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Bilkis Bano Case : 11 दोषियों की रिहाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, जस्टिस बेला एम त्रवेदी सुनवाई से अलग हुईं

गुजरात में गोधरा दंगों से जुड़े केस में बिलकिस बाने ऐसी पीड़िता हैं, जिन्होंने इंसाफ की लड़ाई में देश की सबसे बड़ी अदालत तक का दरवाजा खटखटाया। इस मामले की सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बेला एम त्रिवेदी अलग हो गई हैं।

Bilkis Bano Case

Bilkis Bano Case अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। देश की सबसे बड़ी अदालत में 11 दोषियों की रिहाई को चुनौती दी गई है। बुधवार को इस अहम मामले में 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई के खिलाफ याचिका पर सुनवाई से न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने खुद को अलग कर लिया। बुधवार को सामूहिक बलात्कार करने वाले 11 दोषियों की रिहाई को चुनौती दी गई। बिलकिस बानो द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट जस्टिस अजय रस्तोगी और बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने कहा कि मामले को किसी अन्य बेंच के समक्ष पोस्ट किया जाए।

जस्टिस बेला एम त्रिवेदी सुनवाई से अलग हुईं

रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 20 साल पहले 2002 के गोधरा दंगों के दौरान बिलकिस बानो के परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी ने बुधवार को सामूहिक बलात्कार करने वाले 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई को चुनौती देने वाली बिलकिस बानो द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया। पीठ में शामिल जस्टिस रस्तोगी ने कहा, अब पीड़िता ने खुद दोषियों को छूट देने को चुनौती देते हुए इस अदालत का दरवाजा खटखटाया है। उनकी याचिका को प्रमुख मामले के रूप में लिया जाएगा। उन्होंने कहा, अब जबकि पीड़िता खुद कोर्ट पहुंची हैं... हम पीड़िता के मामले को ही प्रमुख मामले के रूप में लेंगे। जिस पीठ में सुनवाई होगी, उसमें न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी सदस्य नहीं होंगी।

bilkis bano

सुनवाई से अलग होने का कारण स्पष्ट नहीं

न्यायमूर्ति रस्तोगी ने आदेश दिया कि सुनवाई की अगली तारीख पर बानो की याचिका के साथ इसी तरह की दूसरी याचिकाओं को भी टैग किया जाए। जस्टिस त्रिवेदी ने दिसंबर 2022 में ही बानो की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। हालांकि, जस्टिस त्रिवेदी के अलग होने का कोई कारण नहीं बताया गया।

समीक्षा याचिका किन जजों के पास पहुंची

दोषियों की समय पूर्व रिहाई के खिलाफ याचिका दायर करने के अलावा बिलकिस बानो ने समीक्षा याचिका भी दायर की है। इसमें उन्होंने गुजरात सरकार से दोषियों को दी गई छूट पर विचार करने के लिए कहा था। बुधवार को ये केस सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति रस्तोगी और जस्टिस बेला की पीठ में सूचीबद्ध थी। प्रक्रियाओं के अनुसार, शीर्ष अदालत के फैसलों के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाओं का निर्णय न्यायाधीशों के कक्षों में किया जाता है, जो जज फैसला देने में शामिल थे, उन्हीं जजों के पास फैसले की समीक्षा की अपील होती है।

30 साल पहले बने नियम के आधार पर रिहाई

ऐसे में बिलकिस बानो का मामला जस्टिस रस्तोगी की अदालत में है। बानो ने सुप्रीम कोर्ट के मई के आदेश के खिलाफ एक समीक्षा याचिका दायर की है। उन्होंने गुजरात सरकार के फैसले पर सवाल खड़े किए हैं जिसमें दोषियों को 1992 के छूट नियमों के आधार पर रिहा किया गया। बकौल बिलकिस बानो, अपराध की शिकार होने के बावजूद, उन्हें छूट या समय से पहले रिहाई की ऐसी किसी प्रक्रिया के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। याचिका में कहा गया है कि गुजरात का छूट आदेश कानून की जरूरत को पूरी तरह से अनदेखा करते हुए छूट के यांत्रिक आदेश की तरह सामने आया है।

