महाराष्‍ट्र के इतिहास में फ्लोर टेस्‍ट में कभी नहीं गिरी सरकार

महाराष्‍ट्र के इतिहास में फ्लोर टेस्‍ट में कभी नहीं गिरी सरकार, क्या फडणवीस दोहराएंगे इतिहास ?

बेंगलुरु। महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक उठापटक के बीच विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट को दरवाजा खटखटाया था। विपक्ष ने 24 घंटे में फ्लोर टेस्ट कराने की मांग की थी। जिसके बाद शिवसेना, राकांपा-कांग्रेस की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार 27 नवंबर को फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस आदेश के साथ प्रोटेम स्पीकर तुरंत नियुक्त किए जाने का आदेश दिया है।

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इस आदेश के बाद अब बुधवार की सुबह शपथ ग्रहण शुरू होगा। इसके बाद शाम 5 बजे तक ओपन बैलट के जरिए प्रक्रिया पूरी की जाएगी। विधानसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण भी होगा। महाराष्ट्र में फडणवीस सरकार का भविष्‍य अब बुधवार को होने वाले फ्लोर टेस्‍ट पर ही टिका हुआ हैं। लेकिन महाराष्‍ट्र राज्य के गठन के बाद से लेकर अब तक के इतिहास पर नजर डाली जाए तो अब तक फ्लोर टेस्‍ट में फेल होने के कारण कोई भी सरकार गिरी नही।

महाराष्‍ट्र में फ्लोर टेस्‍ट में कभी नहीं गिरी सरकार

महाराष्‍ट्र में फ्लोर टेस्‍ट में कभी नहीं गिरी सरकार

01 मई 1960 को महाराष्‍ट्र राज्य आस्तित्‍व में आया। तब से लेकर अभी तक 14 बार विधासभा चुनाव हो चुके हैं और 18 नेता मुख्‍यमंत्री मुख्‍यमंत्री बन चुके हैं। महाराष्ट्र की राजनीति का इतिहास देखें तो अभी तक एक भी सरकार फ्लोर टेस्ट में फैल होने के कारण नहीं गिरी है। लेकिन, इस बार जो स्थितियां बन रही हैं, उसे देखकर लग रहा है कि शायद इस बार यह इतिहास बदल भी सकता है।

2014 में भी इसी मोड़ पर अटकी थी फडणवीस की गाड़ी

2014 में भी इसी मोड़ पर अटकी थी फडणवीस की गाड़ी

बता दें महाराष्‍ट्र में पांच साल बाद भी महाराष्‍ट्र में बिल्‍कुल वो ही राजनीतिक माहौल है जो 2014 में था। इतने वर्षों में राजनीतिक समीकरण भले ही बदले हो लेकिन देवेन्‍द्र फडणवीस की गाड़ी उसी मोड़ पर आकर अटक गयी है जहां पांच साल पहले फंसी थी। फडणवीस को मुख्‍यमंत्री का राजतिलक करवाने के लिए वैसे ही संघर्ष करना पड़ा जैसा 2014 में करना पड़ा था। शिवसेना ही नहीं एनसीपी और कांग्रेस भी वैसी ही भूमिका निभा रहे हैं जैसी उन्‍होंने पहले निभाया थी।

2014 में भी शिवसेना का भाजपा से टूटा था गठबंधन

2014 में भी शिवसेना का भाजपा से टूटा था गठबंधन

2014 का लोकसभा चुनाव तो अच्‍छे परिणामों की खुशी के साथ बीत गया थी लेकिन जीत के बाद बीजेपी और शिवसेना के बीच दूरियां बढ़ गई थी। सीटों के बंटवारे को लेकर शिवसेना की कृपापात्र बनी बीजेपी अचानक उसे आंखे दिखाने लगी। विधानसभा चुनाव 2014 में बीजेपी ने 144 सीटों की मांग रखी, लेकिन शिवसेना के अड़ियल रवैये को देखते हुए 130 सीटों पर आ गयी।

शिवसेना और बीजेपी के साथ गठबंधन में आरपीआई, स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और राष्ट्रीय समाज पक्ष जैसी पार्टियां भी शामिल थीं। इसलिए बीजेपी को 119 और बाकियों को 18 सीटें ऑफर की गयी। जैसा बीजेपी ने इस बार किया, शिवसेना ने तब अपने हिस्से में 151 सीटें रखी थीं। बातचीत अटक गयी और चुनाव से पहले ही गठबंधन टूट गया।

