान फ़ज़ल बता रहे हैं गाइड फिल्म के बनने की कहानी.

By BBC News हिन्दी
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बर्लिन फ़िल्म समारोह के बाद जब देवानंद लंदन गए तो किसी ने उनसे आर के नारायण की किताब 'गाइड' पढ़ने के लिए कहा. किताब की तलाश में वो लंदन के सबसे बड़े बुक स्टोर 'फ़ॉयल' गए लेकिन वहाँ किताब की सारी प्रतियाँ बिक चुकी थीं. लेकिन काउंटर पर खड़ी सेल्स गर्ल ने उनसे कहा कि अगर वो अपना पता छोड़ जाएं तो वो वो किताब उन तक पहुंचा देंगीं.

The guide had made Goldie Anand the top director

अगले ही दिन होटल की रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें फ़ोन कर कहा कि वो उनके लिए आया एक पार्सल उनके कमरे में भेज रही हैं. जब देव ने उस पार्सल को खोला तो उसमें 'गाइड' किताब थी.

हाइड पार्क के सामने अपने होटल की बालकनी में बेठे बैठे देवानंद ने वो किताब एक बार में ही ख़त्म कर दी. उन्हें उसी समय लग गया कि कहानी में दम है.

इस उपन्यास को तब तक अंग्रेज़ी में कहानी का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका था और उसके लेखक आर के नारायण की ख्याति दुनिया भर में फैल चुकी थी.

इससे पहले देवानंद अमेरिकी उपन्यासकार पर्ल एस बक की फ़िल्म कंपनी के साथ संयुक्त रूप से एक फ़िल्म बनाने का मन बना चुके थे. उन्होंने जब अमेरिका फ़ोन कर पर्ल से इस उपन्यास के बारे में बात की तो उन्होंने देव को तुरंत अमेरिका आने के लिए कहा.

देवानंद ने अमेरिका से ही आरके नारायण को फ़ोन मिलाया

जब देव वहाँ पहुंचे तो पर्ल ने उनसे पूछा कि क्या आप के पास किताब पर फ़िल्म बनाने के अधिकार हैं ? देव ने कहा कि वो इसे पाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा देंगे. देव ने किसी तरह आर के नारायण का फ़ोन नंबर हासिल किया और वहीं से उनको फ़ोन लगाया.

देवानंद अपनी आत्मकथा 'रोमाँसिंग विद लाइफ़' में लिखते हैं, 'नारायण ने फ़ोन उठाते ही कहा, 'आर के नारायण हियर.'

मैंने कहा 'मैं देवानंद बोल रहा हूँ.' उनका जवाब था, 'कौन देवानंद ?' मैंने कहा 'देवानंद एक्टर.'

उन्हें शायद मेरी बात पर यकीन नहीं आया. मैंने उन्हें आश्वस्त किया, 'मैं देवानंद ही हूँ.' नारायण ने मुझसे पूछा, 'मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?'

मैंने कहा क्या हम दोनों एक ऐसे प्रोजेक्ट के बारे में हाथ मिला सकते हैं जो हॉलीवुड को जीत सकता है? हम आपकी एक कहानी 'गाइड' को स्क्रीन पर उतारना चाहते हैं.

नारायण ने सवाल किया 'हम' से आपका क्या मतलब है ? मैंने उनसे पूछा क्या आपने पर्ल एस बक का नाम सुना है ? नारायण ने कहा वो मशहूर लेखिका ? मैंने कहा हाँ, हम दोनों आपकी कहानी गाइड पर फ़िल्म बनाना चाहते हैं और मैं उसमें गाइड का रोल करना चाहता हूँ. नारायण ने कहा कि उन्हें ये विचार पसंद आ रहा है.'

'रोज़ी' के रोल के लिए वहीदा रहमान को चुना गया

जब देवानंद बंबई पहुंचे तो चारों तरफ़ ये ख़बर फैल चुकी थी कि वो आर के नारायण के मशहूर उपन्यास 'गाइड' पर दोनों भाषाओं हिंदी और अंग्रेज़ी में फ़िल्म बनाने जा रहे हैं. कुछ दिनो बाद पर्ल भी बंबई पहुंच गईं.

