मां की याचिका ठुकराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'बालिग लड़की खुद ले सकती है अपनी जिंदगी के फैसले'
सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि लड़कियां अपनी जिंदगी का फैसला खुद ले सकती हैं। उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा है कि बालिग लड़कियों को अपनी जिंदगी अपने मन मुताबिक जीने का हक है और कोर्ट उनके 'सुपर गार्जियन' न बनें।
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि लड़कियां अपनी जिंदगी का फैसला खुद ले सकती हैं। उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा है कि बालिग लड़कियों को अपनी जिंदगी मन मुताबिक जीने का हक है और कोर्ट उनके 'सुपर गार्जियन' न बनें। एक मां ने कोर्ट में याचिका डाल अपनी बेटी की कस्टडी की मांग की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ये कहते हुए ठुकरा दिया है।

खुद फैसले ले सकती हैं लड़कियां
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई में बेंच ने कहा कि बालिग लड़कियां अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकती हैं। बेंच ने कहा, 'इसके लिए यह विशेष रूप से जोर देने की जरूरत नहीं है। बालिगों को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा हक है। उनकी पसंद में कोर्ट उनका सुपर ग्राजियन नहीं बन सकता।' कोर्ट में तिरुवनंतपुरम की रहने वाली एक मां ने याचिका डालकर अपनी बेटी की कस्टडी की मांग की थी।

पिता के साथ रहना चाहती है लड़की
मां ने अपनी याचिका में कहा था कि उसकी 19 वर्षीय बेटी कुवैत में पिता के साथ रहती है। मां ने बेटी की कस्टडी की मांग की थी जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया है। लड़की ने कोर्ट को कहा कि वो अपने पिता के साथ कुवैत में रहना चाहती है और वहीं अपना करियर बनाना चाहती है।

कोर्ट ने कहा- बालिग है लड़की, ले सकती है फैसला
कोर्ट ने कहा कि लड़की ने बिना किसी झिझक के स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अपना करियर बनाने के लिए वापस कुवैत जाना चाहती थी। कोर्ट ने कहा कि लड़की बालिग है और उसे अपना फैसला लेने का पूरा हक है। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पति को 13 साल के बेटे को गर्मी की छुट्टियों के दौरान केरल में मां के पास भेजने का आदेश दिया है।












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