2014, कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन भी टूट गया था

2014, कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन भी टूट गया था

वहीं एनसीपी और कांग्रेस के बीच भी 144 का चक्कर फंस गया। आम चुनाव में हार के बाद एनसीपी ने कांग्रेस से विधानसभा चुनाव में 144 सीटों की मांग की, साथ ही, मुख्यमंत्री पद पर में 50-50 जैसे इस बार बीजेपी के सामने शिवसेना अड़ी हुई थी। अचानक कांग्रेस ने 118 उम्मीदवारों की सूची 25 सितंबर, 2014 को जारी कर दी। फिर 25 साल पुराना बीजेपी-शिवसेना गठबंधन और 15 साल पुराना कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन एक झटके में टूट कर अलग हो गया। चुनाव हुए और नतीजे आये तो किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और फिर से जोड़ तोड़ और सपोर्ट की कवायद शुरु हो गई।

2014 में फडणवीस फ्लोर टेस्‍ट में बहुमत हासिल कर बचायी थी सरकार

2014 में फडणवीस फ्लोर टेस्‍ट में बहुमत हासिल कर बचायी थी सरकार

बता दें महाराष्ट्र विधानसभा 2014 में 288 सीटों में भाजपा 122 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी , वहीं शिवसेना 63 सीटें जीत कर नबंर दो की पार्टी बनीं थी। जबकि कांग्रेस को 42 सीटें ही मिली। शरद पवाार की राकांपा ने 41 सीटों पर बाजी मारी थी। 2014 में 31 अक्टूबर को फडणवीस ने तमाम बाधाओं को पार करते हुए महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ली थी।

वो भी नवंबर माह था जब 2014 में मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद देवेन्‍द्र को बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन की मोहलत दी गयी थी। लेकिन इस बार 14‍ दिनों की राज्यपाल से मिली मोहलत पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पानी फिर गया। 12 दिसंबर 2014 को खूब विरोध और हो हल्‍ले के बीच फडणवीस की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत हासिल भी कर दिया था। प्रतिपक्ष के चुने गए नेता एकनाथा शिंदे ने तब मत विभाजन की मांग की थी लेकिन स्‍पीकर ने मांग ठुकरा दी थी और विश्‍वास प्रस्‍ताव ध्‍वनिमत से पारित हो गया था।

कर्नाटक मॉडल अपना सकती है सरकार

कर्नाटक मॉडल अपना सकती है सरकार

भाजपा की उम्मीदें सिर्फ अजित पवार पर ही नहीं टिकी हैं। पार्टी ने इसके अतिरिक्त भी शक्ति परीक्षण के लिए कई तरह की रणनीति तैयार की है। पार्टी जरूरत पड़ने पर बहुमत साबित करने के लिए कर्नाटक मॉडल भी अपना सकती है। गौरतलब है कि तब कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार गिराने के लिए कांग्रेस और जेडीएस के कई विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था।

सोमवार को मुंबई में एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस विधायकों की मीडिया के सामने परेड के बावजूद भाजपा के रणनीतिकारों का दावा है कि फडणवीस सरकार फ्लोर टेस्ट की अग्नि परीक्षा पास कर लेगी। इसमें पार्टी की पहली रणनीति एनसीपी विधायक दल के नेता के तौर पर भाजपा को समर्थन देने वाले अजित पवार का पुराना स्टेटस (नेता विधायक दल) बरकरार रखने की है। अगर पवार को विधायक दल का नेता के रूप में मान्यता मिली तो वह शक्ति परीक्षण के दौरान भाजपा के पक्ष में वोट करने का व्हिप जारी करेंगे।

सरकार बचाने के लिए हर हाल में पास करना होगा फ्लोर टेस्ट

सरकार बचाने के लिए हर हाल में पास करना होगा फ्लोर टेस्ट

सरकार चलाने के लिए मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट के पास सदन का भरोसा होना चाहिए। सदन के भरोसे का मतलब कुल सदस्यों के 50 फीसदी से कम से कम एक ज़्यादा विधायक का समर्थन। अब कैसे पता चलेगा कि कितने विधायक सरकार के साथ हैं? इसी के लिए होता है फ्लोर टेस्ट। इसमें विधानसभा में वोटिंग कराई जाती है।

बहुमत साबित नहीं होने का मतलब है कि सरकार सदन का भरोसा खो चुकी है । इसके बाद मुख्यमंत्री सहित पूरी कैबिनेट के पास इस्तीफे के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचता। कई बार सरकारें जब ये देखती हैं कि उनके पास पर्याप्त संख्या में विधायक नहीं हैं, तो विश्वास मत से पहले ही इस्तीफा हो जाता है। जैसा कि कर्नाटक के मामले में हुआ था। बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से येदियुरप्पा को सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

इसे भी पढ़े- महाराष्‍ट्र में एनसीपी-कांग्रेस-शिवसेना को सता रहा भाजपा के ऑपरेशन लोटस का डर

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