• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

सोनिया गांधी ने कब-कब कांग्रेस को संकटों से उबारा, ऐसा है उनका राजनीतिक सफर

|
    Sonia Gandhi ने कब-कब Congress को संकट से उबारा ?, जानें सोनिया की Political Journey | वनइंडिया हिदी

    नई दिल्ली- कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी इटली के एक साधारण परिवार में पैदा हुईं, लेकिन भारत आते ही उनकी एंट्री देश की सबसे ताकतवर पॉलिटिकल फैमिली में हो गई। वे भले ही तीन दशकों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहीं, लेकिन भारत में उनका जीवन चक्र हमेशा ही सियासत की बिसात के चक्कर काटता रहा। हम यहां उस दौर की बात करेंगे, जब भारतीय राजनीति में सोनिया बेहद प्रभावी शख्सियत के तौर पर मौजूद रही हैं। ये सफर औपचारिक तौर पर 1997 में शुरू हुआ था, जो आज भी बदस्तूर जारी है। इस दौरान देश की सबसे पुरानी पार्टी ने कई उतार-चढ़ाव का समय देखा है, जिसमें पार्टी जब भी बुलंदियों पर पहुंची है तो उसके पीछे सिर्फ सोनिया का ही करिश्मा माना जाता है।

    शुरू में पार्टी से बनाकर रखी दूरी

    शुरू में पार्टी से बनाकर रखी दूरी

    सोनिया को कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में लाने की कवायद 1991 से ही शुरू हो चुकी थी। तब भी पार्टी में एक बड़ा वर्ग था जिसने माना था कि अगर सोनिया ने सहारा नहीं दिया तो भारत कांग्रेस मुक्त हो जाएगा। लेकिन, चाहे पारिवारिक मजबूरी रही हो या रणनीति सूझबूझ सोनिया ने करीब 6 साल तक खुद को कांग्रेस के मामलों से आमतौर पर दूर ही बनाकर रखा। पार्टी में उनकी औपचारिक एंट्री 1997 में हुई जब, उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता हासिल की। करीब एक साल तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहने के बाद 1998 में उन्होंने पार्टी के कार्यों में तब सामने से दखल देना शुरू कर दिया, जब उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया।

    पार्टी के लिए मुश्किल वक्त की 'मसीहा'

    पार्टी के लिए मुश्किल वक्त की 'मसीहा'

    1998 में सोनिया ने जब पहली बार कांग्रेस की कमान संभाली तब भी पार्टी की हालत बेहद नाजुक थी। बीजेपी की अगुवाई में एनडीए का दबदबा बढ़ रहा था। उस दौर में गैर-कांग्रेस, गैर-बीजेपी दलों की भी भूमिका अहम बनी हुई थी। उस समय भी कांग्रेस केंद्र में सत्ता से दूर थी और सिर्फ 4 राज्यों में उसकी सरकारें वजूद में रह गई थी। मौजूदा समय की तरह ही उस समय भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला शुरू था और कई ने कांग्रेस से अलग होकर क्षेत्रीय पार्टियां गठित कर ली थी। सोनिया ने यहीं से कांग्रेस को संभालना शुरू किया। 1999 में वे पहली बार अपने ससुराल वालों की पुश्तैनी अमेठी लोकसभा क्षेत्र से चुनकर संसद पहुंचीं, जिससे उन्हें लोकसभा में नेता विपक्ष बनने का मौका मिला। अगले पांच सालों में उनका पार्टी और देश की राजनीति में प्रभाव बढ़ता गया। वह एनडीए का दौर था, कांग्रेस खंडहर में तब्दील होती दिख रही। लेकिन, तभी मीडिया के वर्ग ने उन्हें भारत की सबसे ताकतवर महिला का उपमा देना शुरू कर दिया था। पांच साल में उन्होंने कांग्रेस के लिए कैसी जमीन तैयार की, इसका नतीजा 2004 में दिखाई पड़ा, जब कांग्रेस के प्रभाव ने एनडीए की अटल सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया। 2004 में उन्होंने अमेठी सीट बेटे राहुल के लिए छोड़ दी और खुद 2004, 2009, 2013 और 2019 का चुनाव लगातार रायबरेली लोकसभा सीट से जीती।

    इसे भी पढ़ें-अमरिंदर ने की थी युवा को कांग्रेस की कमान सौंपने की मांग, सोनिया को अध्यक्ष बनाने पर कही बड़ी बातइसे भी पढ़ें-अमरिंदर ने की थी युवा को कांग्रेस की कमान सौंपने की मांग, सोनिया को अध्यक्ष बनाने पर कही बड़ी बात

    2004 में मनमोहन को कमान

    2004 में मनमोहन को कमान

    2004 में देश की जनता का जो मैनडेट आया था, उससे तय लग रहा था कि सोनिया गांधी अगली प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं। लेकिन, उन्होंने इस पद के लिए मनमोहन सिंह का नाम आगे करके तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में एक मास्टरस्ट्रोक चलकर पूरी दुनिया को चौंका दिया। सोनिया के इस फैसले से कांग्रेस वाले भी हक्का-बक्का रह गए थे, लेकिन सोनिया टस से मस होने को तैयार नहीं हुईं। कुछ समर्थकों ने इसे उनकी त्याग का नाम दिया तो किसी ने इसे राजनीति की बहुत बड़ी बाजी बताना शुरू कर दिया। इसके बाद लगातार दो कार्यकाल तक यूपीए की सरकार चली, जिसके चेहरे मनमोहन सिंह बने रहे और सोनिया यूपीए अध्यक्ष के तौर पर पीछे से उसका संचालन करती रहीं।

