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Right to Repair: लैपटॉप या मोबाइल खराब है! नया खरीदने की मजबूरी से मिल सकता है छुटकारा

नई दिल्ली, 14 जुलाई: अभी अगर आपका कोई इलेक्ट्रॉनिक सामान या बाकी कोई भी उपकरण खराब होता है, तो कई बार यह परिस्थितियां पैदा की जाती हैं, जब आप उसकी मरम्मत करवा कर फिर से इस्तेमाल करने की जगह नई खरीदने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। इसका कारण ये होता है कि कंपनियां नए मॉडल लॉन्च करती रहती हैं और कह दिया जाता है कि पुराने वाला का तो पार्ट ही आना बंद हो गया है। लेकिन, केंद्र सरकार जिस दिशा में काम कर रही है, वह अगर लागू होता है तो निर्माता कंपनियों के यह गोरखधंधे बंद पड़ जाएंगे। उन्हें माल बेचने के साथ ही उपभोक्ताओं को खराब होने पर उसकी मरम्मत के उपाय भी बताने पड़ेंगे और पार्ट भी उपलब्ध करवाने पड़ेंगे। यही होगा आपका 'राइट टू रिपेयर' ।

क्या है 'राइट टू रिपेयर' ?

क्या है 'राइट टू रिपेयर' ?

हो सकता है कि जल्द ही आपको जवाब दे चुके मोबाइल फोन, लैपटॉप या टैब की जगह नया खरीदने की मजबूरी से छुटाकारा मिल जाए। अब इन चीजों की निर्माता कंपनियां अपने प्रोडक्ट को ऐसा नहीं बना पाएंगी कि उसकी मरम्मत ही ना हो पाए। जिससे कि आपको उनसे नए प्रोडक्ट खरीदने को बाध्य होना पड़े। ऐसा सिर्फ मोबाइल, लैपटॉप या इस तरह की चीजों के साथ ही नहीं होगा, बल्कि उपभोक्ताओं के इस्तेमाल की तमाम चीजें होंगी, जिसमें कंपनियां हमें खराब होने पर उसी का नया प्रोडक्ट खरीदने को बाध्य नहीं कर सकेंगी। कंपनियों की रणनीति से उपभोक्ताओं की रक्षा के लिए 'राइट टू रिपेयर' (मरम्मत का अधिकार) पर विचार चल रहा है।

संदेश- प्रोडक्ट को मरम्मत किए जाने लायक बनाएं

संदेश- प्रोडक्ट को मरम्मत किए जाने लायक बनाएं

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा पर्यावरण की रक्षा के लिए रीयूज और रिसाइकिल जैसी बातों पर जोर देते रहे हैं। 'राइट टू रिपेयर' उनके 'लाइफस्टाइल फॉर एन्वॉयरमेंट' (लाइफ) आइडिया से मेल खाता है। केंद्र सरकार जिस दिशा में काम कर रही है, उससे निर्माताओं के लिए संदेश साफ है- अपने प्रोडक्ट को ऐसा बनाएं कि उसकी मरम्मत की जा सके और उपभोक्ताओं को नया मॉडल खरीदने के लिए मजबूर करना बंद कर दें।

13 जुलाई को हुई पैनल की पहली बैठक

13 जुलाई को हुई पैनल की पहली बैठक

इसके लिए उपभोक्ता मामलों के विभाग ने 'राइट टू रिपेयर' के लक्ष्य के साथ व्यापक ढांचा बनाने के लिए एक समिति गठित की है। अगर यह व्यवस्था हो गई तो उपभोक्ताओं की बहुत बड़ी समस्या दूर हो जाएगी। साथ ही पर्यावरण के अनुकूल व्यवस्था बनाने में भी मदद मिलेगी और रोजगार के नए और व्यापक अवसर भी पैदा होंगे। 13 जुलाई को हुई अपनी पहली बैठक में पैनल ने इस इरादे के साथ कई क्षेत्रों की पहचान की है, जिनमें खेती से जुड़े उपकरण, मोबाइल फोन, टैबलेट, कंज्यूमर ड्यूरेबल, ऑटोमोबाइल और ऑटोमोबाइल उपकरण शामिल हैं, जो 'मरम्मत के अधिकार' के दायरे में लाए जा सकते हैं। इस अधिकार का मकसद साफ है- निर्माताओं की ओर से बनाई गई 'पुरानी चीजों को हटाने की संस्कृति' से छुटकारा दिलाना।

