राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस-शिवसेना के बीच सीढ़ी का काम करेंगे शरद पवार!

राष्ट्रपति चुनाव में शरद पवार हो सकते हैं विपक्ष के लिए अहम, शिवसेना निभा सकती है मुख्य भूमिका

नई दिल्ली। देश के अगले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए सियासी गठजोड़ तेज हो गया है, कई नाम इस पद के लिए सामने आए हैं जिसको लेकर सियासी महकमें में चर्चा चल रही है। लेकिन इनमे एक दिलचस्प बात यह सामने आई है कि जिस तरह से भाजपा और शिवसेना के बीच पिछले कुछ दिनों से खींचतान चल रही है, ऐसे में अगर शिवसेना विपक्ष के साथ जाती है तो भाजपा के लिए अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुनना मुश्किल हो जाएगा, शिवसेना के पास कुल 25893 वोट हैं।

विपक्ष में तीन नामों पर चर्चा

विपक्ष में तीन नामों पर चर्चा

लगातार जिस तरह से विपक्ष को हाल के चुनावों में भाजपा के सामने हार का सामना करना पड़ा रहा है, फिर चाहे वह हाल के एमसीडी चुनाव हों या यूपी के चुनाव, उसके बाद तमाम विपक्षी दल एकजुट होने की रणनीति भी बनाते दिख रहे हैं। जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए अगर विपक्ष एक होता है तो तीन नाम ऐसे निकलकर सामने आए हैं जिसपर पूरा विपक्ष एकमत हो सकता है, जिसमें से एक नाम शरद यादव, दूसरा नाम शरद पवार जबकि तीसरा नाम मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को दूसरा टर्म देना है।

विपक्ष की अग्निपरीक्षा

विपक्ष की अग्निपरीक्षा

सोनिया गांधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी विपक्ष को एकजुट करने में जुटी हुई हैं, सूत्रों की मानें तो पार्टी ने इसके लिए शिवसेना से भी संपर्क साधा है, लेकिन शिवसेना आरएसएस चीफ मोहन भागवत के नाम को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन हाल ही में शिवसेना ने शरद पवार के नाम पर भी अपनी रुचि दिखाई है, लेकिन शरद पवार ने खुद को इस रेस से पहले ही अलग बताया है। सूत्रों की मानें तो शिवसेना भाजपा को मुश्किल स्थिति में डालने के लिए किसी ऐसे नाम पर विपक्ष के साथ जा सकती है जो उसके लिए मुनाफिक हो, लेकिन इस रास्ते में सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि शिवसेना शरद यादव और प्रणव मुखर्जी के नाम पर राजी शायद नहीं हो। ऐसे में अगर विपक्ष शरद पवार के नाम पर सहमति बनाने में सफल होता है तो मुमकिन है कि शिवसेना विपक्ष के साथ जा सकती है।

महागठबंधन का पहला टेस्ट

महागठबंधन का पहला टेस्ट

जुलाई माह में राष्ट्रपति के लिए होने वाले चुनाव में विपक्ष की सबसे बड़ी परीक्षा होगी कि क्या यह एकजुट है या नहीं। हाल ही में पांच राज्यों में चुनाव के नतीजे आने के बाद देशभर में महागठबंधन की बात उठने लगी थी, ऐसे में अगर विपक्ष शिवसेना को अपनी ओर करने में सफल होता है तो यह उसकी बड़ी सफलता होगी। लेकिन ऐसे में जो सबसे बड़ा सवाल उठता है वह यह कि क्या भाजपा शिवसेना के बिना राष्ट्रपति का चयन कर सकती है।

क्या है विधायकों का गणित

क्या है विधायकों का गणित

अगर शिवसेना विपक्ष के साथ जाने का फैसला लेती है तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और मुमकिन है कि पार्टी को अपनी पसंद का उम्मीदवार नहीं मिले क्योंकि शिवसेना का कुल वोट पूल 25893 है। अगर शिवसेना भाजपा का समर्थन नहीं करती है तो भाजपा को 20,000 वोट की कमी पड़ेगी, महाराष्ट्र में कुल 288 विधानसभा सदस्य में से भाजपा के खाते में कुल 122 विधायक हैं, जबकि उसे 12 अन्य विधायकों का समर्थन हासिल है। वहीं शिवसेना के पास कुल 63 विधायक हैं, महाराष्ट्र हर विधायक के वोट की कुल कीमत 175 है, इस लिहाज से शिवसेना के साथ मिलकर भाजपा के पास कुल वोट 34,475 हो जाएगा। वहीं कांग्रेस और इसके सहयोगी दलों के वोट की कुल कीमत 15,575 है। ऐसे में अगर शिवसेना कांग्रेस के साथ जाने का फैसला लेती है तो उसके पास कुल 26,000 वोट होंगे।

क्या है सांसदों का गणित

क्या है सांसदों का गणित

महाराष्ट्र से कुल 67 लोकसभा सांसद आते हैं जबकि 19 राज्यसभा सांसद। महाराष्ट्र में हर सांसद के वोट की कीमत 708 है। शिवसेना और भाजपा के कुल 52 सांसदों की वोट की कीमत 36,816 है। जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के कुल सांसदों के वोट की कीमत 10,620 है। ऐसे में अगर शिवसेना कांग्रेस के साथ जाने का फैसला लेती है तो दोनों के सांसदों के वोट की कुल कीमत 25,488 होगी।

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