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    किन लोगों ने रिहाई का विरोध किया

    इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में बिलकिस बानो केस में कुछ जनहित याचिकाएं भी दायर की गई थीं। इसमें 11 दोषियों को दी गई छूट को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिकाएं नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन ने दायर की है। महासचिव एनी राजा, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सदस्य सुभाषिनी अली, पत्रकार रेवती लाल, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा और टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा भी इसमें शामिल हैं।

    रिहाई के फैसले का बचाव, क्या बोली गुजरात सरकार ?

    इससे इतर गुजरात सरकार ने अपने हलफनामे में दोषियों को मिली छूट का बचाव करते हुए कहा था कि दोषियों ने जेल में 14 साल की सजा पूरी कर ली है और उनका व्यवहार अच्छा पाया गया है। राज्य सरकार ने कहा कि उसने 1992 की नीति के अनुसार सभी 11 दोषियों के मामलों पर विचार किया है और 10 अगस्त, 2022 को छूट दी गई थी। दोषियों की रिहाई को केंद्र सरकार ने भी मंजूरी दी थी।

    14 साल से जेल में, अच्छा रहा व्यवहार

    सरकार का कहना है कि 11 दोषियों को सजा पूरी होने से पहले रिहाई दी गई, लेकिन इन्हें "आजादी का अमृत महोत्सव" के जश्न के हिस्से के रूप में कैदियों को छूट देने के सर्कुलर के तहत रिहा नहीं किया गया। सरकार के हलफनामे में कहा गया, "राज्य सरकार ने सभी रायों पर विचार किया और 11 कैदियों को रिहा करने का फैसला किया क्योंकि उन्होंने जेलों में 14 साल और उससे अधिक सजा पूरी कर ली है और उनका व्यवहार अच्छा पाया गया है।"
    सरकार ने उन याचिकाकर्ताओं के लोकस स्टैंड पर भी सवाल उठाया था जिन्होंने इस फैसले को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दायर की। सरकार ने कोर्ट से कहा कि याचिका दायर करने वाले लोग बिलकिस बानो के केस में बाहरी हैं।

    पीड़िता की सुरक्षा पर सवाल

    याचिकाकर्ताओं की तरफ से दी गई दलीलों में कहा गया है कि उन्होंने गुजरात सरकार के सक्षम प्राधिकारी के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसके माध्यम से गुजरात में किए गए जघन्य अपराधों के आरोपी 11 लोगों को 15 अगस्त, 2022 को रिहा करने की छूट दी गई थी। रिहाई का विरोध करते हुए दलील दी गई है कि इस जघन्य मामले में छूट पूरी तरह से जनहित के खिलाफ होगी। ऐसा फैसला सार्वजनिक तौर पर अंतरात्मा को झकझोरने वाला और पीड़िता के हितों के खिलाफ है। पीड़िता के परिवार ने सार्वजनिक रूप से उसकी सुरक्षा के लिए चिंताजनक बयान दिए हैं।

    क्या है 20 साल पुराना पूरा मामला

    बता दें कि गुजरात सरकार ने 11 दोषियों को विगत 15 अगस्त को रिहा कर दिया था। दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। सभी 11 लोगों को 2008 में सजा सुनाई गई थी। इसी साल स्वतंत्रता दिवस के दिन गुजरात में प्रचलित छूट नीति के अनुसार इन्हें सजा पूरी होने से पहले रिहा कर दिया गया। दोषियों पर मार्च 2002 में गोधरा दंगों के बाद बिलकिस बानो के साथ कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार का आरोप साबित हुआ। दोषियों ने वारदात को अंजाम देने के बाद बानो को उसकी तीन साल की बेटी सहित उसके परिवार के 14 सदस्यों के साथ मरने के लिए छोड़ दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक वडोदरा में जब दंगाइयों ने बिलकिस बानो के परिवार पर हमला किया तब वह पांच महीने की गर्भवती थीं।

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