देव ने 'सन - एन - सैंड' होटल में उनके सम्मान में एक पार्टी रखी. उन्हीं दिनों नागपुर में कांग्रेस पार्टी का सम्मेलन हो रहा था जहाँ देवानंद को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था. वहाँ उन्हें पंडित नेहरू के बग़ल में बैठने का मौका मिला. जब उन्होंने आर के नारायण की किताब पर फ़िल्म बनाने की बात नेहरू को बताई तो उन्होंने देव की पीठ थपथपा कर उन्हें शाबाशी दी.

फ़िल्म की हीरोइन रोज़ी का रोल वहीदा रहमान को मिला. वो पहले देवानंद के साथ नवकेतन की फ़िल्म 'काला बाज़ार' में काम कर चुकी थीं. पर्ल एस बक ने वहीदा रहमान के अंग्रेज़ी उच्चारण को सुधारने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली.

नसरीन मुन्नी कबीर अपनी किताब 'कनवर्सेशन विद वहीदा रहमान' में वहीदा रहमान को कहते बताती हैं, ''गाइड' के अंग्रेज़ी संस्करण के सारे डायलॉग मैंने खुद बोले. मैंने पर्ल के साथ बाक़ायदा उनका अभ्यास किया. एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, कुछ लोग चाहेंगे कि तुम अपने डायल़ॉग अमेरिकी लहजे में बोलो. लेकिन तुम ऐसा मत करना. हम तुम से सिर्फ़ ये चाहते हैं कि तुम्हारी लाइनें लोगों को समझ में आनी चाहिए. अगर तुमसे कोई ग़ल्ती होती है तो मैं उसे ठीक करूँगी. फ़िल्म की कहानी भारतीय है, तुम्हारा चरित्र भारतीय है. अगर तुम अमेरिकी लहजे में बोलोगी तो बहुत अजीब लगेगा.'

वहीदा एक प्रशिक्षित शास्त्रीय नर्तकी थीं लेकिन बहुत दिनों से उन्होंने नृत्य का अभ्यास नहीं किया था. नृत्य निर्देशक हीरा लाल ने फ़िल्म की शूटिंग शुरू होने के एक महीने पहले से वहीदा को नाचने का अभ्यास कराना शुरू कर दिया. वहीदा रोज़ सुबह तीन बजे उठतीं और नाचना शुरू कर देतीं.

दोनों निर्देशकों के बीच मतभेद

'गाइड' की शूटिंग एक शानदार अंदाज़ में शुरू हुई. बंबई के सबसे अच्छे स्टूडियो के दोनों फ़्लोर कुछ हफ़्तों के लिए बुक कर दिए गए ताकि फ़िल्म की लगातार शूटिंग हो सके.

'गाइड' के हिंदी संस्करण को निर्देशित करने के लिए देवानंद ने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को मना लिया. अंग्रेज़ी संस्करण के निर्देशन की ज़िम्मेदारी टाड डेनियलिउस्की को दी गई. तय हुआ कि फ़िल्म में पहले हिंदी शॉट लिया जाएगा और उसी सेट पर उसके बाद अंग्रेज़ी शॉट लिया जाएगा ताकि समय और पैसे दोनों की बचत हो..

देवानंद लिखते हैं, 'लेकिन ये इतना आसान काम नहीं था, ख़ासकर ये देखते हुए कि दो अलग अलग शख्सियतें मेगाफ़ोन पकड़े हुए थीं. दोनों निर्देशकों के बीच इस बात पर मतभेद होने लगे कि कैमरे को कहाँ रखा जाए. उन दोनों के रचनात्मक अहम के बीच संघर्ष रोज़मर्रा की बात हो गई और इसका असर मेरे अभिनय पर पड़ने लगा. जब हम उदयपुर में फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे तो हज़ारों प्रत्यक्षदर्शी उस जगह पहुंच गए जहाँ होली का दृश्य फ़िल्माया जा रहा था. जैसे ही मैंने और वहीदा ने उनको वेव किया, उन्होंने भी अपने हाथ उठा कर अपनी ख़ुशी का इज़हार किया.

उस क्षण को कैमरे में कैद किए जाने की ज़रूरत थी. लेकिन कैमरा नहीं चला क्योंकि निर्देशक आपस में लड़ रहे थे कि कैमरे को कहाँ रखा जाए. मेरे विचार से हमने एक बड़े शॉट का स्वाभाविक मौका को दिया.'

