'10 अपनों को खोया, सज्जन को फांसी क्यों नहीं?',पूर्व कांग्रेस नेता के बरी होने पर फूट-फूट कर रोए पीड़ित परिवार

Sajjan Kumar Sikh Riots Case: 1984 के सिख विरोधी दंगों की आग में अपनों को खोने वाले परिवारों के लिए आज का दिन एक और कानूनी झटके जैसा रहा। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार (Sajjan Kumar) को जनकपुरी और विकासपुरी हिंसा मामले में बरी कर दिया है। यह मामला दशकों पुराना है, जिसकी जांच 2015 में विशेष जांच टीम (SIT) ने नए सिरे से शुरू की थी।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूत सज्जन कुमार की संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। इस फैसले ने न केवल कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी है, बल्कि दंगों के उन जख्मों को भी हरा कर दिया है जो 40 साल बाद भी भर नहीं पाए हैं। जहां एक ओर आरोपी पक्ष इसे राहत मान रहा है, वहीं पीड़ित परिवारों की सिसकियां और 'इंसाफ' की गुहार न्याय प्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है।

Sajjan Kumar 1984 Sikh Riots Case

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1984 Riots: अदालत का फैसला, सबूतों के अभाव में मिली राहत

विशेष जज दिग विनय सिंह ने खचाखच भरी अदालत में अपना संक्षिप्त आदेश सुनाते हुए सज्जन कुमार को हत्या के आरोपों से मुक्त कर दिया। कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु-

अपर्याप्त साक्ष्य: अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत सज्जन कुमार की भूमिका को संदेह से परे साबित करने के लिए काफी नहीं हैं।

SIT की जांच: यह मामला 2015 में गठित SIT द्वारा दर्ज की गई दो एफआईआर पर आधारित था, जिसमें दंगों के दौरान हुई हत्याओं की जांच की गई थी।

क्या था मामला? 1984 की वो दर्दनाक यादें

यह पूरा केस पश्चिमी दिल्ली के दो प्रमुख इलाकों में हुई हिंसा से जुड़ा था:

जनकपुरी कांड: 1 नवंबर 1984 को यहां दो लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

विकासपुरी कांड: 2 नवंबर 1984 को एक व्यक्ति को भीड़ द्वारा कथित तौर पर जिंदा जला दिया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि इन घटनाओं के पीछे सज्जन कुमार का हाथ था और उन्होंने भीड़ को उकसाया था। हालांकि, सज्जन कुमार ने ट्रायल के दौरान लगातार खुद को निर्दोष बताया।

1984 Riots: '10 सदस्य खोए, सालों बाद भी इंसाफ नहीं'

फैसला सुनते ही अदालत परिसर में मौजूद पीड़ित परिवारों का सब्र टूट गया। उनकी आंखों से बहते आंसू न्याय की लंबी प्रतीक्षा की कहानी बयां कर रहे थे। एक पीड़ित ने रोते हुए कहा, "मैंने अपने परिवार के 10 लोगों को खोया है। क्या उन मासूमों की जान की कोई कीमत नहीं? हमें इंसाफ क्यों नहीं मिल रहा?"

परिवारों का मानना है कि रसूखदार आरोपियों के खिलाफ गवाहों और सबूतों को समय के साथ कमजोर कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी, अभी बाकी है जंग

निचली अदालत के इस फैसले से हार मानने के बजाय, पीड़ित परिवारों ने अब देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है।

फांसी की मांग: पीड़ितों के कानूनी सलाहकारों और सदस्यों ने स्पष्ट किया कि वे इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे।

अंतिम उम्मीद: परिवारों का कहना है कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक सज्जन कुमार को उनके किए की सजा (फांसी) नहीं मिल जाती।

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