सुप्रीम कोर्ट ने विध्वंस फैसले में कवि प्रदीप के दोहे का किया जिक्र, कहा-'अपना घर पाना हर किसी का सपना होता'
सुप्रीम कोर्ट ने देश में संपत्ति विध्वंस के संबंध में ऐतिहासिक दिशानिर्देश जारी किए हैं। यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन द्वारा सह-लेखित है। जिसमें उन्होंने घर के महत्व को रेखांकित किया है। न्यायमूर्ति गवई ने मशहूर हिंदी कवि प्रदीप के एक दोहे का हवाला देते हुए कहा कि एक घर का स्वामित्व व्यक्ति और परिवार के सपनों और सुरक्षा का प्रतीक है।
संवैधानिक अधिकारों का संरक्षण
इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल अपराधों के आरोप मात्र पर या दोषसिद्धि के बिना संपत्तियों को ध्वस्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा करता है। अदालत ने दो टूक कहा कि आश्रय का अधिकार संविधान के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

बुलडोजर न्याय पर रोक
फैसले में अदालत ने निर्देश दिया कि बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए किसी भी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जाएगा। नोटिस जारी करने के बाद प्रभावित व्यक्तियों को जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने मनमाने तरीके से संपत्ति ध्वस्त किए जाने। जिसे बुलडोजर न्याय कहा जा रहा था। उस पर रोक लगाने का आदेश दिया है।
सत्ता पृथक्करण का महत्व
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि कार्यपालिका न्यायपालिका की भूमिका नहीं ले सकती है। आरोपियों के घरों को ध्वस्त करके दंडात्मक कदम उठाना संविधान में तय शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति गवई ने इस निर्णय के माध्यम से कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया।
नागरिक अधिकारों की सुरक्षा में ऐतिहासिक निर्णय
यह फैसला नागरिक अधिकारों की रक्षा और राज्य की मनमानी पर अंकुश लगाने के प्रयास में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उचित प्रक्रिया सुनिश्चित करना न केवल संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा है। बल्कि राज्य की शक्ति पर भी नियंत्रण है।












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