देवानंद से उर्मिला तक: कहानी पूरी फ़िल्मी है

गोल्डी आनंद ने चेतन आनंद का स्थान लिया

इस सबसे तंग आकर देवानंद ने तय किया कि वो पहले अंग्रेज़ी संस्करण को शूट करेंगे. इस फ़ैसले ने चेतन आनंद को वो मौका दे दिया जिसकी वो पहले से ही तलाश में थे. उसी समय उनकी अपनी फ़िल्म 'हक़ीकत' के लिए पैसों का इंतेज़ाम हो गया था. वो इस फ़िल्म में अपना पूरा दिल और जान झोंकना चाहते थे. जब उन्होंने अपनी मंशा देवानंद को बताई तो देवानंद ने उन्हें गले लगाकर उनकी नई फ़िल्म के लिए उन्हें मुबारकबाद दी.

जैसे ही चेतन आनंद इस फ़िल्म से हटे, देव ने अपने छोटे भाई गोल्डी आनंद को फ़िल्म का निर्देशक बनने के लिए तैयार कर लिया. गोल्डी शुरू में इस फ़िल्म से जुड़ने में झिझक रहे थे ,लेकिन फिर वो इसका महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए. उन्होंने भारतीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से स्क्रिप्ट लिखी.

ये भी तय हुआ कि अंग्रेज़ी संस्करण का एक भी शॉट हिंदी संस्करण में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. इसका मतलब हुआ एक ही फ़िल्म को दो अलग अलग दर्शकों के लिए दो बार बनाना.

ज़हिर है इससे फ़िल्म का बजट बुरी तरह से बढ़ गया. इससे पहले फ़िल्म इतिहास में कभी नहीं हुआ था कि एक ही कहानी को दो अलग अलग परिपेक्ष्य से दो बार एक ही कलाकारों के साथ एक के बाद एक फ़िल्माया जा रहा हो.

हसरत जयपुरी की जगह शैलेंद्र ने 'गाइड' के गाने लिखे

ये तय था कि फ़िल्म का संगीत एस डी बर्मन देंगें. लेकिन काम शुरू करने से पहले ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया. लेकिन देव ने बर्मन और गोल्डी दोनों को साफ़ कर दिया कि वो सचिनदेव बर्मन की जगह किसी दूसरे को नहीं लेंगे और उनके ठीक होने का इंतेज़ार करेंगे.

फ़िल्म में गीतकार के रूप में शैलेंद्र को लिए जाने की भी दिलचस्प कहानी है. 'गाइड' के गीत लिकने के लिए पहले हसरत जयपुरी को चुना गया था. उनका लिखा एक गीत रिकॉर्ड भी हो चुका था. लेकिन सब को लगा कि इसके बोल में कुछ बदलाव होना चाहिए.

बर्मन ने हसरत से कहा, ये गाना हम लगों की आशा के अनुरूप नहीं बन पाया है, इसलिए इसके शब्दों में थोड़े फेर बदल करने होंगें. हसरत को ये सुझाव पसंद नहीं आया. देवानंद को हसरत का ये आचरण बुरा लगा और उन्होंने उनकी जगह किसी और से गाने लिखवाने का फैसला किया.

अनीता पाध्ये गोल्डी आनंद की जीवनी 'गोल्डी द मैन एंड द मूवीज़' में लिखती हैं, 'उस ज़माने में एसोसिएशन का नियम था कि अगर गाना रिकॉर्ड हो गया है तो गीत कार को पूरी फ़ीस दी जानी चाहिए. उस समय गीतकार को एक गाने के लिए 500 रुपए मिला करते थे. देवानंद ने हसरत को 25000 रुपए का चेक भेज दिया. जब शैलेंद्र को पता चला कि नवकेतन को नए गीतकार की तलाश है तो उन्होंने देवानंद से संपर्क किया. वो पहले देव और गोल्डी के साथ 'काला बाज़ार' फ़िल्म में काम कर चुके थे और उनमें अच्छी दोस्ती हो गई थी.'

