राजीव गांधी के PM रहते ही पावर सेंटर बन गयी थीं सोनिया !

नई दिल्ली, 23 सितंबर। जिस सोनिया गांधी को कभी राजनीति से सख्त परहेज था आज वो कांग्रेस की सर्वशक्तिमान नेता हैं। उनके सबसे भरोसेमंद सलाहकार अहमद पटेल भी अब नहीं हैं। फिर भी वे कठिन से कठिन फैसला लेने में सक्षम हैं। पंजाब के बाद राजस्थान में भी मुख्यमंत्री बदलने की तैयारी है।

Sonia gandhi had become a power center when Rajiv Gandhi was PM

प्रशांत किशोर, कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी को कांग्रेस में लाने की योजना है। जी-23 का विरोध भी उन्हें विचलित नहीं कर पाया। क्या सचमुच सोनिया गांधी को राजनीति से घृणा थी ? एक बार सोनिया गांधी ने एक इंटरव्यू में कहा था, मैं अपने बच्चों को भीख मांगते हुए देखना पसंद करूंगी लेकिन उन्हें राजनीति में कभी नहीं आने दूंगी। लेकिन परिस्थितियों का पहिया कुछ यूं घुमा कि न केवल सोनिया गांधी बल्कि उनके दोनों बच्चे भी राजनीति में आये और तीनों आज पॉलिटिक्स को इंज्वाय कर रहे हैं।

क्या सोनिया गांधी को सच में राजनीति से परहेज था?

क्या सोनिया गांधी को सच में राजनीति से परहेज था?

सोनिया गांधी ने इंडिया टूडे कॉन्क्लेव 2018 में कहा था, "मेरे और राजीव गांधी के पास काफी वक्त रहा करता था।( राजीव उस समय पायलट थे।) बच्चे छोटे थे। खुशहाल परिवार था हमारा। तब मैं सोचती थी कि अगर राजीव जी राजनीति में जाएंगे तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। ये खुशियां खत्म हो जाएंगी। अगर आप ईमानदारी से राजनीति करेंगे तो जनता की सेवा आपकी पहली प्राथमिकता होगी। बाकी चीजें दूसरे स्थान पर चली जाएंगी। इसलिए मैं अपने पति के राजनीति में जाने खिलाफ थी। जब मेरी सास की हत्या कर दी गयी तब मैं चाहती थी कि मेरे पति उनका स्थान नहीं लें। तब मैं शायद थोड़ा स्वार्थी हो गयी थी। खतरे बढ़ गये थे। आसपास जो बातें हो रही थीं उससे मुझे लगता था कि कहीं मैं अपने पति को भी न खो दूं। बाद में ऐसा ही हुआ।" क्या सोनिया गांधी एक मां और पत्नी के रूप में खुश थीं और वे सत्ता प्रतिष्ठान के आकर्षण दूर रहना चाहती थी ?

राजीव गांधी के जमाने में सोनिया गांधी की दखल

राजीव गांधी के जमाने में सोनिया गांधी की दखल

सोवियत संघ के अंतिम शासक मिखाइल गोर्बाचेव नवम्बर 1986 में भारत आये थे। महाशक्ति सोवियत संघ के शासन प्रमुख होने की वजह से उनकी सुरक्षा के लिए बहुत सख्त इंतजाम किये गये। उस समय राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री थे। तब राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा थी कि सोनिया गांधी का राजकाज के मामलों में भी काफी दखल था। एक प्रधानमंत्री के घर में कौन आएगा और कौन नहीं, इसका फैसला सोनिया गांधी करती थीं। उस समय राजीव गांधी के आसपास अरुण नेहरू, अरुण सिंह, अर्जुन सिंह जैसे विशवस्त सहयोगी मौजूद थे लेकिन शक्ति का असल केन्द्र सोनिया गांधी थी। जब गोर्बाचोव भारत आये तो उनके सम्मान में राजकीय भोज का आयोजन किया गया था। सुरक्षा कारणों से इस भोज में मेहमानों की सूची को कम कर दी गयी थी। यहां तक कि कई मंत्रियों और बड़े अधिकारियों के परिवारों को भी मना कर दिया गया था। पीएमओ ने बाकायदा इसके लिए निर्देश जारी किये थे। लेकिन सोनिया गांधी ने अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर मेहमानों की सूची में जया बच्चन का नाम जुड़वा दिया था। जया बच्चन उस समय सोनिया गांधी की पक्की सहेली थीं और अमिताभ बच्चन राजीव गांधी के परम मित्र। पर्दे के पीछे रहकर भी सोनिया गांधी पावर सेंटर बन चुकी थीं।

