Hyderabad: 'IT फील्ड' के लोगों को जगाना जरूरी! चुनाव आयोग के ये आंकड़े करते हैं शर्मिंदा
तेलंगाना में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2024 में लोकसभा चुनाव भी आने वाले हैं। लेकिन, चुनाव आयोग हैदराबाद जैसे उभरते महानगर में एक खास चुनौती से उबरने की कोशिशों में जुटा हुआ है। ये चुनौती है वहां मौजूद आईटी या टेक्नोलॉजी और अन्य अत्याधुनिक क्षेत्र से जुड़े युवा प्रोफेशनलों को मतदान के दिन बूथ तक लेकर आना।
चुनाव आयोग के आंकड़े देखने से आज दुनिया भर में आईटी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान कायम करने वाले इस शहर और प्रदेश की दो तस्वीरें देखने को मिलती हैं। एक वह तेलंगाना है, जहां वोटिंग का प्रतिशत काफी अच्छा रहता है। वहीं हैदराबाद का एक ऐसा भी इलाका है, जहां कहने के लिए तो शिक्षित वोटरों की भरमार है, लेकिन मतदान प्रतिशत शर्मिंदा करने वाला है।

हैदराबाद के हाई-टेक इलाके में वोटिंग से बेरुखी
चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि जिस इलाके में मतदान का प्रतिशत आधा भी नहीं रह पाता, वे हैं ग्रेटर हैदराबाद निगर निगम में आने वाले चुनाव क्षेत्र। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2018 के विधानसभा चुनाव में तेलंगाना में 73.37% वोटिंग हुई थी।
लेकिन, हैदराबाद, रंगा रेड्डी और मेडचल-मलकाजगिरी जिलों (ग्रेटर हैदराबाद) में पड़ने वाले चुनाव क्षेत्रों में 50% से भी कम वोटिंग हुई थी। ये वे इलाके हैं, जहां युवा और हाई-टेक नौकरी-पेशा में लगे प्रोफेशनलों की बहुत बड़ी आबादी रहती है।
मतदान प्राथमिकता नहीं - चुनाव कार्य से जुड़े अधिकारी
चुनाव आयोग भी ऐसे युवाओं को मतदान से बेरुखी को लेकर परेशान है। रिपोर्ट के मुताबिक वह खासकर आईटी फील्ड के कर्मचारियों के बीच वोटिंग के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए जल्द ही विशेष अभियान चलाने की तैयारी कर रहा है। रंगा रेड्डी जिले के सिस्टमेटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्ट्रोल पार्टिसिपेशन (SVEEP) के नोडल ऑफिसर पी प्रभाकर ने इस समस्या के बारे में टीओआई को बड़ी बात बताई है।
उन्होंने कहा है, 'ये शहरी उदासीनता है। सेरिलिंगमपल्ली और एलबी नगर जैसे इलाकों में पढ़े-लिखे वोटरों की संख्या ज्यादा है, फिर भी लोग वोटिंग के दिन को 'रेस्ट डे' की तरह मानते हैं या छुट्टी पर चले जाते हैं। मतदान प्राथमिकता नहीं है। इसलिए टर्नआउट इतना कम है.....' उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों की तुलना में यह पूरा उलटा है, जहां वोट डालकर लोग गर्व महसूस करते हैं।
2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी आसपास के इलाकों में आमतौर पर यही स्थिति रही थी। अब चुनाव आयोग पढ़े-लिखे लोगों की वोटिंग के प्रति इस उदासीनता को ठीक करने की कोशिशों को गंभीरता से ले रहा है। एक अन्य जिला नोडल ऑफिसर पद्मजा रानी ने कहा, 'हम जिला उद्योग निगम के जनरल मैनेजर के साथ एक बैठक करने की योजना बना रहे हैं।'
प्राथमिक जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं लोग?
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने पर विश्व भर में गौरवांवित होने वाले भारतीयों के लिए यह इसलिए शर्मिंदगी की बात है, क्योंकि ग्रेटर हैदराबाद आज अपनी एक खास वैश्विक पहचान बना रहा है। दुनिया भर की कंपनियां यहां निवेश कर रही हैं। गगनचुंबी इमारतों की भरमार होती जा रही है। लेकिन, उसमें रहने वाले लोग अपने भारतीय होने की प्राथमिक जिम्मेदारी से ही भागते नजर आते हैं।
जिम्मेदारी समझें और वोट जरूर डालें- एक अपील
पढ़े-लिखे लोगों की आबादी के बावजूद 50% से भी कम टर्नआउट बहुत ही गंभीर विषय है। खास बात ये है कि इनमें से अधिकतर वैसे प्रोफेशनल हैं, जो सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहते हैं और देश के विकास से संबंधित मुद्दों पर खुले दिल से अपना नजरिया पेश करते हैं। कई बार लोकतांत्रिक प्रणाली की खामियों को लेकर उनकी भारी नाराजगी भी देखने को मिलती है।
ऐसे में अगर वह खुद ही वोट डालने नहीं जा पाते तो उन्हें देश के राजनेताओं या राजनीतिक दलों पर उंगली उठाने का क्या हक है, इसपर विचार जरूर करना चाहिए। ओआई की यही उम्मीद है कि आने वाले चुनावों में ऐसे लोगों पर लग रहा यह चुनावी 'कलंक' जरूर मिट जाएगा।












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