'आज फिर जीने की तमन्ना है'

हसरत ने जो गाना लिखा था उसपर विचार करने के लिए गोल्डी, देवानंद और शैलेंद्र के बीच एक बैठक हुई. रात 11 बजे इस बैठक में सचिनदेव बर्मन भी शामिल हो गए और कुछ ही मिनटों में गाइड के पहला गाने को वहीं ऱूप दे दिया गया. गाना था, दिन ढ़ल जाए, रात न आए.

इसके बाद गोल्डी ने शैलेंद्र को सिचुएशन समझाई कि रोज़ी के पति ने उसके संगीत और नाचने पर रोक लगा दी है. जब उसे महसूस होता है कि उसने अपना नृत्य और संगीत छोड़कर गलती की है तो वो फिर से अपने घुंघरू पहन लेती है.

अनीता पाध्ये लिखती हैं, 'जैसे ही गोल्डी ने अपनी बात ख़त्म की.एस डी बर्मन ने कहा आप चाहें तो घर चले जाएं. अब हम और शैलेंद्र इस गाने पर काम करेंगे. वहाँ से जाने के एक घंटे बाद गोल्डी के पास बर्मन का फ़ोन आया, गाने का मुखड़ा तैयार है, 'आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है.' गोल्डी ने पूछा इसके आगे ? लेकिन शैलेंद्र इसके आगे की लाइन नहीं बता पाए. जब कुछ दिनों तक गोल्डी के पास शैलेंद्र की तरफ़ से कोई ख़बर नहीं ई तो वो एक दिन शैलेंद्र के घर गए. उन्होंने कहा, शैलेंद्रजी, बहुत समय बरबाद हो रहा है. गाने को पूरा करिए. शैलेंद्र ने उसी समय लाइन लिखी, 'काँटों से खींच के ये आँचल, तोड़के बंधन बांधी पायल.'

गोल्डी और देवानंद के बीच मतभेद

गाइड के फ़िल्माँकन के दौरान दो ऐसे मौके आए जब गोल्डी और देवानंद के बीच मतभेद पैदा हो गए. जब 'दिन ढ़ल जाए' गाने की शूटिंग हो रही थी तो एक दृश्य में रोज़ी सीढ़ी से नीचे उतरती हैं और राजू सीढ़ी के नीचे कें बंद किए हुए खड़ा है. रोज़ी का हाथ राजू के हाथ के करीब जाता है लेकिन वो उसे छूने में झिझकती है.

शूटिंग के दौरान देवानंद का ज़ोर था कि रोज़ा राजू को छुए क्योंकि वो भी भी उसे प्यार करती है लेकिन गोल्डी इससे सहमत नहीं थे. गोल्डी का मानना था कि रोज़ी राजू को प्यार ज़रूर करती है लेकिन उसे उसकी बेइमानी, चोरी और शराब पीने की आदत बिल्कुल पसंद नहीं है.

दोनों भाइयों के बीच असहमति इस हद तक पहुंची कि फ़िल्म की शूटिंग रोक देने की नौबत आ गई. आख़िर में गोल्डी देवानंद को अपनी बात मनवाने में सफल हो गए और शूटिंग फिर से शुरू हुई.

देव बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ पर्दे पर नहीं आना चाहते थे

दूसरी बार देव और गोल्डी के बीच मतभेद तब हुआ जब फ़िल्म के अंत में राजू संत बन जाता है और बारिश लाने के लिए 12 दिन का उपवास रखता है. एक दृश्य में गोल्डी चाहते थे कि राजू को बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ कमज़ोर सा शख़्स दिखाया जाए. वो नहीं चाहते थे कि देवानंद का चेहरा देखने में ज़रा भी सुंदर लगे. देवानंद को ये कतई पसंद नहीं आया. उन्होंने कहा स्टार को पर्दे पर कभी गंदा नहीं दिखना चाहिए.

अनीता पाध्ये लिखती हैं, 'गोल्डी ने देव के मेकअप मैन को निर्देश दिया कि वो उन्हें काला दिखाएं. देवानंद को जब इसका पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया. दोनों के बीच एक तरह का शीत युद्ध शुरू हो गया. तब कैमरामैन फ़ाली मिस्त्री गोल्डी के पास गए और बोले, 'देव की बात में भी दम है. वो बड़े स्टार हैं. तुम थोड़ा बहुत अडजस्ट क्यों नहीं कर लेते ?' गोल्डी इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने कहा कि अगर मैं ऐसा करता हूँ तो फ़िल्म का मूल स्वरूप नष्ट हो जाएगा. कुछ समय बाद देव खुद महसूस करेंगे कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ , वो ग़लत नहीं है. बिल्कुल ऐसा ही हुआ और देव उसी हालत में कैमरे के सामने आए.'