सोनिया गांधी की हिंदी

सोनिया गांधी की हिंदी

एक इंटरव्यू में सोनिया गांधी से पूछा गया था, क्या ये सच है कि जिस शिक्षक ने आपको 1968 में हिंदी सिखायी उसे बाद में मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद बना दिया गया था ? तब सोनिया गांधी ने कहा था, हां, मुझे एक व्यक्ति की याद आ रही है जिन्होंने मुझे हिंदी सिखायी थी। लेकिन मुझे उनका नाम याद नहीं है। मैं ये भी नहीं जानती कि वे कहां के रहने वाले थे। मुझे मालूम नहीं कि उन्हें कब और कैसे टिकट दिया गया। वैसे कहा जाता है कि राजीव गांधी की कैबिनेट में भी सोनिया गांधी की पसंद और नापसंद का असर रहता था। जब राजीव गांधी ने पहली बार सोनिया गांधी को अपनी मां से मिलाया था तब सोनिया को अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती थी। वे इटली से पढ़ने के लिए कैम्ब्रिज गयीं थीं और अभी अंग्रेजी सीख ही रहीं थीं। तब सोनिया को फ्रेंच और इतालवी भाषा ही आती थी। जब इंदिरा गांधी को सोनिया की परेशानी मालूम हुई तो उन्होंने पहली बार अपनी होने वाली बहू से फ्रेंच में बात की थी। 1968 में राजीव गांधी की सोनिया से शादी हुई। इंदिरा गांधी के कहने पर सोनिया ने हिंदी सीखने की कोशिश शुरू की। हिंदी अक्षर ज्ञान और व्याकरण सीखने के लिए वे दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित एक संस्थान में जाने लगीं। सोनिया गांधी ने खुद बताया था कि हिंदी सीखना उनके लिए कितना मुश्किल काम था। किसी तरह टूटी फूटी हिंदी बोलना सीख लिया लेकिन उच्चारण में उन्हें हमेशा परेशानी रही।

विरासत की राजनीति ने सोनिया को मजबूत बनाया

विरासत की राजनीति ने सोनिया को मजबूत बनाया

1998 में जब सोनिया गांधी कांग्रेस का अध्यक्ष बनी तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या ये आयी कि वे भाषण कैसे देंगी। भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी और कांग्रेस नेता नटवर सिंह के मुताबिक, कभी मैं अकेले और कभी सोनिया गांधी के साथ मिल कर उनके भाषण तैयार करता था। जयराम रमेश भी इसमें मदद करते थे। फिर उसका हिंदी में अनुवाद किया जाता। हिंदी को रोमन में लिख कर सोनिया गांधी को दिया जाता। अच्छी वक्ता नहीं होने की वजह से उन्हें बहुत दिक्कत होती थी। वे घड़ी देख कर जोर-जोर से भाषण पढ़तीं। रोमन में लिखी हिंदी पढ़ने में वे लड़खड़ाने लगतीं। लेकिन इन कमियों के बावजूद विरासत की राजनीति ने कांग्रेस में उनकी स्थिति मजबूत कर दी। चुप और शांत रहने वाली सोनिया गांधी धीरे-धीरे महात्वाकांक्षी और आत्मकेन्दित नेता बन गयीं। उन्होंने बिना प्रधानमंत्री बने ही सत्ता का वास्तविक इस्तेमाल किया। मनमोहन सिंह के पूर्व प्रेस सलाहकार संजय बारू ने लिखा है सरकार की सभी महत्वपूर्ण फाइलें अंतिम मंजूरी के लिए सोनिया गांधी के पास जाती थीं। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री के रूप में केवल दस्तखत करते थे। आज सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े फैसले ले रहीं हैं।

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