कंपनियों के हथकंडों से छुटकारे पर हो रहा है विचार

कंपनियों के हथकंडों से छुटकारे पर हो रहा है विचार

सरकार के मुताबिक योजनाबद्ध तरीके से पुरानी चीजों को हटाने की संस्कृति एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें ' किसी गजट को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि वह सिर्फ एक निश्चित समय तक ही काम करे और वह समय पूरा होने के बाद उसे निश्चित रूप से बदलना पड़ जाए।' पैनल के सामने ये मुद्दे आए कि कंपनियों की ओर से किस तरह से मैनुअल देना टाला जाता है, जिससे कि उपभोक्ताओं को मरमम्त में मदद मिले। इसके अलावा स्पेयर पार्ट पर मालिकाना कंट्रोल और रिपेयरिंग पर एकाधिकार जैसे मामलों ने भी पैनल का ध्यान खींचा है।

उपभोक्ता ही बनेंगे मालिक

उपभोक्ता ही बनेंगे मालिक

सरकार का कहना है कि कोई प्रोडक्ट जिसकी मरम्मत नहीं की जा सकती या जिसे बनाया इस तरह गया है कि वह कुछ समय बाद बेकार है जाए तो वह ना सिर्फ ई-वेस्ट बन जाते हैं, बल्कि इसके जरिए उपभोक्ताओं को नया प्रोडक्ट खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, जो कि मरम्मत करके उसको फिर से इस्तेमाल करना चाहते हैं। मतलब कंपनियों को संदेश मिल गया है कि इन हथकंडों के दिन जल्द ही लदने वाले हैं और उपभोक्ताओं को पुराने प्रोडक्ट की जगह नए खरीदने को मजबूर नहीं किया जा सकता।

दुनिया के कई देशों में मिला है यह अधिकार

दुनिया के कई देशों में मिला है यह अधिकार

'राइट टू रिपेयर' भारत के लिए नया प्रयोग लग रहा है, लेकिन दुनिया के कई सारे देशों में इसका प्रचलन शुरू हो चुका है। अमेरिका में निर्माताओं से कह दिया गया है कि इस तरह के हथकंडों को छोड़ें और ऐसा प्रोडक्ट बनाएं, जिसे उपभोक्ता चाहें तो मरम्मत करवा सकें, चाहे खुद से या किसी अन्य की मदद से। यूनाइटेड किंगडम में इलेक्ट्रोनिक के सामान बनाने वाली कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि वह उपभोक्ताओं को मरम्मत के लिए स्पेयर पार्ट उपलब्ध करवाएं। ऑस्ट्रेलिया तो और कई कदम आगे है। यहां फ्री रिपेयर कैफे काम करते हैं, जहां टेक्नीशियन स्वेच्छा से अपने कौशल के जरिए लोगों की सहायता करते हैं। यूरोपियन यूनियन ने यह कानूनी तौर पर अनिवार्य कर दिया है कि निर्माताओं को 10 साल तक प्रोफेशनल टेक्नीशियन को स्पेयर पार्ट उपलब्ध करवाना होगा। भारत में जो पैनल बनाया गया है, वह दुनिया के सभी देशों में अपनाए गए प्रावधानों पर गौर करेगा।

इस काम में इन तमाम दिग्गजों का होगा योगदान

इस काम में इन तमाम दिग्गजों का होगा योगदान

'राइट टू रिपेयर' के पैनल की अध्यक्षता उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव निधि खरे कर रही हैं। इसमें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस परमजीत सिंह धालीवाल, पंजाब के ही राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर जीएस बाजपेयी, पटियाला स्थित राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के वाइस चांसलर प्रोफेसर अशोक पाटिल और आईसीईए, एसआईएएम, कंज्यूमर ऐक्टिविस्ट और संगठनों के लोग शामिल हैं। (तस्वीरें- सांकेतिक)

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