वितरकों की ठंडी प्रतिक्रिया

'गाइड' के रिलीज़ होने से पहले ही ये ख़बर हर जगह फैल गई कि वो कमर्शियल फ़िल्म नहीं है. फ़िल्म के वितरक इस बात से ख़फ़ा थे कि देवानंद की फ़िल्म के अंत में मौत हो जाती है.

'गाइड' नवकेतन की अकेली फ़िल्म थी जो शूटिंग के दौरान बिक नहीं पाई थी. बंगाल के एक वितरक ने गोल्डी को सलाह दी कि वो फ़िल्म का क्लाइमेक्स चेंज कर दें और देव को मरने नहीं दें लेकिन गोल्डी ने उनकी बात नहीं मानी.

वितरकों की उदासीनता के कारण देवानंद ने बाद में उन्हें फ़िल्म दिखानी बंद कर दी. उस ज़माने में नवकेतन के लिए प्रोडंक्शन कंट्रोलर के तौर पर काम कर रहे यश जौहर ने उन्हें सलाह दी कि वो दिल्ली के वितरक को पूरा फ़िल्म न दिखा कर उसके सिर्फ़ दो गाने दिखाएं.

गोल्डी ने वितरक को दो गाने दिखाए, 'पिया तोसे नैना लागे रे' और 'गाता रहे मेरा मन.' वितरक इन गानों के फ़िल्माँकन को देख कर दंग रह गया. इससे पहले किसी ने इस तरह से गाने नहीं शूट किए थे. उसने कहा मैं आपकी फ़िल्म तुरंत ख़रीद रहा हूँ.

गाइड को 'क्लासिक' फ़िल्म का दर्जा मिला

देवानंद ने फ़िल्म जगत के कुछ चुने हुए लोगों के लिए 'गाइड' का एक विशेष शो रखा. लोग फ़िल्म देखने आए लेकिन उन्होंने शो के बाद एक शब्द भी नहीं कहा. उस ज़माने में किसी फ़िल्म के प्रीमियर के दौरान एक तरह का शादी का माहौल रहता था. लेकिन जब मराठा मंदिर में 'गाइड' का प्रीमियर हुआ तो माहौल इस तरह का था जैसे किसी का अंतिम संस्कार हो रहा हो.

मशहूर निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा ने कहा, उन्हें फ़िल्म का सिरपैर ही समझ में नहीं आया. लेकिन धीरे धीरे फ़िल्म को अच्छे रिव्यू मिलने लगे. पहले इसे एक 'अच्छी' फ़िल्म कहा गया. फिर इसे 'बहुत अच्छी' फ़िल्म कहा जाने लगा. आज इसे 'क्लासिक' फ़िल्म कहा जाता है.

इस फ़िल्म ने गोल्डी को भारत के चोटी के निर्देशकों की श्रेणी में खड़ा कर दिया. देवानंद और वहीदा रहमान दोनों के अभिनय की बहुत तारीफ़ हुई और दोनों को फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अभिनेत्री का पुरस्कार मिला.

गोल्डी को स्क्रीन प्ले और संपादन का पुरस्कार मिला जबकि आर के नारायण को सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए सम्मानित किया गया. सिर्फ़ संगीतकार एस डी बर्मन की उपेक्षा हुई. उन्हें न सिर्फ़ किसी पुरुस्कार के लायक समझा गया, बल्कि उनको पुरस्कार के लिए नामाँकित तक नहीं किया गया.

लेकिन सभी समीक्षकों ने एक स्वर से माना की 'गाइड' का संगीत किसी पुरस्कार से परे है. फ़िल्मफ़ेयर ने भले ही उसको नजरअंदाज़ कर दिया हो लेकिन दुनिया भर के संगीत प्रेमियों ने उसे सिर माथे बैठाया.

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