हिंसक हैं, नहीं हैं वे गोरक्षक-गोपालक-गोविन्द
हिंसक हैं, नहीं हैं वे गोरक्षक-गोपालक-गोविन्द
नई दिल्ली। हम बार-बार ये कहते, लिखते, सुनते आये हैं कि गोरक्षकों की हिंसा से देश को बचाओ। भले ही गोरक्षकों के पहले कथित लगाकर कर ऐसा होता हो और आम तौर पर अब तो ऐसा करने की औपचारिकता भी नहीं निभाई जाती है, तब भी बदनामी गाय की ही होती है। उनकी नहीं होती, जो हिंसा कर रहे हैं। गोरक्षक कौन हैं? किन्हें कहा जाना चाहिए गोरक्षक? क्यों गाय का वध, उनकी हत्या, उनकी तस्करी को रोकने वाले को या कथित रूप से ऐसा करने वालों को गोरक्षक की इज्जत बख्शी जाए?


गोपालक से बड़ा भी है कोई गोरक्षक?
गोपालक से बड़ा कोई गोरक्षक नहीं होता। भगवान कृष्ण गोपालक रहे। उन्हें गोविन्दा भी कहा गया, क्योंकि उन्होंने गायों के सुख-दुख का ख्याल रखा। कभी ऐसा नहीं हुआ कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन की रक्षा की, तो उन्हें अर्जुन रक्षक या फिर उन्होंने कंस समेत दुष्ट राक्षसी तत्वों से मनुष्य जाति को बचाया, तो उन्हें मनुष्यरक्षक बताया गया हो। संभवत: इसकी वजह यह सोच रही है कि जो इस धरती पर आया है उसे जाना ही है। इसलिए भगवान को भी पालक बताया गया है, रक्षक नहीं। ईश्वर को मानवता की रक्षा के लिए धर्म को प्रतिष्ठित करते हुए दिखाया गया है। यानी रक्षा के मूल में मानव नहीं मानवता रही है।

'गोरक्षक' से दिलाओ आज़ादी
हत्यारों ने अपने लिए गोरक्षक नाम ले लिया है और समाज भी उसे उसी रूप में कथित रूप से जोड़कर या हटाकर मानने लगा है। इस प्रचलन पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। जब अदालत कह रही है कि गोरक्षा के नाम पर हिंसा के शिकार लोगों को मुआवज़ा दिया जाना चाहिए, तो वह भी अपराधी को गोरक्षक बोलने से बचती नज़र आती है। यह काबिले तारीफ है। लेकिन इसे मीडिया में तवज्जो नहीं मिलती। इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि अदालत शरारती या आपराधिक तत्वों को गोरक्षक बोलने से बचती है। मीडिया की रिपोर्टिंग एक बार फिर उसी घिसे-पिटे रूप में होती है और वह भी अदालत के नाम पर होती है कि उसने गोरक्षकों से पीड़ित लोगों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। आखिर कब मिलेगी इस ‘गोरक्षक' से आज़ादी?

विरोधियों के राजनीतिक शब्दों में भी जिन्दा हैं 'गोरक्षक'
विरोधी दल भी कभी हिंसक तत्वों को'गोरक्षक' कहने पर आपत्ति जताते नज़र नहीं आते। बल्कि ‘गोरक्षक' शब्द को व्यंग्यात्मक शैली में स्वीकार करने की कोशिश उनकी रहती है। उनकी चर्चा करना व्यर्थ है जो गोरक्षा का एजेन्डा लिए फिर रहे हैं। गाय के नाम पर हिंसा करने वाले, ऐसे तत्वों को गोरक्षक कहने वाले और उसे स्वीकार या इन मामलों में चुप रहने वाले सभी ‘गोरक्षक' शब्द के दुरुपयोग के दोषी हैं।
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गोमाता को नारकीय जीवन से बचाने का आंदोलन कभी नहीं चला
चुनिन्दा जिन राज्यों में कथित गोरक्षकों का उत्पात दिखा है वहां ख़ास पार्टी की सरकार रही है जिनके एजेंडे में गाय रही हैं। दुर्भाग्य से यह पार्टी भी गोरक्षा का मतलब गायों की तस्करी, वध रोकना ही समझती रही है। कभी इससे इतर कोई अभियान इस पार्टी ने भी नहीं चलाया, जो गायों की प्रजाति को बचाने के लिए हो, उनका दयनीय जीवन ठीक करने के लिए हो। गाय को माता बताने का कार्य इस पार्टी ने जरूर किया है लेकिन इस कोशिश में गाय के बहुमूल्य जीवन को बचाने का भाव कभी निकलकर नहीं आ सका।

