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SMASH 2000 Plus:आने वाला है पाकिस्तानी ड्रोन का 'काल', इजरायली एंटी-ड्रोन सिस्टम के बारे में जानिए

नई दिल्ली, 29 जून: जम्मू एयरपोर्ट की घटना के बाद भारत बहुत जल्द अपने सैन्य ठिकानों पर एंटी-ड्रोन सिस्टम की तैनाती कर सकता है। इस तरह की टेक्नोलॉजी के साथ भारतीय नौसेना पहले से ही ड्रिल कर रही है। असल में ड्रोन और स्मॉल फ्लाइंग ऑब्जेक्ट के साथ दिक्कत ये है कि वह रडार की पकड़ में जल्द नहीं आ पाते और उनपर मैन्युअल उपायों से ही नजर रखना पड़ता है। लेकिन, इजरायल ने जो एंटी-ड्रोन सिस्टम विकसित कर रखा है, वह ऐसे पाकिस्तानी ड्रोन के लिए काल साबित हो सकते हैं। नौसेना इसकी खरीद की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी है और संभावना है कि आर्मी और एयरफोर्स भी आने वाले दिनों में इसकी ओर कदम बढ़ा सकते हैं।

आने वाला है 'ड्रोन किलर'

आने वाला है 'ड्रोन किलर'

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सुरक्षा बल पहले से ही इजरायली एंटी-ड्रोन सिस्टम स्मैश 2000 प्लस को आजमाने में लगे हुए हैं। लेकिन, जम्मू एयरबेस पर हुए देश के पहले ड्रोन अटैक ने अब इसकी तत्काल खरीदगी की आवश्यकता की ओर ध्यान दिला दिया है। रविवार को तड़के जम्मू एयरपोर्ट पर दो ड्रोन से गिराए गए बम की चपेट में आकर एयरफोर्स के दो कर्मचारी जख्मी हो गए थे और एक बिल्डिंग की छत भी क्षतिग्रस्त हो गई थई। उसके बाद से लगातार दो दिनों से जम्मू के आसपास के संवेदनशील इलाकों में संदिग्ध ड्रोन मंडराते देखे जाने की भी रिपोर्ट हैं। यही नहीं अप्रैल-मई-जून में जम्मू-कश्मीर में विदेशी ड्रोन मंडराने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

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    एंटी-ड्रोन सिस्टम स्मैश 2000 प्लस क्या है

    एंटी-ड्रोन सिस्टम स्मैश 2000 प्लस क्या है

    रक्षा सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इजरायली एंटी-ड्रोन स्मैश 2000 प्लस (एसएमएएसएच 2000) एक ऐसा सिस्टम है, जिसे राइफल पर फिट किया जाता है और उससे तेज स्पीड से उड़ रहे किसी भी ड्रोन को निशाना बनाया जा सकता है। खास बात ये है कि भारतीय नौसेना पहले से ही इस एंटी-ड्रोन सिस्टम की खरीदारी की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है और सेना और वायुसेना भी अब इसकी प्रक्रिया जल्द शुरू कर सकती है। स्मैश 2000 प्लस एंटी-ड्रोन सिस्टम को एके-47 या इसी तरह की किसी और राइफल पर अलग से फिट किया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक यह उपकरण ड्रोन और दूसरे किसी भी स्मॉल फ्लाइंग ऑब्जेक्ट का पता लगा सकता है और यह दिन के साथ-साथ रात में भी काम करने में सक्षम है।

    क्यों मुश्किल होता है ड्रोन का पता लगाना

    क्यों मुश्किल होता है ड्रोन का पता लगाना

    कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की वजह से ड्रोन अक्सर रडार की नजरों से बच जाते हैं। ऐसी स्थिति में सुरक्षाकर्मी सिर्फ मैन्युअल तरीके से ही उनका पता लगा सकते हैं और नजदीक आने पर ही उन्हें नीचे आने के लिए मजबूर कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि रक्षा मंत्रालय पहले से ही महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर इस एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी को लगाने पर विचार कर रहा था, लेकिन अब इसपर जल्द ही फैसला लिया जा सकता है। गौरतलब है कि मोदी सरकार पहले से ही सभी सेना प्रमुखों को तत्कालिक आवश्यकताओं के मद्देनजर ऐसे उपकरणों को खरीदने का अधिकार दे चुकी है।

    अब बाहरी ड्रोन को नजरअंदाज कर पाना नामुमिकन

    अब बाहरी ड्रोन को नजरअंदाज कर पाना नामुमिकन

    बता दें कि 2019 के बाद से सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों में पाकिस्तान की ओर से ड्रोन और अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट भेजे जाने की करीब 250 से 300 घटनाएं सामने आ चुकी हैं। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 खत्म किए जाने के बाद से इनमें इजाफा देखा गया है। पंजाब से लेकर जम्मू-कश्मीर तक ड्रोन से हथियार और गोला-बारूद गिराने के कई मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन, जम्मू एयरबेस की घटना ने सुरक्षा एजेंसियों के साथ-साथ सरकार के भी कान खड़े कर दिए हैं और अब इसका तत्काल उपाय ढूंढ़ना बहुत ही जरूरी हो गया है। (तस्वीरें- प्रतीकात्मक और फाइल)

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