Guidelines for Governors: तो क्या सिर्फ नाम के रह जाएंगे राज्यपाल?

देश में राज्यपालों और कुछ राज्य सरकारों के बीच खींचतान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह गवर्नरों के लिए गाइडलाइंस तैयार करने पर विचार करेगा।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच के मुताबिक गवर्नरों के लिए जिस गाइडलाइंस की वह बात हो रही है, उसमें उसके लिए किसी विधेयक को मंजूरी देने या उसे खारिज करने की समय सीमा निर्धारित होगी। साथ ही यह भी दिशा-निर्देश होगा कि राज्यपाल किसी विधेयक को कब राष्ट्रपति के पास उसकी सहमति के लिए भेज सकता है।

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राज्यपालों की शक्तियों पर लगेगा लगाम?
सीधे शब्दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस तरह की गाइडलाइंस तैयार होने का मतलब ये होगा कि राज्यपालों की ओर से अभी जिस तरह से विवेकानुसार किसी विधेयक को मंजूर करने, खारिज करने या रोके रखने के अधिकारों का इस्तेमाल किया जाता है, उसपर लगाम लग सकता।

केरल सरकार के वकील की ओर से की गई है मांग
सीजेआई चंद्रचूड़ की ओर से राज्यपालों की गाइडलाइंस वाली बात तब की गई है, जब केरल सरकार के वकील और पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने इस तरह की गाइडलइंस की पैरवी की है। हालांकि, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने वेणुगोपाल की दलील का विरोध किया है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में काम करने की बात कही है।

केंद्र और राज्यों में अलग दलों की सरकारों की वजह से आती है अड़चन
देश की राजनीति का ट्रेंड देखें तो जब केंद्र और राज्यों में शासन करने वाली पार्टियां अलग-अलग रही हैं, तभी कई बार राज्य सरकारों और राज्यपालों में विवाद पैदा होते देखा गया है। हालांकि, यह सर्वमान्य नियम नहीं है और ज्यादातर राज्यपालों ने दूसरे दलों की राज्य सरकारों के साथ अच्छी तालमेल बिठाकर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है।

वैसे संवैधानिक तौर पर राज्यपाल किसी पार्टी का व्यक्ति नहीं होता, लेकिन केंद्र सरकार की इच्छा तक उसके कार्यकाल रहने की वजह से वह देश की सत्ताधारी पार्टी का ही नुमाइंदा मान लिया जाता है।

केरल के राज्यपाल पर विधेयकों पर फैसला लेने में देरी का आरोप
मौजूदा समय में केरल, पंजाब और तमिलनाडु सरकारों और वहां के गवर्नरों के बीच इतने ज्यादा मतभेद पैदा हुए हैं कि यह मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट की ओर से जिस गाइडलाइंस की आवश्यकता बताई गई है, केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को लेकर है, जिनपर आरोप है कि उन्होंने विधानसभा से पास विधेयकों पर फैसला लेने में अनावश्यक देरी की है।

लोग हमसे इसके बारे में पूछते हैं- सीजेआई चंद्रचूड़
इसी मामले की सुनवाई के दौरान सीजेआई चंद्रचूड़ ने पूछा है कि 'दो वर्षों तक गवर्नर क्या कर रहे थे।' यह सवाल उन विधेयकों को लेकर था, जो 2021 में विधानसभा से पास हो चुके हैं, लेकिन गवर्नर की सहमति के लिए लटके हुए हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि राज्यपाल जवाबदेह हैं और अदालत का 'संविधान के प्रति जिम्मेदारी है... लोग हमसे इसके बारे में पूछते हैं।'

केरल सरकार ये शिकायत लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है कि राज्य विधानसभा से पारित 15 विधेयक राज्यपाल की मंजूरी में देरी की वजह से अटके हुए हैं। वेणुगोपाल की ओर से अदालत को बताया गया कि 8 में से 7 बिलों को तो उन्होंने राष्ट्रपति की सहमति के लिए भेज दिया, जबकि उसमें किसी केंद्रीय कानून को लेकर कोई विवाद नहीं था।

पंजाब और तमिलनाडु के राज्यपाल से भी सुप्रीम कोर्ट पूछा चुका है सवाल
कुछ ही दिन पहले ऐसे ही मामले में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि से विधानसभा से पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर करने में देरी को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था। वहीं पिछले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की याचिका पर राज्य के गवर्नर बनवारीलाल पुरोहित से कहा था कि उनके पास जो शक्तियां हैं, उसे 'कानून निर्माण की सामान्य प्रक्रिया को विफल करने' के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

तो क्या सिर्फ नाम के रह जाएंगे राज्यपाल?
इन परिस्थितियों में अगर सुप्रीम कोर्ट की ओर से विधेयकों पर फैसले को लेकर राज्यपाल के लिए गाइडलाइंस निर्धारित कर दी जाती है तो वह निश्चित समय-सीमा के भीतर उसपर फैसला करने के लिए बाध्य हो सकते हैं। यानि विवेकानुसार फैसला लेने के उनके अधिकार पर लगाम लग सकता है।

क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 200
संविधान के अनुच्छेद 200 के प्रावधानों की बात करें तो जब विधान मंडल से कोई विधेयक पास हो जाता है और राज्यपाल के पास भेजा जाता है तो उसके पास चार विकल्प होते हैं- वह उस विधेयक को अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, अगर कुछ संसोधन की आवश्यकता समझता है तो उसे विधान मंडल को वापस लौटा सकता या फिर राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।

लेकिन, अगर विधानसभा से संशोधन के साथ या बिना संशोधन के उस विधेयक को दोबारा राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा जाता है तो वह उसपर अनुमति नहीं रोक सकता है।

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