गोपालक हिंसा नहीं करते
गायों की चिन्ता सबसे ज्यादा गोपालकों को होती है। क्या किभी किसी ने गोपालकों को हिंसा करते देखा है? गोपालक हिंसक नहीं होते। जो गायों की ज़ुबान समझते हों, उन्हें चारा खिलाते हों, उनका दूध पीते हों, उनके गोबर, मूत्र की महक लेते हों- ऐसे लोग आकस्मिक हिंसा कर भी लें, लेकिन प्रायोजित हिंसा में भाग नहीं लेते। इसकी वजह मनुष्यता या मानवता नहीं, पशुता है- वो पशुता जो प्यार सिखाती है, सद्भावना समझाती है, बेवजह दूसरों को नुकसान नहीं करती, बेवजह हत्या, हिंसा, बलात्कार नहीं करती।

'पशुता' से सद्विचार निकाले, 'गोरक्षक' में थोपे कुविचार
हमने पशुता शब्द का भी दुरुपयोग किया है। पशुता शब्द में जो सद्विचार छिपे हैं उनको उनसे निकालकर कुविचारों को अध्यारोपित कर दिया है। इसी तरह गोरक्षकों से जो गोपालक का भाव है उसे निकालकर हमने उसे हिंसक और नकारात्मक बना दिया है। यही वजह है कि गोपालकों को जब इन कथित गोरक्षकों से जोड़ा जाता है तो बड़ा विरोधाभास नज़र आता है। ऐसे कथित गोरक्षकों का गोपालन से कभी लेना-देना नहीं रहा। आगे भी नहीं रहने वाला है।

गोपालक मुसलमान भी हैं गाय की रक्षा करने वाले
यादव जाति को गोपालक माना जाता है और उन्हें भगवान कृष्ण से जोड़ा जाता है। असली गोरक्षक यही गोपालक हैं। वैसे, अब गायों और गोपालकों का संबंध सिर्फ यादवों से नहीं रह गया है। हर जाति-धर्म के लोग गाय पालते हैं और सही मायने में गोरक्षक भी होते हैं। पेशेवर लोग भी गाय पालते हैं और मुसलमान भी गाय पालते हैं। जो मुसलमान गाय पालते हैं वे भी गोपालक और सही मायने में गोमाता की रक्षा करने वाले होते हैं।

गायों के मृत शरीर पर भी निर्भर रहते आए हैं लोग
गायों के मृत शरीर और उसके अंगों के सदुपयोग में जो लोग लगे होते हैं उनका संबंध हिन्दू वर्ण व्यवस्था में निचली जाति के लोगों से होता है। ये सदियों से यही काम करते आए हैं। यह बात अलग है कि जिन लोगों ने गायों की तस्करी, उनकी हत्या को व्यवसाय बना लिया, उन्होंने इनकी ही मजबूरी का फायदा भी उठाया। इन्हें ही अपने अस्त्र-शस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया। लेकिन, गायों के मृत शरीर से उपयोगी वस्तुओं को समाज के फायदा पहुंचाने वाली यह जाति कभी हिंसक नहीं रही। आज ऐसे ही लोगों पर कथित गोरक्षकों का गुस्सा हिंसा बनकर फूट पड़ा है।

अगर वे गो-रक्षक हैं तो उनका दर्जा गाय से भी बड़ा!
जिस गाय के मृत शरीर से कारोबार करने वाली जाति आज तक ज़िन्दा रही हो, वह गाय विरोधी कैसे हो सकती है? ऐसे लोगों पर गायों की रक्षा के नाम पर हमले हों, तो इन्हें अपने पेशे से कहीं विरक्ति ना हो जाए। कहीं ऐसा ना हो कि समाज के लिए उपयोगी काम को ये नफ़रत फैलाने वाला काम समझ बैठें, समाज को बांटने वाला काम समझ बैठें। समाज को बांटने वाला काम तो वो है जो कथित गोरक्षक कर रहे हैं। ये हिंसा फैलाते हैं, गाय के नाम पर समाज को बांटते हैं और जिन गायों को माता का दर्जा हासिल है, जिनकी पूजा होती रही है उन्हें नफ़रत की वजह बना डालते हैं। सच ये है कि अगर ये सही मायने में गोरक्षक हैं तो ये गोमाता के रक्षक हुए और इस लिहाज से इनका दर्जा देवता से भी ऊपर उठ जाता है। क्या यही सच है? कतई नहीं। गोरक्षक भ्रम है, जबकि गोपालक सत्य। गोपालक ही गोरक्षक हैं, वही गोविन्द हैं।
(21 साल से प्रिंट व टीवी पत्रकारिता में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। संप्रति IMS, नोएडा में एसोसिएट प्रोफेसर MAIL : [email protected] TWITER HANDLE : @KumarPrempu )
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