    सोनिया की राजनीतिक ताकत

    सोनिया की राजनीतिक ताकत

    कहा जाता है कि सोनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनकी सियासी चुप्पी में है। वह सार्वजनिक जीवन में कम बोलती हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी में उनकी इजाजत के बिना पत्ता भी हिलना मुश्किल रहा है। पार्टी ही नहीं, कहा जाता है कि यूपीए सरकार के दौरान सत्ता में भी बिना उनकी मर्जी कुछ भी होना कभी संभव नहीं रहा। सूती की साड़ियों में उनके समर्थक हमेशा उनमें उनकी सास और राहुल-प्रियंका की दादी इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं तो उनकी हिंदी बोलने के टोन पर बीजेपी उनके इटली के रिश्ते के बहाने तंज कसती रही है। बहरहाल, ये सच्चाई है कि 2004 से 2014 के दौर में जब केंद्र की सत्ता पर सोनिया का दबदबा रहा तो देश के कई राज्यों में कांग्रेस को फिर से सत्ता में वापस लौटने का मौका मिला। सोनिया के समर्थक कहते हैं कि अनेक बाधाओं के विपरीत उन्होंने न तो खुद पर कभी विदेश की सीमा को हावी होने दिया और न कभी भाषा की बेड़ियों में ही उलझने दिया। वह हर अड़चनों को पार कर अपना मुकाम हासिल करती चली गईं।

    विपक्षी एकता की भी रही हैं धुरी

    विपक्षी एकता की भी रही हैं धुरी

    सोनिया सिर्फ कांग्रेस की धुरी का ही काम नहीं करतीं, वो विपक्षी एकता के लिए भी धुरी बनती रही हैं। 2004 में वाजपेयी सरकार गिरने के बाद बीजेपी के खिलाफ जिस तरह से विपक्ष उनके नेतृत्व में एकजुट हुआ, वह इसका पहला सबसे बड़ा उदाहरण है। आगे 10 साल सरकार भी उन्हीं के इस प्रभाव के चलते चल सकी। 2014 और 2019 में भले ही नरेंद्र मोदी के उदय ने सोनिया के परिवार का सियासी रंग फीका कर दिया है, लेकिन ये भी हकीकत है कि आज भी राहुल के मुकाबले विपक्षी दल सोनिया की छत्रछाया में ही खुद को ज्यादा महफूज महसूस करते हैं। इसलिए वे कांग्रेसियों के लिए ही नहीं विपक्षी दलों और कांग्रेस से अलग होकर बने क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए भी ग्लू का काम करती हैं। एनसीपी के शरद पवार हों या टीएमसी की ममता बनर्जी, सोनिया के पीछे चलने में उनका सम्मान आड़े नहीं आता। लेकिन, राहुल अपनी मम्मी से यहां भी पिछड़ जाते हैं। 2019 में भी अगर सोनिया के हाथों में कांग्रेस की सत्ता होती तो शायद विपक्ष ज्यादा गोलबंदी के साथ मोदी की बीजेपी को घेरने में सफल हो पाता।

    सत्ता में न रहकर भी सत्ता पर कमान

    सत्ता में न रहकर भी सत्ता पर कमान

    खराब सेहत और बेटे को उत्तराधिकारी नियुक्त करने के बाद के लगभग 16-17 महीने तक उन्होंने खुद को पार्टी के मामलों से दूर कर लिया था। उन्हें लगा था कि बेटा लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ेगा। लेकिन, 23 मई को जो नतीजे आए उसने बीमारी के बावजूद सोनिया को पार्टी की कमान वापस अपने हाथ में लेने को मजबूर कर दिया। पिछले ढाई महीने से वो किसी न किसी रूप में पार्टी पर नजर रख रही थीं। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुई संसद के पहले सत्र में उन्होंने पार्लियामेंट के अंदर और बाहर दोनों जगह पार्टी की रणनीति बनाने में अगुवा की भूमिका निभाई। सत्ता में नहीं रहते हुए भी उसकी चाबी अपने हाथों में रखना उनकी सियासत की एक बहुत बड़ी खूबी मानी जा सकती है। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान नेशनल एडवाइजरी काउंसिल (एनएसी) का गठन उनकी इसी सोच का परिणाम माना जा सकता है। यही कारण है कि यूपीए कार्यकाल के दौरान बीजेपी सत्ता के 'दो पावर सेंटर' होने के आरोप लगाती रही है।

    इसे भी पढ़ें- पार्टी की कमान फिर से सोनिया के हाथ, गांधी परिवार के ये लोग संभाल चुके हैं कुर्सीइसे भी पढ़ें- पार्टी की कमान फिर से सोनिया के हाथ, गांधी परिवार के ये लोग संभाल चुके हैं कुर्सी

    English summary
    Sonia Gandhi: Congress Troubleshooter-in-chief in times of trouble
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    For Daily Alerts
    तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
    Enable
    x
    Notification Settings X
    Time Settings
    Done
    Clear Notification X
    Do you want to clear all the notifications from your inbox?
    Settings X
    X