आखिरी समय भी सिस्टम से जूझे अंबरीष कुमार, दिल्ली के अस्पताल में बेड के लिए घंटों भटकते रहे
नई दिल्ली, अप्रैल 24। एक व्यक्ति सिस्टम को सुधारने में अपनी जिंदगी लगा देता है और फिर एक दिन उसी सिस्टम की नाकामी से उसकी जिंदगी खत्म हो जाती है। वर्षों से शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार की भागीदारी बढ़ाने को लेकर संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अंबरीष राय के साथ यही हुआ है। शुक्रवार सुबह ऑक्सीजन सपोर्ट पर एक बेड पाने के लिए 5 घंटे तक एंबुलेंस में भाग-दौड़ के बाद दक्षिणी दिल्ली के डॉ. अम्बेडकर अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली।

सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अंबरीष राय ने अपने जीवन के पिछले 11 साल प्राथमिक शिक्षा में सुधार और शिक्षा का अधिकार (आरटीई) के लिए समर्पित कर दिए थे लेकिन जिस सिस्टम को सुधारने की वह लड़ाई लड़ रहे थे उसी की अव्यवस्था ही उनकी मौत की वजह बन गई।
अस्पताल मिलने के बाद भी करना पड़ा इंतजार
अंबरीष राय के पुराने मित्र और सहयोगी मित्र रंजन ने इंडियन एक्सप्रेस से बताया कि उन्हें 14 अप्रैल से ही बुखार था लेकिन 17 अप्रैल से उन्हें समस्या आनी शुरू हुई। रंजन बताते हैं "उन्हें मंगलवार को पंडित मदन मोहन मालवीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था और बुधवार को वह बेहतर महसूस कर रहे थे। गुरुवार शाम को अस्पताल प्रशासन ने बताया कि उनके फेफड़ों में नुकसान पहुंचा है और उन्हें कोविड इलाज की सुविधा वाले अस्पताल में शिफ्ट कराया जाना चाहिए। सुबह 2 बजे से 7 बजे तक एंबुलेंस में ऑक्सीजन सपोर्ट पर लेकर उन्हें भागते रहे लेकिन कहीं बेड के बारे में पता नहीं चल पा रहा था। हमने कुछ सांसदों को भी फोन किया और उनमें से कुछ ने मदद भी की। आखिरकार 7 बजे हम अंबेडकर अस्पताल पहुंचे। तब तक उनके पास कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट नहीं इसलिए एडमिट होने में भी देरी हुई। इससे बड़ा मजाक क्या होगा कि जहां एक अस्पताल ने कोविड वाले लक्षण की वजह से उन्हें बाहर भेजा था वहीं दूसरा अस्पताल इसलिए नहीं ले रहा था क्योंकि रिपोर्ट नहीं थी। साढ़े 7 बजे उन्हें अंबेडकर अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्हें ऑक्सीजन दी गई लेकिन वे बच नहीं सके।
बच्चों की शिक्षा के लिए किया काम
मऊ में जन्में अंबरीष राय ने लखनऊ विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी। पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे थे। उनके साथ आखिरी वक्त में उनकी पत्नी मौजूद थीं जबकि उनका बेटा उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका में है। वह पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका।
एक आरटीई कार्यकर्ता के रूप में राय इस बात में विश्वास करते थे कि स्कूली शिक्षा प्रणाली की विफलताओं के लिए बच्चों को दोष नहीं दिया जाना चाहिए। खास तौर पर स्कूलों में बच्चों को शिक्षक और किताब जैसी बुनियादी चीजें नहीं मिल पा रही हैं। वह इस बात के दृढ़ पैरोकार रहे कि स्कूलों में कक्षा के अंदर और बाहर बच्चों के असफल होने के लिए सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।
एक ऐसे समय में जब सरकार अधिक निजी हिस्सेदारी को बढ़ाने पर जोर दे रही है राय लगातार सार्वजनिक फंडिंग और सहयोग की मांग कर रहे थे।












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